Wednesday, 2 December 2009

हम खुद मिल जुलकर शहर की 30 से 40 प्रतिशत गंदगी फौरन दूर कर सकते है !!

भारत के हर शहर की गंदगी का क्‍या हाल दिखता है , नालियां भरी हुई होने से गंदा बजबजाता बदबूदार पानी सडकों पर फैलता रहता है। आजादी को मिले इतने वर्ष हो गए , लेकिन 500 साल की गुलामी ने हमारी सोंच को इतना खराब कर दिया है कि इस गंदगी पर हमें कुछ भी ऐतराज नहीं होता है । सब काम हम सरकार पर ही छोड देते हैं , अपने ऊपर हमें जरा भी भरोसा नहीं है और न ही हम कोई विकल्‍प ढंढते हैं। यदि हम सभी अपनी सोंच , अपनी खराब आदत को बदलना चाहें तो हम सबके सहयोग से शहर की 30 से 40 प्रतिशत गंदगी फौरन दूर हो सकती है।

अधिक विवाद में न पडकर घर से निकलने वाले तीन तरह के कूडे को ध्‍यान में रखते हुए हमलोग अलग अलग रंग के तीन तरह के कूडेदान का प्रयोग करें , तो कितनी समस्‍याएं समाप्‍त हो सकती है। एक कूडेदान में प्‍लास्टिक , लोहा , पीत्‍तल , अल्‍युमिनियम , तांबा , कांच , लकडी , चमडा , कागज आदि दुबारा गलाकर काम में लाने लायक वस्‍तुओं को रखा जाए। इस कूडेदान की वस्‍तुएं सडनेवाली नहीं , इसलिए इसे आप कुछ दिनों तक रख सकते हैं और समय आने पर कबाडी को बेचें , तो दो पैसे आपको , चार पैसे कबाडी को भी मिलेंगे, देश को दुबारा कम लागत पर वस्‍तुएं वापस मिल जाएंगी और जमीन बंजर होने से भी बचेगा , इसके साथ शहर के कूडे का बहुत हिस्‍सा कम हो जाएगा। इस तरीके से कूडे को रखने पर एक छोटा शहर हर दो महीनें में एक मालगाडी के भार के बराबर लोहा और एक हवाई जहाज के बराबर अल्‍युमिनियम और बडी तादाद में पीतल तांबा आदि धातुएं देश को वापस दे सकते हैं।

दूसरे कूडेदान में आप सब्‍जी , फलों के छिल्‍के , पेड पौधों की सूखी पत्तियां और कुछ ऐसी चीजे डाल सकती हैं , जिसे गायों को खिलाया जा सके या फिर ऐसी व्‍यवस्‍था न हो तो उसे सडाकर अच्‍छी खाद बनाया जा सके। इस तरह यह कूडा आपके लिए बहुत उपयोगी हो सकता है। विज्ञान का प्रचार प्रसार करने में समर्थ लोगों से मेरा अनुरोध है कि इस कूडे को खाद बनाने की वैज्ञानिक विधि इसी पोस्‍ट पर टिप्‍पणी के रूप में लोगों को बताएं , ताकि गमलों में डालने वाले खाद का इंतजाम हर परिवार में अपने आप हो जाएं । प्रयोग करने के बाद बची चायपत्‍ती भी इसके लिए बेहतर होती है।

तीसरे साफ कूडेदान में बचे या जूठे खाने वगैरह को दिनभर जमा कर उसे गली के कुत्‍तों या अन्‍य चिडियों वगैरह को खिलाया जा सकता है। इसमें अलग से कुछ भी खर्च नहीं , सिर्फ थोडी सी सहनशीलता और दृढता की जरूरत है। कितने बेजुबानों को चारा मिल जाएगा , फिर भी यदि इतना करने का समय आपके पास नहीं तो इसे कम से कम खाद वाले डब्‍बे में ही डाल दें। दूसरे और तीसरे तरह के कूडेदान से निकले कूडे से बिजली भी बनायी जा सकती है , पर हमलोग कूडों को मिलाजुलाकर ऐसा गुड गोबर कर देते हैं कि वह हमारे किसी काम का नहीं होता है। इसलिए अपने बच्‍चों के साथ साथ काम करनेवाले दाई नौकरों को भी आप इस ढंग से कचरा फेकने की सीख अवश्‍य दें। हर बात में सिर्फ सरकार के भरोसे रहना बेवकूफी है।

अपनी सुविधा के लिए पोलीथीन में खाने की चीजें भरकर बाहर फेककर नालियों को न बंद करें , साथ ही इससे बेजुबान जानवरों की अकालमृत्‍यु के आप भागीदार बन जाते हैं। पॉलीथीन को भी पहले वाले डस्‍टबीन में रखें , ताकि समय पर उसे भी गलाने के लिए बेचा जा सके। दुबारा न गलनेवाली पोलीथीनों को वहां पहली परत के रूप में इस्‍तेमाल किया जाना चाहिए, जहां नई नई सडके बनती है और वहां की जमीन ऊंची करनी हो । इसके लिए भी वैज्ञानिकों को ध्‍यान देना चाहिए। तो आज से ही आप इस कार्य को शुरू कर दें , अपने पर्यावरण को और नुकसान न पहुंचाएं , क्‍यूंकि स्‍वस्‍थ पर्यावरण ही आपको स्‍वस्‍थ जिंदगी दे सकता है , सफाई के इस यज्ञ को पूरा करने के लिए एक एक व्‍यक्ति का योगदान आवश्‍यक है। आज ही अपनी टिप्‍पणी के द्वारा प्रण करें कि सामान ढोने के लिए आप सिर्फ कपडे की थैली का ही उपयोग करेंगे।

(लेखक .. खत्री राजेन्‍द्र नाथ अरोडा जी)




6 comments:

आभा said...

बहुत ही महत्वपूर्ण पोस्ट ...

ललित शर्मा said...

अच्छी सलाह-आभार

M VERMA said...

कर तो सकते है पर यही तो बिडम्बना है कि करते नही है.

makrand said...

धन्यवाद आंटी, बहुत अच्छी पोस्ट है. मम्मी को भी घर जाकर पढवा दूंगा.

Udan Tashtari said...

मकरंद, तुम यहाँ भी आ गये आंटी को परेशान करने...


बढ़िया पोस्ट...सही कह रही हैं.

खुशदीप सहगल said...

हम अपना घर शीशे की तरह साफ रखने की कोशिश करते हैं...ऐसा ही सामुदायिक भावना से हम अपने आसपड़ोस कॉलोनी, गली-मुहल्ले को क्यों नहीं रख सकते...विदेश जाते ही हमें कूड़ा न फैलाने का ध्यान आ जाता है...फिर
भारत में रहते हुए सार्वजनिक जगहों पर हम क्यों लापरवाह हो जाते हैं...

जय हिंद...

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