Tuesday, 23 February 2010

जाति से संबंधित कुछ भ्रांतियों का उन्‍मूलन

प्रश्‍न ... प्राचीन काल में एक गोत्र और अल्‍ल में विवाह क्‍यूं वर्जित था ?
उत्‍तर .. वह इसलिए ताकि आनेवाली पीढी में किसी प्रकार के रोगयुक्‍त होने का भय कम से कम तो हो ही , इसके अलावे वे पीढी से शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक सक्षम हो।

प्रश्‍न .. यदि ऐसी बात थी , तो फिर दो जातियों के मध्‍य विवाह क्‍यूं नहीं होते थे ?
उत्‍तर .. क्‍यूंकि उस समय प्रत्‍येक जाति एक तरह के पेशे से जुडे हुए थे। इसके कारण न सिर्फ दोनो परिवारों को एक दूसरे से सामयोजन कर पाने में ही आसानी होती थी , मां और पिताजी दोनो के परिवार के एक ही पेशे से जुडे होने से आनेवाली पीढी को दो परिवारों के अनुभव का फायदा मिलता था , जिससे आनेवाली पीढी उस काम में अधिक कुशल होती जाती थी। अपनी अपनी जाति के अंतर्गत विवाह होने के मूल में यही बात थी। वर्तमान युग में भी खास पेशे में जुडे लोग अपने ही पेशे में बच्‍चों को और विकसित देखना चाहते हैं , यह कोई असामान्‍य बात नहीं थी।


प्रश्‍न .. कोइ व्यक्ति गलत काम करे तो कहते हैं 'देखो जात दिखा गया या देखो जात का असर है.ऐसा क्‍यूं ?
उत्‍तर . .प्राचीन काल में तो कर्म के आधार पर लोगों को काम दिया जाता था और उसी आधार पर जाति बनी थी पर कालांतर में कुछ ह्रास तो हुआ है , कला या मेहनत का मूल्‍य जैसे जैसे कमजोर होने लगा, उनका पतन होता चला गया। विविधता तो प्रकृति का नियम है , संसाधन के हिसाब से मनुष्‍य की मन:स्थिति रहनी स्‍वाभाविक है। भारत के लोग क्‍यूं आक्रामक नहीं होते , क्‍यूंकि ये संसाधन संपन्‍न देश है, लोग रक्षात्‍मक ढंग से रहना पसंद करते हैं, वे क्‍यूं विदेशों का रूख करेंगे ? अपने देश में किसी चीज की कमी नहीं और जिन देशों से साधनहीनता है , वहां के लोग भटकते हैं , आक्रमणकारी कहलाते हैं, क्षेत्र की तरह ही जाति का भी प्रभाव चरित्र पर पडता ही है, संसाधन के हिसाब से लोगों में चिंतन की शक्ति विकसित होती है, जिसका असर कालांतर में जीन में भी दिखाई पडता है। जिसको जैसा पारिवारिक माहौल मिला या जिसे जैसे संसाधन मिले, उसी के अनुरूप उसकी सोंच विकसित होती गयी , जिसे ही बाद में जातीय विशेषताएं कही जाने लगी। सरकार द्वारा छोटी जाति के लोगों को आरक्षण देने के पीछे इसी कमजोर सोंच को महत्‍व दिया गया है। अब धीरे धीरे लोगों के मध्‍य परस्‍पर मेल भाव होने से काफी समानता आयी है, पर शिक्षा के बावजूद सोंच में कुछ न कुछ तो फर्क आएगा ही । 90 प्रतिशत लोगों में तो जाति और क्षेत्र का प्रभाव रहता है, उन्‍हीं लोगों के लिए कहा गया है .. 'देखो जात दिखा गया या देखो जात का असर है , हालांकि यह भी बढा चढाकर प्रस्‍तुत किया जाता है। 


प्रश्‍न ...कबीर ने कहा 'जात न पूछो साधू की पूछ लीजिये ज्ञान', क्या यह 'जात' और 'जाती' एक ही हैं?
उत्‍तर ..कभी कभी पूर्वजन्‍म के संस्‍कार भी काम करते हैं और किसी व्‍यक्ति में परिवार या क्षेत्र से अलग विशेषताएं देखने को मिलती हैं। उन्‍हीं लगभग 10 प्रतिशत लोगों के लिए है .. 'जात न पूछो साधू की पूछ लीजिये ज्ञान' और आनेवाले समय में मानवतावादी दृष्टिकोण बढे और उससे ऐसी सोंच 10 प्रतिशत से बढती हुई 100 प्रतिशत हो जाए , हम इसकी कामना करते हैं।


( यह पोस्‍ट मेरी एक चैट के दौरान हुई बातचीत को सार्वजनिक कर रही है)

9 comments:

निर्मला कपिला said...

संगीता जी संयोग देखिये कल ही हमारे घर कोई महमान आये तो उनसे यही चर्चा खूब जम कर हुयी थी आज यहाँ भी मिल गयी। आपसे सहमत हूँ जात न पूछो साधू की पूछ लीजिये ज्ञान' बिलकुल सही बात है धन्यवाद्

राज भाटिय़ा said...

सभी जानकारिया बहुत अच्छी लगी. धन्यवाद

Sudhaker said...

aapke gyan pe taras aata hai.vern vyavastha ke bare mein jankari ke liye apko Dr.Ambedker ka sahitya padhna chahiye,aur jyada vastvik jaankari ke liye rigved se ramcharitmanas tak kisi bhi kitab ka dimag kholker adhyayan kerne pe aapko is gandi pratha ka mool gyat ho jayega.womens aur shudro ke liye itna zaher in kitabo mein bhara hai,jise aap aankh band kerke bhi mahsoos ker sakti hain.apni gendgi ko parampara kahene ke karen hi aaj hindu aurtoin ki dasha itni badter hai.aap ek uccha shikshita hone per bhi ise nahi smajh pa rahi hein,ye ashcherya ki baat nahi hai,kyonki aap un 99% indian hindu aurato mein mein hein jo aankh moondker "dhol gavaar shudra pashu naari,sakal tadna ke adhikari" padhtee hein.

Sudhaker said...

aapke gyan pe taras aata hai.agar aapne apne dharmgranth rigvad se ramcharitmanas tak dimag kholke padhe hote,to aapko is gandi pratha ka mool pata chal jata .aapne history kabhi padhi hai? franch yarti Tavernear ne likh hai"mujhe aashcharya hota hai ki moortipujko[hundu] ki itni badi aabadi,muslims ke aadheen itne samaye tak kaise rahi.per jab mein hiduoin ki jaati pratha dakhta huin,to mera aashcharya door ho jata hai." jis dharam mein ek jaati doosre ke yahan paani bhi na peeti ho,vo apni raksha ke liya kabhi ekjut ho sakta hai?apnee gandgi ko parampara batane ke karan hi hindu mahilaoin ki dasha ghulamo se bhi badter ho gayi hai.itni uchhashikshita hone ke baad bhi aap ye nahi dekh pa rahi hein to aap un 98% hindu mahilaoin mein hein,jo aankh moondke "dhol gavaar shudra pashu naari,sakel taadna ke adhikaari" gaati hein.

संगीता पुरी said...

सुधाकर जी,

पूर्व आई पी एस अधिकारी , इतिहास वेत्‍ता और संस्‍कृत विद्वान किशोर कुणाल जी ने वेद , पुराण , धर्मग्रंथो और प्राचीन इतिहास के उद्धरणों से
साबित किया है कि शूद्र या दलितों का हिन्‍दू समाज में हमेशा ही सम्‍मानित स्‍थान रहा है। इस विषय पर अपने अध्‍ययन और शोध के आधार पर
उन्‍होने 'दलित देवो भव' नाम से एक पुस्‍तक भी लिखी है। 700 पन्‍नों की यह पुस्‍तक शूद्रों की अवधारणाओं को नए स्‍तर तक ले जाती है, बिहार में हिन्‍दू धर्म को उसके वास्‍तविक स्‍वरूप पर वापस लाने के लिए बिहार राज्‍य धार्मिक न्‍यास बोर्ड के प्रशासक आचार्य उक्‍त किशोर कुणाल जी के
नेतृत्‍व में पालीगंज के राम जानकी मंदिर में मुसहर जाति के जनार्दन मांझी , विश्‍वनाथ मंदिर में चंदेश्‍वर पासवान , बटेश्‍वर नाथ मंदिर के
मुख्‍य पुजारी के रूप में दलित जमुना दास जैसे दलित पुजारियों की नियुक्ति की गयी है।

इसके अलावे मैं ये भी कहना चाहूंगी कि आज के युग में जाति या ऊंच नीच के नाम पर समाज में या बाजार में कोई भेदभाव नहीं है, फिर भी एक ग्रेज्‍युएट तक को क्‍या मजबूरी है कि वह दिनभर सेठ के दुकानों में काम कर अपनी जरूरी आवश्‍यकता को पूरी करने में भी असमर्थ होता है , फिर भी उसकी चाकरी छोड नहीं पाता , सेठ के प्रति शुक्रगुजार होता है। कल तक यही हुआ तो उसे जाति के नाम पर शोषण कहा गया, पर जाति प्रथा की शुरूआत सामाजिक तौर पर व्‍यवस्‍था को कायम रखने के लिए हुई थी, पर उनकी मेहनत और कला का सही मूल्‍य न देकर उन्‍हें कमजोर बनाया गया। आज जाति का नामोनिशान नहीं होने के बावजूद मैं स्थिति अच्‍छी नहीं देख रही हूं, मालिकों के आगे डिग्री धारी कर्मचारियों के अतिरिक्‍त अन्‍य कर्मचारियों की कोई हैसियत नहीं। जबकि मैं अर्थशास्‍त्र में पढ चुकी हूं कि लाभ का बंटवारा भूमि , पूंजी , श्रम , व्‍यवस्‍था और साहस के मध्‍य बराबर बराबर होना चाहिए। आज भी तो शोषण है , अभी भी उच्‍च और निम्‍न वर्ग के मध्‍य सोंच का फासला है, कालांतर में इनके बच्‍चे विद्रोह कर बैठे तो आप इसे क्‍या कहेंगे ??

Sudhaker said...

aap mera aashaye samajh nahi pa rahi hein.aap kisi ki kitaab ke nikale huye nishkarsh ki jagah khud dharmgranto ko padhke koyon nahi dekhti.mahabharat mein likha hai"istri shudo na dheeyetaam".agar aap chahain to mein aako rooj aise 10 uddeharen bhaj sakta huin jisme istriyo ke liye itni bandishe lagayi gayi hein jinti ghulamo ke liye bhi nahi hoti,iske bavjood aaj istriyan aage badh rahi hein to aadhunik shiksha aur samvidhaan mein mile adhikaaro ke karen.aapne jaati vyavastha ki shuruvaat samajik vyavastha kayam rakhne ke liye hona bataya hai,per is vyavastha ka mool hai"Bramhano ki servocchata ko kayam rakhna".iske liye desh ko 1000 saal tak ghulaam banaye rakha gaya.jo hindu bahri akrantaon ka saamna ker sakta tha,usay ye kehker roka gaya ki hathiyaar kavel kshatriya hi utha sakta hai.history batati hai ki jab aakramankari se indian raja ki sena lad rahi hoti thi usi samay paas ke khaton mein kisaan kaam ker rahe hote the,kyonki ladna kshatriya ka dharam hai.aapne arthshstra padha hai,magar samajshashtra nahi.bharat mein shoshak-shoshit ka siddhant kaam nahi kerta.Dr.Ambadker economics ke bade viddvaan the,kabhi samaye mile to indian caste system ka economy pe kya asar hua hai,is baare mein unka sahitya padhiyega.ek baar phir kahena chahta huin ki aap jaisi padhi-likhi mahilaon per ye mahiti jimmedari hai ki sach kahne ka sahas rakhe,na ki pracheenta ke jhoothe aadember ko dhoti rahe.

संगीता पुरी said...

सुधाकर जी,

साहित्‍य समाज का दर्पण होता है .. किसी भी देश और काल में पात्रों के द्वारा हर प्रकार की घटना का विशद विवेचन होता है उसमें .. आज के साहित्‍य में भी देश और समाज को हर कोण से देखा जा रहा है .. आनेवाले समय में यह व्‍यक्ति के ऊपर निर्भर है कि वह आज के समाज को किस रूप में देखे .. आज दहेज के लिए जलायी जा रही औरतों की घटनाओं को मन मस्तिष्‍क में जगह दे या फिर समाज के उच्‍चतम पदों पर स्थित और तो को देखकर आज के समाज का मूल्‍यांकण करे .. जैसे आज के नेता धर्म और जाति के नाम पर लोगों को लडाने में लगे हैं .. वैसा ही विदेशी शासनकाल के दौरान हुआ .. और उसका असर समाज में काफी दूर तक देखा गया !!

Sudhaker said...

maine sahitya ki baat hi nahin kee thee.baat to un dharmgrathon ki hai jo us kaal mein samvidhaan ka derja rakhte the-manu smriti,yagyavalakya smriti, aur Gautam,angira ,harit,aapastaamb,jeemutvahan jaise anek hindu dharm ke vyakhyakaron ne jati pratha aur istriyo ko dabaker rakhne ka samerthan kia hai.manu kaheta hai ki-"shudra ke kaan mein ved ka ek bhi shabd pad jaye to uske kaan mein pighala hua seesa bhar dena chahiye".ye koi sahityik rachna nahin hai,ye kanoon tha,jo her raja ko manena padta tha.ye Balmiki ki Ramayan mein spasht ho jata hai jahan Shambook rishi ko shudra hone ke bavjood tapasya karne ke 'apradh' mein khud bhagvaan RAM ne apni talvaar se mrityudand diya tha.manu likhta hai ki"yadi shudra koi sampatti arjit kerta hai to raja ka dharm hai ki vo uski sari sampatti cheen le".Ramayan aur Mahabharat do mahakavya hi nahin us daur ki rajnitik ,samajik sthiti ka sampoorn chitran kerne vale granth hain,inmein anek sthano pe shudro aur nariyon ke saath apmanjanak salook kerne ke udaharen milte hain,jinka jikra kerne mein kai panne kam pad jayenge,per ek udaharen dena chahunga-Lanka vijay ke baad jab paheli baar Shree RAM ,Seetaji se milte hain to vo kahte hain-"tum shvaan[kutte]ke dvara chate huye ghee ke samaan ho,tumhe mein sveekaar nahin ker sakta.maine ye yuddh apne kul ki maryada ki raksha ke liye kia tha,tum kahin bhi jaane ke liye svatantra ho".jab bhagvaan istri ke liye aisa kah sakta hai,to aam janta use hi maanegi.iske baad garbhvati Seeta ko bahane se van mein chhod aane ka prasang hai.ye aadersh samaj ke aage rakha gaya hai.

संगीता पुरी said...

मैं एक ईश्‍वर की पूजा करती हूं .. धर्मग्रंथों की कहानियों की पूजा नहीं करती हूं .. कितने कितने युगों तक ये कहानियां मौखिक रूप से पीढी दर पीढी चलती रहती है .. तब ही किसी के द्वारा इसे लिखित रूप दिया जाता है .. उस समय अपने स्‍वभावानुसार इसे तोड मरोडकर पेश किया जाता है .. मैने इन लेखों में लिखा भी है ..

http://sangeetapuri.blogspot.com/2010/02/blog-post_12.html
http://sangeetapuri.blogspot.com/2009/11/blog-post_18.html

पर धर्मभीरू लोग उसको अक्षरश: सत्‍य मानने लगते हैं .. यहीं से गडबडी शुरू हो जाती है .. जिन ऋषियों की कथा का आप जिक्र कर रहे हैं .. उनके वंशजों को उसी नाम से पुकारा जाता था .. अपने पूर्वजों के कारण प्राप्‍त अपने वंश कुल और माहात्‍म्‍य का उन्‍होने गलत इस्‍तेमाल किया . हर युग की कहानी में उनकी चर्चा का अर्थ यही है .. हर युग में धर्म का जन्‍म मनुष्‍य को सभ्‍य बनाने के लिए किया जाता है .. पैगम्‍बर मुहम्‍मद और गुरू नानक वगैरह को तो आप हाल के वर्षों में देख रहे हैं .. क्‍या उनके अनुयायी अपने धर्म के अनुसार कही गयी बातों का पालन करते हैं .. कालांतर में एक बडी जनसंख्‍या को धर्म के प्रति आकृष्‍ट देखते हुए इसका गलत फायदा उठाया जाता है .. और धर्मभीरू लोग सही गलत का निर्णय नहीं कर पाते .. बस इतनी सी समस्‍या होती है .. पर सही ढंग से सोंचा जाए तो मनुष्‍य को सभ्‍य बनाने के लिए आज भी एक धर्म की ही आवश्‍यकता है .. बशर्ते वो मानवता से युक्‍त हो !!

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