Sunday, 29 November 2009

जिज्ञासुओं को शक्ति प्रदान करो प्रभु !!

जिज्ञासु अनंत काल से आगे बढता जा रहा है। वह अपनी मंजिल स्‍वयं भी नहीं जानता, फिर भी अपने पथ पर अग्रसर रहता है। जिज्ञासु ठहरना नहीं जानता , क्‍यूंकि वह जानता है कि ठहरना मृत्‍यु है , जिसे वह वरण नहीं करना चाहता। आनेवाली हर लडाई को वह जीतता जा रहा है और अध्‍यात्‍म अमृत का पान करता हुआ उस अनंत से साक्षात्‍कार की पिपासा लिए उस अनदेखी मंजिल तक पहुंच जाना चाहता है। पर वह किसी मृगतृष्‍णा में भी फंसना नहीं चाहता , भ्रमित दिशा में घिरना नहीं चाहता , वह दूरदृष्टि से आगे बढना चाहता है। उसके जीवन का लक्ष्‍य अनंत में लीन होना है , नई नई खोजें उसकी पिपासा है।

जिज्ञासु जीवन का कठिनतम सत्‍य भी है। यदि जिज्ञासु न हो तो संसार स्थिर हो जाएगा। ऐसा कभी नहीं होता और हो भी नहीं सकता क्‍यूंकि प्रभु सदा ही जिज्ञासुओं को इस पृथ्‍वी पर भेजता रहता है , जो नए नए रास्‍ते खोजते हैं। संसार में नित्‍य नए नए विकास इन्‍हीं जिज्ञासुओं की तपस्‍या के प्रतिफल हैं। संसार का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं , जहां इन जिज्ञासुओं की पैठ न हो। ये अपने कार्य में अटल हैं और पाने की आकांक्षा लिए बडे उत्‍साह से आगे बढते जा रहे हैं।

जिज्ञासु जीवन को परिरष्‍कृत करने और परिपक्‍व बनाने की कला जानता है और उसमें नई नई खोजें करने की भी क्षमता रखता है। जीवन एक उलझी हुई जंजीर होती है , जिज्ञासु उसकी हर कडी को सीधा करता हुआ गंतब्‍य की ओर बढना चाहता है। जीवनमूल्‍यों के तीव्रता से उतार चढाव एवं ह्रास की ओर से भी वह सतर्क होता है और समयानुसार जो समीचीन होता है , उसे ग्रहण करने में उसे कोई संकोच नहीं होता। इन सब उहापोह के मध्‍य एक आध्‍यात्‍म अमृत ही उसका सही संबल और सुदृढ मार्गदर्शक होता है। जिज्ञासु इसका ऋणी होता है , क्‍यूंकि इसके द्वारा ही उसका मार्ग सरल हो जाता है।

हे ईश्‍वर , इन जिज्ञासुओं की सदा सहायता एवं रक्षा करना , ताकि ये तेरे रचे हुए संसार को सही दिशा में ले जा सके और आध्‍यात्‍म के नाम पर खुली अनेकानेक दुकानों से बचा सके। आज जो आतंकवाद चरमसीमा पर है , उसे जीतने में इन जिज्ञासुओं को शक्ति प्रदान करो प्रभु , तभी जगत् का कल्‍याण होगा । अस्‍तु ....

(लेखक .. खत्री कैलाशनाथ जलोटा 'मंजु' जी)




Saturday, 28 November 2009

कम से कम अपने पर्यावरण को तो गंदा न करें , विषाक्‍त न करें , अपवित्र न करें !!

तुम्‍हारे पास जो भी है उसे बांटो , विद्या , बुद्धि , ज्ञान , ध्‍यान , भक्ति , शक्ति , कीर्तन , गीत या संगीत ... जो भी है उसे बांटो। यदि ये भी नहीं तो प्रेम , स्‍नेह , आत्‍मीयता , मीठी वाणी जो भी है उसे बांटो, इससे बडा दान तो कुछ हो ही नहीं सकता। तुम दूसरों के आंखों से आंसू तो पोछ ही सकते हो , पीठ तो थपथपा ही सकते हो , सहानुभूति तो प्रकट कर ही सकते हो। यह तो कह ही सकते हो कि तुम उदास मत हो , निराश मत हो , हताश मत हो , चिंता मत करो , मैं तुम्‍हारे साथ हूं। पर तुम इतना भी नहीं कहते।

बॉंटो अपने प्रेम को , दोनो हाथो से बॉंटो , बॉटने में फैलाव है , जो जितना बॉटता है , वह उतना महान होता जामा है। पर तुम बांटना नहीं चाहते। धन को बांटने में कंजूसी करते हो , सोना चांदी बॉटने में तुम्‍हारा कलेजा फटता ही है। जमीन जायदाद बांटने में भी पीडा होती है। मीठा बोलने में भी कष्‍ट होता है। किसी का आदर करने में भी लज्‍जा आती है। तो और क्‍या करोगे ? बस अपनी स्‍तुति और दूसरो की निंदा , मेरा धन , मेरी संपत्ति , मेरा सौंदर्य , मेरा संगीत , मेरा कुल , मेरा ज्ञान , मेररा शान , मेरा मान या फिर दूसरों की निंदा , उसका पति ऐसा , उसकी पत्‍नी ऐसी , उसका बेटा ऐसा , उसकी बहू ऐसी , उसका घर ऐसा , उसका परिवार ऐसा , उसका चरित्र ऐसा ... सारी उमर इसी निंदास्‍तुति में बीत जाती है।

जैसे कुएं का पानी रूक जाए तो सड जाता है , पीने योग्‍य नहीं होता , विषाक्‍त हो जाता है , यहां तक कि नदी की धार रूक जाए तो उसका पानी भी पीने योग्‍य नहीं रहता। प्रेम भी बहता रहे , बंटता रहे , बरसता रहे , लुटता रहे , तो गंगोत्री से निकले जल की तरह पवित्र रहता है। इसलिए प्रेम का बडा महत्‍व है , भाव का बडा महत्‍व है। किसी कीमत पर भावों को विकृत होने नहीं दो। प्रेम और भाव ही तो हमारा सच्‍चा धन है , सच्‍ची पूंजी है। इसी के चलते हम सम्राट हैं।

पूरी प्रकृति बांट रही है , सूर्य प्रकाश दे रहा है , चंद्रमा चांदनी दे रही है , जल जीवन दे रहा है , अग्नि उष्‍णता दे रही है , वायु ऑक्‍सीजन दे रही है , नदियां जल दे रही हैं , पेड फल दे रहे हैं , पृथ्‍वी सबको धारण कर रही है। एक मनुष्‍य ने ही बांटना बंद कर दिया है। मनुष्‍य जो भी करता है , बस अपने परिवार के लिए , अपने और परिवार के लिए तो सब कोई करते हैं , करना ही पडता है। यदि नहीं करोगे तो परिवारवाले तुम्‍हारी छाती पर बैठकर ले लेंगे , कोर्टो में केस करके ले लेंगे , गले में अंगूठा लगाकर ले लेंगे। परंतु अपने या अपने परिवार के अलावे तुम क्‍या करते हो , यह देखने वाली बात है।

ये पृथ्‍वी , जल , वायु , अग्नि , आकाश , देशकाल , आपकी सेवा कर रहे हें , आपकी देखभाल कर रहे हैं , आपको जीवन दे रहे हैं । पर इसके लिए भी आपका कोई कर्तब्‍य नहीं ? कम से कम आप इसे तो गंदा न करें , विषाक्‍त न करें , अपवित्र न करें। इनकी पवित्रता का ध्‍यान रखें , कम से कम यह भी आपकी बडी मेहरबानी होगी !

(लेखक .. खत्री रामनाथ महेन्‍द्र जी)




Wednesday, 25 November 2009

अरोडा खत्री सिंध की प्राचीन राजधानी अरोड या अलोर के खत्री हैं !!

सन् 1901 की जनगणना में पंजाब में खत्रियों की संख्‍या जहां 447933 थी , वहीं अरोडा खत्रियों की संख्‍या उनसे अधिक 667197 थी। वे मुख्‍यत: द प पंजाब में बसे थे और व्‍यापार में लगे थे। वैसे उत्‍पत्ति तो सभी खत्रियों की एक ही जगह से है , पर जहां अन्‍य खत्री उत्‍तर की ऊपजाऊ भूमि की ओर बढे , वहीं अरोडा खत्री सिंधु नदी के कम ऊपजाऊ मैदानों में ही बने रहें। डी इब्‍टसन की पुस्‍तक पंजाब कास्‍ट्स के अनुसार पंजाब के आधे से अधिक अरोडा खत्री मुल्‍तान और डेराजात डिविजनों में रहते थे। द प पंजाब के ये कुशल व्‍यापारी थे।

खत्रियों और अरोडों के अनेको संस्‍कारों तथा वैवाहिक संस्‍कारों में एवं गोत्रों और पूर्वजों में सामंजस्‍य है। जार्ज कैम्‍पवेल भी इथनोलोजी ऑफ इंडिया में मानते हैं कि वंश परंपरा से ये भी खत्री ही हैं , क्‍यूंकि इनके व्‍यवसाय खत्रियों जैसे ही हैं। उनका ये भी कहना था कि जैसे मुल्‍तान और लाहौर के खत्री मुल्‍तानी या लाहौरी खत्री कहलाते हैं , उसी प्रकार अरोडा खत्री अरोड या अलोर के खत्री हैं , जो सिंध की प्राचीन राजधानी है। श्री मोहन प्र चोपडा , हजारीबाग , पं हीराचंद ओझा , टाड , राजस्‍थान , बंबई के अरोडा खत्री अशोक कुमार अरोडा और डा ओमप्रकाश छाबडा का भी यही मानना है।

एक समय था , जब ऐतिहासिक या पारंपरिक कारणों से इन अरोडों की गिनती खत्रियों में नहीं होती थी। व्‍यापार और खेती इनकी जीविका का मुख्‍य साधन था और ये छोटे से छोटा काम करने में भी नहीं हिचकते थे , इस कारण इन्‍हें निम्‍न जातीय खत्री समझा जाता था। पर अखिल भारतीय खत्री महासभा के प्रयासों से इन्‍हें खत्री मान लिया गया है और अब इनसे वैवाहिक संबंध बेहिचक होने लगे हैं।






भविष्‍य पुराण, जगत प्रसंग अध्‍याय पंद्रह में एक श्‍लोक है ...

नाग वंशोद्या दिव्‍या क्षत्रियास्‍य, मुद्राहता।
ब्रह्म वंशोदय वाश्‍चान्‍ये तथा अरूट वंश संभवा।।

अर्थात् नागवंश में होनेवाले और वैसे ही ब्रह्म वंश में होनेवाले तथा अरूट वंश में होनेवाले श्रेष्‍ठ क्षत्रिय कहलाए। इतिहास लेखक प्लिनी ने अरोडों को 'अरोटुरू' लिखा है। किसी दिन अरोडों के इतिहास पर और विस्‍तृत जानकारी दी जाएगी !!

(लेखक .. खत्री सीताराम टंडन जी)

Tuesday, 24 November 2009

विदेशी आक्रमणों का पहला मोर्चा खोखरान खत्रियों को ही झेलना पडता था !!

खोखर पंजाब के एक गांव का नाम है , इसी से खोखरान या खोखरायन शब्‍द बना। यहां के आदि निवासी होने के कारण उनके वंशज खोखरान खत्री कहलाए। इन्‍होने भी सरीनों के समान विधवा विवाह में विजेताओं की हां में हां मिलायी थी , जिसके कारण इन्‍हें समाज की मुख्‍य धारा से अलग कर दिया गया था। पहले आनंद , भसीन , सूरी , साहनी , चड्ढा ने और बाद में कोहली , सेठी , केरी और सभरवाल ने इनका साथ दिया था।

वर्तमान समय में खोखरान खत्री दिल्‍ली , पंजाब , लखनऊ , इलाहाबाद , बनारस तथा उ प्र में अन्‍यत्र पर्याप्‍त संख्‍या में हैं। किन्‍तु किसी समय प पंजाब में इनकी संख्‍या अधिक थी। अफगानिस्‍तान और फारस में भी इनकी संख्‍या काफी थी , पर 1947 में पाकिस्‍तान बनने से सबसे अधिक नुकसान इन्‍हें ही हुआ और इन्‍हें विस्‍थापित होना पडा। बिहार में छपरा जिले में इनकी पर्याप्‍त संख्‍या है और यहां कोहली वंश वैसे ही प्रधान है , जैसे इलाहाबाद में चड्ढा वंश।

प्राचीन काल में विदेशी आक्रमणों का पहला मोर्चा भी इन्‍हीं खोखरान खत्रियों को झेलना पडता था। पर उनके भाग्‍य की विडंबना ही थी कि उन्‍हें देश के भीतरी भागों से आपसी फूट के कारण कोई सहायता नहीं मिली। अत: इनके जो समूह पूर्वकाल में आक्रमणकारियों की सेनाओं में उच्‍च सैनिक पदों पर आसीन होकर उ प्र या बिहार में आए थे , उन्‍होने तो यहां अपनी जागीरें , जमींदारियां आदि पाकर अपने को भली भांति स्‍थापित कर लिया , परंतु जो पश्चिमी पंजाब में रह गए , उनमें कुछ को विस्‍थापित होने का दर्द तो झेलना ही पडा , कुछ को धर्म परिवर्तन का दुख भी झेलना पडा।

आज के मुसलमान कबाइली , अफ्रीदी वास्‍तव में पूर्व काल के खोखरान खत्री ही हैं। इनमें प्राय: अब्‍दुल रजाक साहनी , अब्‍दुल रहमान कोहली तथा सुलेमान चड्ढा आदि नाम आज भी मिलते हैं , साहनी, कोहली, चड्ढा खत्रियों के ही अल्‍ल हैं। एक अनुमान के अनुसार पाकिस्‍तान बनने पर हजारों खोखरान खत्री मुसलमान हुए , कटे मरे और करीब एक लाख भारत आए थे, पर ववीरता आत्‍मनिर्भरता और स्‍वाभिमान इन खत्रियों का जातिगत स्‍वभाव रहा। यही कारण है कि निराश्रय और बेसहारा होने पर भी एक भी खोखरान खत्री ने भीख नहीं मांगी , बल्कि संपूर्ण भारत में अपने पुरूषार्थ से स्‍वयं को शीघ्र स्‍थापित कर समाज में अपना ऊंचा स्‍थान बनाया।

इतिहास में वर्णित पृथ्‍वी राज को हराकर गजनी वापस जानेवाले मोहम्‍मद गोरी को उसकी वापसी में अत्‍यधिक परेशान करनेवाले यही खोखरान खत्री ही थे। मुसलमानों से अत्‍यधिक निकट संपर्क के कारण इनकी पोशाक तथा रहन सहन में अन्‍य खत्रियों से किसी समय इनकी भिन्‍नता अवश्‍य थी , पर हिंदुत्‍व की कोई कमी नहीं !!

( लेखक .. सीताराम टंडन जी)




Monday, 23 November 2009

बच्‍चों के जन्‍मोत्‍सव की भारतीय पद्धति क्‍या है ??

हमारे भारतीय संस्‍कार में भी जन्‍मदिन मनाने की परंपरा रही है। श्री रामनवमी , हनुमान जयंति , कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी आदि उत्‍सव से हमें उनके उत्‍तम गुणों करे जीवन में धारण करने की सीख मिलती है। बालको का जन्‍मदिन मनाना उनके मनमस्तिष्‍क में सद्संस्‍कार उत्‍पन्‍न करने का एक स्‍वर्णिम अवसर है। पर 'तमसो मा ज्‍योतिर्गमय' कहने वाली हर पर्व पर दीए जलाने वाली हमारी संस्‍कृति के विपरीत पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति का अंधानुकरण कर हम जन्‍म दिवस पर जलती हुई मोमबत्तियां फूंक फूंक कर बुझा देते हैं और तेज का नाश कर अंधेरे की ओर जाने की मूर्खता करते हैं। हर पर्व में कण कण को एकत्र कर लड्डू बांधने की सभ्‍यता को छोडकर जन्‍मदिन समारोह में केक काटने का आदर्श रखते हैं। भगवद् स्‍तोत्रो के शुभ मंगलोच्‍चार के स्‍थान पर 'हैप्‍पी बर्थ डे टू यू' जैसे शुष्‍क शब्‍दों को अपना लेते हैं। हमारी परंपरा के अनुसार जन्‍मदिन में दान और त्‍याग का महत्‍व है , जबकि बालको के सामने वह आदर्श न रहकर उपहारों का संग्रह करने का बढावा मिलता है।

आइए हम सब मिलकर अपनी भारतीय परंपरा के अनुसार जन्‍मदिन मनाएं और अपने बालकों को सुसंस्‍कारित करें। जिस बालक का जन्‍मदिन हो , उसे नए कपडे पहनाकर उसके द्वारा इष्‍टदेव की पूजा करवाएं एवं हाथ जोडकर प्रार्थना करवाएं। उसके पश्‍चात् परिवार की माता या बहन एक थाली में प्रज्‍वलित दीप , साबुत सुपारी , कपास , चावल , पुष्‍पमाला, मिठाई सजाकर बालक की आरती उतारें। सर्वप्रथम बालक के मस्तिष्‍क पर रोली से तिलक लगाकर अक्षत लगाएं, फिर सिर पर बारी बारी से कपास , दुर्वा , सुपारी उसके मंगल की कामना करें। फिर दीप से उसकी आरती उतारें।बालक को माला पहनाते हुए उसके जीवन को फूलों जैसा बने रहने की कामना करे। अंत में मिठाई से बालक का मुंह मीठा करते हुए यह मंगल कामना करें कि यह बालक अपनी मधुर वाणी से सबका प्रिय बनें। जन्‍मदिन के लिए एक हिन्‍दी गीत यहां प्रस्‍तुत है...........

सुदिनं सुदिनं जन्‍मदिनम् तव, भवतुमंगलम् जन्‍मदिनम्।
विजयी भव सर्वत्र सर्वदा , जगति भवतु तव सुयशोगानम्।।

इस गीत के पश्‍चात् सभी बडों का प्रणाम करके बालक आशीर्वाद प्राप्‍त करे और सभी उपस्थित लोगों को अपने हाथ से मिठाई और अल्‍पाहार दे। इस दिन गरीबों और अनाथों को भी बच्‍चे के अपने हाथ से कुछ न कुछ दान करवाएं , तभी हमारे भारतीय संस्‍कार बच्‍चे में आ सकते हैं।

( लेखिका .. श्रीमती निर्मला जी , कोटा)




Sunday, 22 November 2009

पेड पौधों के बाद जीव जंतुओं का विनाश .. ये समाप्‍त हो गए तो फिर क्‍या करेंगे आप ??

आज मानव की दानवीय कूरता के चंद उदाहरण आपके सामने रख रही हूं .....

दही और वनस्‍पति से बननेवाली माइकोबायल रेनेट का उपयोग न कर अधिक जायकेदार चीज बनाने के लिए गाय के बछडे के पेट में रेनेट नामक पदार्थ को प्राप्‍त करने के लिए नवजात बछडों का वध कर दिया जाता है । जिसकी मां का अमृत समान दूध हमारे बच्‍चों के विकास में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करता है , उसी बच्‍चे का जीवन हम अपने स्‍वाद के लिए ले लेते हैं। छि: छि: यह हमारा कैसा व्‍यवहार है ??

चूंकि लोगों को शुतुरमुर्ग के पंखों से प्‍यार है , पंख विकसित होने तक इंतजार किया जाता है और पंख नोच लेने के बाद इसकी खाल नोची जाती है। खरोंचने और नोचने का यह क्रम तबतक चलता है जबतक शुतुरमुर्ग के प्राण पखेरू उड न जाएं। खाल का थैला बनता है और पंख आपके टोप में खोंस दिए जाते हैं। मात्र फैशन के लिए इतनी क्रूरता ??

बिल्‍ली से बहुत छोटा बिज्‍जु नामक जानवर को बेंतो से इतना पीटा जाता है कि यह उद्वेलित हो जाए। लगातार पिटाई के दौरान उद्विग्‍न अवस्‍था में इसके शरीर से जो तरल पदार्थ निकलता है , उसमें से सुगंध निचोडे जाने के लिए उसकी ग्रंथियों को चाकू से लगातार खरोंचा जाता है। सुगंध प्राप्‍त करने के लिए ऐसा अनर्थ ??

लिपिस्टिक में प्रयुक्‍त होनेवाले रसायनों में जहर की जांच के लिए दर्जनों बंदरों को बैठाकर उनके गले में ट्यूब के जरिए अनेक प्रकार के तरल पदार्थ पेट में पहुंचा दिए जाते हैं, इससे अधिकांश बंदरों का मरना तय होता है। इतना जहर पचाकर जो बंदर नहीं मरते , उनका पोस्‍टमार्टम महज इसलिए किया जाता है कि वे क्‍यूं नहीं मरे ? दिनभर के प्रयोग के बाद सायंकाल में बंदरों की लाशों को कूडे की तरह फेक दिया जाता है। उनके दर्द को कोई क्‍यूं नहीं समझता ??

अपनी बडी बडी सुंदर गोल आंखे और चेहरे के नादान भाव वाले स्‍लैण्‍डर लोरिस नाम के छोटे से बंदर का शिकार कर उसकी आंखे और दिल निकाल ली जाती है और इसे पीसकर सौंदर्य प्रसाधन बनाया जाता है , भला इतने जानवरों की मौत से हमारा चेहरा मुस्‍कुरा सकता है ??

जिंदे सांप के खाल को ख्‍ींचने में होने वाली सरलता के कारण सांप के सिर को कील से पेड के तनों पर ठोक दिया जाता है , जिंदा सांप तडपता रहता है और चाकू की मदद से उसकी खाल उतरती रहती है , आदमी हैं या राक्षस हैं हम ??

अापकी ऑफ्टर शेव लोशन आपकी गाल पर फोडे फुंसी तो नहीं करेंगे , यह जानने के लिए गिनी पिग की खाल को बार बार खरोंचकर उसकपर लेप कर इसका परीक्षण किया जाता है , इस परीक्षण में न जान कितने गिनी पिग मारे जाते हैं। कहां का न्‍याय है ये ??

केवल कश्‍मीर की घाटियों में ही पाया जानेवाला को पकडने के लिए घास के अंदर कंटीले लोहे के ऐसे जाल बिछाए जाते हैं , कि बेचारा हरिण पैर रखते ही फंस जाता है। छटपटाते हुए वह लहूलुहान अपने पैर को उस इस्‍पाती शिकंजे से निकालने की बराबर चेष्‍टा करता है और सि‍सक सिसक कर प्राण त्‍याग देता है। इस प्रकार पकडे गए औसतन तीन हरिणों मे से दो को या तो बेकार समझकर वहीं पडे रहने दिया जाता है क्‍यूंकि या तो वे कस्‍तूरी मृग नहीं होते या व्‍यवसायिक दृष्टि से अनुपयोगी समझे जाते हैं , क्‍या मूल्‍य है उनकी जान का ??

मगरमच्‍छ को चालाकी से बाहर लाया जाता है और एकाएक उसकी नाक में एक पैना छुरा घोंप दिया जाता है , ताकि उसका जीवन समाप्‍त हो जाए। उसकी खाल का उपयोग चमडे के रूप में महिलाओं के पर्स या सूटकेस बनाने में किया जाता है , क्‍या इसके बाद भी आप कहेंगे कि मगरमच्‍छ झूठे आंसू बहाता है ??

(कल्‍याण से साभार)




Saturday, 21 November 2009

'सरीन खत्री' की उत्‍पत्ति और इतिहास के बारे में काफी विवाद हैं !!

(खत्री सीताराम टंडन जी के सौजन्‍य से)
दिल्‍ली निवासी एक खत्री किशन दयाल द्वारा लिखे गए फारसी ग्रंथ 'अशरफुल तवारीख' के अनुसार 'सरीन' शब्‍द 'शरअ ए आइन' का अपभ्रंश है , जिसका अर्थ है मुसलमानी कानून को मानने वाले। सम्राट अलाउद्दीन खिलजी के राजमंत्री ऊधरमल तथा अन्‍य जिन खत्रियों ने विधवा विवाह संबंधी राजाज्ञा में अपनी स्‍वीकृति दे दी थी या हस्‍ताक्षर कर दिए थे , उन्‍हें राजाज्ञा के विरूद्ध आंदोलन करनेवाले विद्रोही खत्री नीची निगाहों से देखने लगे थे और उन्‍हें 'शरअ ए आइन' कहने लगे , जो बाद में बिगडकर 'सरीन' हो गया। वैसे हस्‍ताक्षर कर देने के बावजूद विधवा विवाह उनके यहां भी प्रचलित नहीं हुआ था।

कुछ लोगों की यह भी मान्‍यता है कि इन्‍होने विधवा विवाह का समर्थन किया था और वे इसमें डटे रहे थे। भले ही अन्‍य खत्रियों ने उनके साथ विवाह संबं‍ध बंद कर दिया हो , पर इस समर्थन पर उन्‍हें लज्‍जा नहीं गर्व था और इस शूरता के कारण ही वे सूरेन और बाद में 'सरीन' कहलाए।

सरीन सभा जनरल , लाहौर के मत के अनुसार सरीन शब्‍द 'सद्दीन' से निकला है , जिसका अर्थ सौ होता है। अर्थात् इसमें सैकडों वंश के लोग सम्मिलित हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि सरीन शब्‍द सुरेन या सुरेन्‍द्र से निकला है। अत: जो वंश देवताओं की भांति उज्‍जवल और पवित्र था , वह सरीन हुआ।

यह भी कहा जाता है कि जिन लोगों ने परशुराम जी के क्षत्रिय संहार के समय आत्‍मसमर्पण कर उनकी शरण ली , उनके अपराध को परशुराम ने क्षमा कर दिया। उसी 'शरण' के कारण उनके वंशज सरीन कहलाए।

( लेखक .. सीताराम टंडन जी)




Friday, 20 November 2009

खत्री संत कुमार टंडन जी की एक कविता पढें !!

आपलोगों ने खत्री संत कुमार टंडन 'रसिक' जी का नाम अवश्‍य सुना होगा , हिन्‍दी में मुख्‍यत: कविता लिखनेवाले 'रसिक' जी ने समाज में रूढियों के विरूद्ध जागरूकता फैलानेवाले कई आलेख भी लिखे है। आज उनकी एक कविता आपलोगों को पढवा रही हूं , कारगिल युद्ध के बाद मिली भारत की विजय से उनकी भावनाओं ने इस कविता का रूप लिया था ......

लौटकर जाने न पाएगा अगर फिर आएगा ,
हम करेंगे जंग दुश्‍मन आंख यदि दिखलाएगा।
भूल अब हमसे न होगी , हम न धोखा खाएंगे,
सिर हथेली पर लिए हम वीर हैं लड जाएंगे।
धूल चाटेगा हमारी भूमि पर जो आएगा ,
जिंदगी भर दुश्‍मनी का अब सबक मिल जाएगा।।
लौट कर....................................

शांति के हम हैं पुजारी , किंतु कायर तो नहीं ,
मिल नहीं सकती शहीदों की मिसालें है कहीं।
दोस्‍ती के अब दिखावे में न भारत आएगा ,
जो दगाबाजी करेगा , देश वह पछताएगा।
लौट कर ....................................

शूरवीरों की सपूतों की यही तो शान है ,
प्राण कर देंगे निछावर देश हित यह आन है।
हर लडाई में विजय का दिन सुनहरा आएगा,
आदमी , हर आदमी , फौलाद का बन जाएगा।
यह तिरंगा चोटियों पर रात दिन लहराएगा ।।
लौट कर ...................................




Thursday, 19 November 2009

खत्रियों को कर्तब्‍य की ओर प्रेरित करने के लिए इस ब्‍लाग की आवश्‍यकता पडी !!

मात्र 20 दिन पूर्व शुरू किए गए इस ब्‍लाग पर रवीश कुमार जी की नजर ठहर जाएगी और ब्‍लाग जगत के बारे में लखे जानेवाले प्रिंट मीडिया के अच्‍छे स्‍तंभों में से एक यानि 'दैनिक हिन्‍दुस्‍तान' के ब्‍लाग वार्ताकॉलम में इसकी इतनी जल्‍दी जगह बन जाएगी , इसकी हमने कल्‍पना भी नहीं की थी। इसलिए पूरे भारतवर्ष के खत्री समाज को बहुत खुशी हुई है। पर अभी तक हमलोगों ने अभी बहुत कम पोस्‍ट डाला है , शायद इसलिए इस ब्‍लाग को बनाने के असली लक्ष्‍य को लेकर आपलोगों के मन में दुविधा बनी होगी। मैने इस ब्‍लाग के अपने पहले आलेख में ही स्‍पष्‍ट कर दिया था कि हमारी मंशा स्‍वार्थपूर्ण होते हुए भी देश हित में होगी , ठीक उसी तरह जैसे एक मां के द्वारा बच्‍चों का पालन पोषण स्‍वार्थ है , पर वह अच्‍छी तरह होता है , तो उससे देश को एक अच्‍छा नागरिक मिलता है। जाति पर आधारित समाज को लेकर बने इस ब्‍लॉग के औचित्‍य को लेकर एक दो पाठकों के सवालिया निशान के बाद इस वार्ता में भी रवीश जी के द्वारा यह लिखा जाना भी बिल्‍कुल स्‍वाभाविक है , 'खत्री समाज के लोगों की व्यापक उपलब्धियों के बाद भी इस तरह की कसक परेशान करती होगी, हैरानी होती है।'

सबसे प्राचीन ऋग्वेद के जिस श्लोक में सर्वप्रथम वर्ण व्यवस्था के जन्म का उल्लेख मिलता हैं वो "पुरुष सूक्त" (१०।९०।१२) में कुछ इस प्रकार से वर्णित हैं - "बराह्मणो अस्य मुखमासीद बाहू राजन्यः कर्तः ऊरूतदस्य यद वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अर्थात् " उस विराट पुरूष के मुख से ब्राह्मण, बाँहों से क्षत्रिय , पेट से वैश्य और पांवो के शूद्र का जन्म हुआ। यदि आज के वैज्ञानिक युग में इस बात को अंधविश्‍वास ही माना जाए , तब भी एक बात तो स्‍पष्‍टत: समझ में आती है कि यदि एक मनुष्‍य के समान ही किसी समाज की कल्‍पना की जाए तो समाज में बुद्धिमानों का महत्‍व और प्रतिशत लगभग उतना ही होता है , जितना एक शरीर में सर का। समाज की शक्ति को दर्शानेवाली शक्तिशाली और हिम्‍मतवर लोगों की संख्‍या उससे कुछ अधिक मानी जा सकती है , यानि शरीर का उसके धड में स्थित दोनो बांह और छाती के बराबर का हिस्‍सा। रोजी रोटी के लिए या व्‍यापार के साधनों पर अधिक ध्‍यान देनेवालों की संख्‍या उससे कुछ अधिक होती है यानि सचमुच पेट का हिस्‍सा उनका माना जा सकता है। और जिस तरह शरीर का आधा भाग कमर से लेकर पैरों तक का होता है , उसी तरह समाज में आधे से अधिक लोग ऐसे होते हैं , जो स्‍वयं किसी प्रकार का काम नहीं कर सकते यानि वो न तो बुद्धिमान होते हैं , न शक्तिशाली , न ही संसाधनों को संभालने लायक , पर मेहनती होते हैं और उन्‍हें कोई रास्‍ता दिखा दिया जाए तो पैरों के स्‍वभाव के अनुरूप ही उसपर चल सकते हैं। ठीक हमारे पैरों की तरह जो दिमाग , ताकत और खाने पीने से चलता है, पर उसी पर सारा शरीर आधारित होता है , शूद्रों की मेहनत पर ही पूरे समाज की सफलता आधारित होती है।समाज के अंदर ही असामाजिक तत्‍वों की उपस्थिति मुझे इतने ही प्रतिशत दिखाई देती है , जितना एक शरीर में नाखूनों का होता है , जिन्‍हें समय समय पर काटकर समाप्‍त करना आवश्‍यक होता है।

आज भी सरकार या प्राइवेट संस्‍थाओं के ओर से विभिन्‍न तरह की प्रतियोगिताओं के द्वारा हर क्षेत्र में उसके अनुकूल लोगों का चुनाव किया जाता है। सिर्फ कर्म और मेहनत से सफलता हाथ नहीं आती है , किसी भी व्‍यक्ति में उस तरह की कुछ जन्‍मजात प्रतिभा का होना बिल्‍कुल आवश्‍यक है। इसी आधार पर प्राचीन सामाजिक विभाजन ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों में किया गया था जिसका उद्देश्य सामाजिक संगठन, समृद्धि, सुव्यवस्था को बनाये रखना था। अब आज की ही तरह यह आवश्‍यक नहीं कि हर वर्ण के लिए ईमानदारी से ही चयन कर वर्ण व्‍यवस्‍था बनायी गयी हो। फिर भी हर क्षेत्र में 80 प्रतिशत से अधिक लोग तो क्षेत्र विशेष के अनुकूल गुण से युक्‍त होंगे ही। अब उन्‍हीं के मध्‍य विवाह के कारण आनेवाले बच्‍चों में भी उस प्रकार के जीन की अधिकता और साथ ही उसी ढंग के देखभाल होने से पीढी दर पीढी उस तरह के स्‍वभाव का बना रहना निश्चित ही था। फिर भी अपवाद स्‍वरूप हर प्रकार के स्‍वभाव रखनेवाले लोग हर वर्ण में होंगे ही , जिसके कारण हर क्षेत्र का विकास हुआ। पर इसके बावजूद चार वर्णो का गुण और कर्म के आधार पर विकास किए जाने से ब्राह्मणों की पंडिताई , क्षत्रियों की हिम्‍मत , वैश्‍यों की व्‍यवस्‍था और शूद्रों की मेहनत में अधिक शक तो नहीं किया जा सकता। पर इससे भी अधिक महत्‍वपूर्ण भारतीयता रही होगी , जो चारो वर्णों में समान रूप से पायी जाती रही।

मेरे विचार से ये चारो वर्ण समाज के विकास में सहयोगी हुए , क्‍यूंकि ब्राह्मणों के कारण शिक्षा , वैश्‍यों के कारण व्‍यापार के साथ ही साथ शूद्रों के कारण उत्‍पादन तो बढा ही, कला का भी इतना विकास हुआ। पर समाज के सब लोगों की सुरक्षा का भार क्षत्रियों पर ही रहा और उसे उन्‍होने बखूबी निभाया। समय के साथ 'खत्री' कहे जाने वाले क्षत्रियों ने जीवन निर्वाह के लिए  विभिन्‍न प्रकार के व्‍यवसायों को किया, खेती बारी और कई तरह के काम में भी ये सम्मिलित रहें। पढाई लिखाई के क्षेत्र में भी इन्‍होने काफी तरक्‍की की, पर ऊंचे ऊंचे पदों पर प्रतिष्ठित होकर भी इन्‍होने विरले इसका दुरूपयोग किया हो। तरह तरह के व्‍यवसायों में शीर्ष स्‍थानों पर पहुंचकर न सिर्फ इन्‍होने काफी नाम ही नहीं कमाया , अपने फर्मों में काम करनेवाले कर्मचारियों की संतुष्टि का भी ख्‍याल रखा। गांवों में भी ये प्रमुख रहे हैं , जिन गांवों में ये बसे , उस क्षेत्र में स्‍थानीय विवादों का निबटारा इन्‍हीं के हिस्‍सों में रहता है। सफलता के लिए इन्‍होने अपनी मेहनत का सहारा लिया है , किसी के टांग खींचकर आगे बढने की प्रवृत्ति इनमें नहीं रही है। इससे भी जो बडी खूबी रही वह यह कि अपने जाति की बात तो दूर , अपने घर के नालायकों में भी इनको कोई मोह नहीं होता , ये उन्‍हें घर से निकालने तक में परहेज नहीं करते , अपनी संपत्ति से वंचित करने में भी परहेज नहीं रखते। समाज के हर धर्म और हर वर्ण के लोगों को इन्‍होने समान भाव से देखा। मानव जाति क्‍या , पशु पक्षी तक के मामलों में इनके विचार बहुत अच्‍छे थे , तभी तो खत्री परिवारों में मांसाहार वर्जित था। अभी तक भी खत्री परिवारों के खास मौकों यानि शादी विवाह , मुंडन जनेऊ या जन्‍मदिन की पार्टियों में मांसाहार वर्जित है। आज भी काफी हद तक खत्री इन नियमों का पालन कर ही रहे हैं। फिर भी इन्‍हे वैश्‍य समझे जाने का कोई तुक नहीं था , प्रमाण देने पर इन्‍होने इसमें तुरंत  सुधार भी कर लिया। इसलिए इसकी अब कोई कसक हमारे मध्‍य नहीं है। 

लेकिन इन्‍हीं बातों से आज इनकी प्रशंसा नहीं की जा सकती। 'खत्रियों' का मुख्‍य लक्ष्‍य अपने पूरे मानव समाज की रक्षा करनी है, इसके लिए उन्‍हें एकजुट होना पडेगा। आज हमारे सामने जो चुनौतियां हैं , जो कठिनाइयां हैं , उनसे मुकाबला करना होगा। मनुष्‍य अपने स्‍वार्थ के लिए अपनी मनुष्‍यता खोता जा रहा है, आनेवाले समय में भारतीय समाज बडे ही विकट संकट से गुजरनेवाला है , ऐसे में खत्रियों को समाज के प्रति अपने कर्तब्‍यों को याद रखना होगा। समस्‍याओं को दूर करने लिए हममें क्षमता की कमी नहीं , पर तैयारी हमें अभी से ही करनी चाहिए , इसके लिए उनका संगठित होना बहुत आवश्‍यक है। सभी धर्म और सभी जाति के लोग पहले भारतीय समाज के हिस्‍से हैं , ये वास्‍तव में हमारे भाई हैं , इसे न भूलते हुए हमें सबों के कल्‍याण के लिए कार्यक्रम बनाने होंगे। इस आलेखमें खत्री कृष्‍ण चंद्र बेरी जी ने इसी कारण से खत्रियों को एकजुट होने का आह्वान किया है।उन्‍होने लिखा है कि बेरोजगारी , निर्धनता और शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍यहीनता से बडी समस्‍या आज सामाजिक विघटन की है। तरह तरह के बहाने गढकर स्‍वार्थी लोग बहाने बना बनाकर जनता को विभिन्‍न आधारों पर विभक्‍त करने का काम कर रहे हैं। इसी प्रकार स्‍वार्थों के वशीभूत होकर सती जैसी बर्बर और अशास्‍त्रीय रूढि का पुनरूत्‍थान करने और कहीं कहीं धर्मग्रंथों की शाब्दिक सीमाओं में बंधकर विधवाओं को उनके मानवीय अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है।खत्रियों की महत्‍वपूर्ण भूमिका की परंपरा यदि हमें बनाए रखनी है , तो हमें स्‍वप्रेरणा के बल पर आज की समस्‍याओं से टक्‍कर लेनी होगी।

(लेखिका .. संगीता पुरी)




Wednesday, 18 November 2009

हिन्‍दुस्‍तान के ब्‍लाग वार्ता में 'हमारा खत्री समाज' की चर्चा .. शुक्रिया रवीश कुमार जी !!







इस चर्चा को आप इंटरनेट में इस लिंक पर भी पढ सकते हैं !







Tuesday, 17 November 2009

हिन्‍दू धर्म और सिख धर्म को जोडनेवाली कडी भी खत्री ही है !!

सिक्‍खों का इतिहास वास्‍तव में सिक्‍ख खत्री गुरूओं का ही इतिहास है , जो गुरू नानक से गुरू गोविन्‍द सिंह तक बताया जाता है। सिख धर्म प्रचारक गुरू नानक लाहौर जिले के तलबंडी (ननकाहा साहिब)  के वेदी खत्री थे। उनके उत्‍तराधिकारी गुरू अंगद टिहुन खत्री थे। उसका असली नाम लहना था। गुरू अमरदास ( 1552-1574) भल्‍ला खत्री थे। हरमंदिर या स्‍वर्णमंदिर के संस्‍थापक गुरू रामदास (1554-1581 ) खत्रियों की सोढी अल्‍ल के थे। गुरू गोविंद सिंह ने अपने ग्रंथ 'विचित्र नाटक के अध्‍याय दो से 4 में अपनी और गुरू नानक की उत्‍पत्ति भगवान रामचंद्र के पुत्र लव और कुश के वंश में बतायी है। गुरू गोविन्‍द सिंह सिक्‍खों के अंतिम गुरू थे।

मुगल काल में सिक्‍ख खत्री गुरूओं के इतिहास की एक अलग ही कहानी है। 1901 की जनगणना के कुल 1030078 खत्रियों की जनसंख्‍या में 60685 सिख खत्री दर्ज किए गए थे। इस जनगणना में जैन धर्म को माननेवाले 704 और बौद्ध धर्म को माननेवाले 27 खत्री भी दर्ज किए गए थे। आज इन सिक्‍ख खत्रियों में कुछ अल्‍ले विशेष रूप से पायी जाती हैं , जैसे अगिया , अरिन , उहिल , एलवी , कालछर , खुमाड , गंगादिल , चारखंडे , चुनाई , छेमदा , जुडे , तिपुरा , तेहर , थागर , पखरा , फलदा , भगादि , भोगर , मालगुरू , बालगौर , वाहगुरू , शोडिल , हेगर , हूगर औ हांडी वगैरह ।

हिन्‍दू और सिक्‍ख खत्रियों का संबंध तो पूरी तरह रोटी बेटी का सा एक ही रहा है। दोनो का खान पान , विवाह संस्‍कार और अन्‍य प्रथाएं भी एक जैसी रही हैं। एक समय में खत्री परिवार में पैदा होनेवाला पहला बालक संस्‍कार करके सिख बनाया जाता था। अरदास और भोग हिन्‍दु खत्रियों में भी समान रूप से प्रचलित था। सिक्‍ख खत्रियों में गुरू नानक वेदी और अन्‍य सभी सोढी खत्री थे। सिक्‍ख खत्री आज भी अपने नाम के साथ खत्री ही लगाते हैं , ताकि उनमें और जाट सिक्‍खों में अंतर किया जा सके तथा अन्‍य सिखों में उन्‍हें आसानी से पहचाना जा सके।

इस तरह हिन्‍दू और सिख धर्म को जोडनेवाली कडी खत्री ही है। धर्म से उनके बीच कोई फर्क नहीं पडा है तथा दोनो ही धर्म मानने वाले खत्री साथ साथ भोजन तो करते ही हैं , विवाहादि संबंध भी वैसे ही करते हैं , जैसे वैश्‍य वर्ग के लोग जैनियों से करते हैं। बीच में आतंकवादी गतिविधियों के कारण इसमें कुछ व्‍यवधान अवश्‍य आया था , पर समय के साथ पुन: यह प्रभावहीन होता चला गया और पंजाब में हिन्‍दुओं और सिखों के मध्‍य विभाजन नहीं हो सका।इस राजनीतिक चाल का असफल हो जाना बहुत अच्‍छी बात रही। यह सिख हिन्‍दु मैरिज एक्‍ट और डाइवोर्स एक्‍ट के अधीन ही आते हैं। इस तरह शताब्दियों पुरानी खत्री जाति परंपराएं , रीति रिवाज और संबंधों की ही ऐसी कडी बनाता आया हैं , जिन्‍हें व्‍यक्तिगत स्‍वार्थवश नहीं तोडा जा सकता।

( लेखक .. सीताराम टंडन जी)




Monday, 16 November 2009

पुस्‍तक के दूसरे खंड में मुसलमान खत्रियों की महान विभूतियों ,महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों के साथ ही साथ कल्‍याणकारी संस्‍थाओं का विवरण है !!

कल के आलेख में कुछ समय पूर्व यानि 1975-1976 में हाजी यूसुफ आला राख्‍या पटेल करांची नाम के एक मुसलमान खत्री ने इन खत्रियों पर किया गया अध्‍ययन के गुजराती भाषा में दो खंडों मे प्रकाशित किए जाने की चर्चा हुई थी , जिसमें वर्तमान पाकिस्‍तान के ही नहीं , भारत और पाकिस्‍तान के बाहर रहनेवाले मुसलमान खत्रियों का भी विस्‍तृत विवरण दिया गया था। पहले खंड के बारे में आपको संक्षेप में जानकारी दे ही दी गयी थी , इस पुस्‍तक के दूसरे खंड में मुसलमान खत्रियों की महान विभूतियों ,महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों , संस्‍थाओं के साथ ही साथ कल्‍याणकारी संस्‍थाओं का भी विवरण दिया गया है।

इस खंड की मुख्‍य रोचक बात इसकी प्रस्‍तावना है , जिसमें मुसलमान खत्रियों द्वारा अपने मूल वंश में जन्‍म पर गर्व प्रकट किया गया है और अपनी व्‍यक्तिगत पहचान बनाए रखने पर प्रसन्‍नता जाहिर की गयी है। इनके अनुसार धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन जाने से जाति का प्राचीन सांस्‍कृतिक गौरव नष्‍ट नहीं हो जाता है। सबसे बढकर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि पोशाक , धर्म और देश तक के भिन्‍न हो जाने से उनके मध्‍य जातिप्रेम की कमी नहीं अायी। इनके विवाह संबंध भी अपने ही मुसलमान तड या जाति में होते हैं। वे अभी भी अनेक मूल खत्री प्रथाओं तथा रिवाजों का पालन करते हैं। ऐसा भी ज्ञात हुआ था कि अनेक मुसलमान खत्री अपने लडके लडकियों की जन्‍म‍पत्रिका मिलाकर विवाह करने को उत्‍सुक रहे हैं।

सन् 1930 के आसपास फजले हसन नाम के एक मुसलमान खत्री वाइसराय की एक्‍जेक्‍यूटिव कौंसिल के मेंबर थे। वह सहगल खत्री थे और विवाह की साइत निकालने के लिए ब्राह्मण पुरोहित को बुलवाया करते थे। इसका उल्‍लेख दुर्गादास ने अपनी पुस्‍तक 'इंडिया फ्राम कर्जन टू नेहरू' में भी किया है। ऐसी ही प्रथा अभी तक लखनऊ में बसे कुछ मुसलमान गद्दी परिवारों में भी पायी जाती है। ऐसे कुछ परिवार गुजरात और पंजाब के बाहर भी जाकर बस गए थे , यद्यपि वे अपना मूल भूल गए हैं। पहले कुछ मुसलमान खत्री अपने मुसलमानी नाम के साथ अपनी खत्री अल्‍ल भी लगाया करते थे। पाकिस्‍तानी पंजाब में अब यह प्रथा काफी कम हो गयी है। यूसुफ पटेल का कहना है कि इन मुसलमान खत्रियों को अपने नाम के साथ खत्री लगाने में कोई दिक्‍कत नहीं थी , पर कुछ ने अपने प्रशासनिक पदवियों को अपने साथ लगा रखा था , जैसे युसुफ साहब के नाम के साथ खुद पटेल की पदवी लगी थी

( लेखक .. सीताराम टंडन जी)




Sunday, 15 November 2009

पंजाब के खत्री मुसलमान लोग 'खोजा' कहलाते हैं !!

डी इब्‍टेशन के 'पंजाब कास्‍ट्स' के पृष्‍ठ 248 के अनुसार करीब 2600 मुसलमान खत्री मुल्‍तान और झंग में बसे हुए थे और उन्‍हें वहां खोजा कहा जाता था, क्‍यूंकि इनमें से ज्‍यादा खत्री कपूर अल्‍ल के थे। शाहपुर के लगभग सभी खोजा खत्री ही हैं , पर झांगे में बसे खोजा इस्‍लाम धर्म अपनाने वाले पूर्व के अरोडा खत्री हैं। मुसलमान फेरीवालों के लिए पंजाब में एक शब्‍द 'पारचा' भी प्रयुक्‍त किया जाता है। नमक की पहाडियों की तरफ के इन पारचाओं का मुख्‍यालय पिंडी के पास मुखाड में है तथा अटक और पेशावर में इनकी बडी बडी बस्तियां हैं , जहां से ये मध्‍य एशिया के शहरों में दूर दूर तक सूती , रेशमी वस्‍त्र , नील और चाय का दूर दूर तक व्‍यापार करते थे।

यह कहा जाता है कि शाहजहां के समय में ये मूलखंड से आकर बसे थे। कोई कोई कहते हें कि ये लाहौर के खत्री थे , जिन्‍हें जमनशाह ने निकाल दिया था। ये अपनी लडकियां सिर्फ पारचा लोगों को ही देते हैं। यद्यपि कभी कभी वे बाहर से लडकियां ले लेते हैं। इनमें हिन्‍दुओं की राजा उपाधि अभी तक चलती है। कुछ समय पूर्व यानि 1975-1976 में हाजी यूसुफ आला राख्‍या पटेल करांची नाम के एक मुसलमान खत्री ने इन खत्रियों पर किया गया अध्‍ययन गुजराती भाषा में दो खंडों मे प्रकाशित किया था, जिसमें वर्तमान पाकिस्‍तान के ही नहीं , भारत और पाकिस्‍तान के बाहर रहनेवाले मुसलमान खत्रियों का भी विस्‍तृत विवरण दिया गया था। यूसूफ ए पटेल स्‍वयं कच्‍छ के रहनेवाले थे और सन् 1948 में पाकिस्‍तान चले गए थे। पाकिस्‍तान में वे पाकिस्‍तान खत्री कान्‍फ्रेंस के अध्‍यक्ष भी रहें।

उन्‍होने पाकिस्‍तान में रहनेवाले खत्रियों का ही नहीं , भारत में रहनेवाले खत्रियों का भी सांस्‍कृतिक और ऐतिहासिक अध्‍ययन प्रस्‍तुत किया है। इस अध्‍ययन में कच्‍छ , मकराना , गुजरात , काठियावाड , सिंध , मांडवी , मालवी और करांची के हलाई मुसलमान खत्रियों पर विशेष अध्‍ययन प्रस्‍तुत किया गया था तथा हिन्‍दू और मुसलमान दोनो प्रकार के सिन्‍धी खत्रियों का भी जिक्र है। इस बुजुर्ग विद्वान लेखक ने अलग अलग स्‍थानो पर उनकी केवल जनसंख्‍या ही नहीं दी , बल्कि सामाजिक प्रथाओं और रीति रिवाजों का भी विस्‍तृत विवरण दिया है। उन्‍होने यह भी बताया कि कच्‍छ , काठियावाड , सिन्‍ध , गुजरात में मुसलमान खत्रियों के 56 मुखिया हैं। उनके दिए खत्री परिवारों की जनसंख्‍या के आंकडे तो रोचक है ही , साथ ही उसमें मुसलमान खत्री समुदाय को उदार दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी गयी है और उनके कल्‍याण की भी कामना की गयी है।

( लेखक .. सीताराम टंडन जी)




Saturday, 14 November 2009

यत्र तत्र खासकर कच्‍छ में कुछ खत्री मुसलमान भी बन गए थे !!

(खत्री सीताराम टंडन जी के सौजन्‍य से)
1901 की जनगणना रिपोर्ट , पृष्‍ठ 289 में मुसलमान खत्रियों की जनसंख्‍या 11751 लिखी गयी है , जिसमें पंजाब तथा देश के अन्‍य भागों में बसे खत्री मुसलमानों की संख्‍या शामिल है। बंबई गजेटियर में कच्‍छ के मुसलमान खत्रियों का खासकर उल्‍लेख किया गया है। ये खत्री 16वीं शताब्‍दी के मध्‍य में सन् 1554 के आसपास सिंध से आए बताए जाते हैं। कहा जाता है कि किसी खत्रिय का अपने पुरोहित सारस्‍वत ब्राह्मण से किसी कारणवश झगडा हो गया था , इस कारण उसने इस्‍लाम धर्म स्‍वीकार कर लिया। गुजरात का एक अन्‍य खत्री ने भी परिस्थितिवश इस्‍लामधर्म स्‍वीकार कर लिया था। यद्यपि वह दबाबवश मुसलमान हो गया था , पर उसे अपने प्राचीन वंश पर बडा मान था। गुजरात में अहमदाबाद के निकट शंखे स्‍थान पर शेख अहमद खत्री मस्जिद और मकबरा बना है , जो सन् 1446 ईस्‍वी में बना था। इसका निर्माण मुहम्‍मद शाह द्वारा आरंभ किया गया था और पांच वर्ष पश्‍चात् कुतुबुद्दीन द्वारा पूरी किया गया।

सभी खत्री मुसलमान अपना सर मुंडाते , दाढी रखते और मुसलमानों के वस्‍त्र पहनते हैं। साफ रंग , चपटा चेहरा , लंबे कान और चौडे मस्‍तक वाले ये मुसलमान खत्री अत्‍यंत परिश्रमी और ईमानदार , सभ्‍य , मितव्‍ययी और शालीन हैं।ये रंगरेज , बढई , खरादी और कृषकों का काम करते हैं। इनकी औरतें सिलाई, कढाई और झालर बनाने में अत्‍यंत कुशल होती हैं। धार्मिक दृष्टि से ये कट्टर सुन्‍नी हैं औ आपस में ही शादी विवाह करते हैं। इनमें अधिकतर रूढिवादी हैं और नए व्‍यवसाय नहीं करते। अपने में से ही व्‍यक्तियों को चुनकर ये सामाजिक विवादों का निबटारा कर लेते हैं। खोजा , मेमन और बोहरे भी इस्‍लाम धर्म अपनाने वाले पूर्व क्षत्रिय यानि खत्रिय ही हैं।





भारतवर्ष के कई राज्‍यों में 'खेत्री' के नाम से जानेवाली जाति भी खत्री ही है !!

विशाखापतनम मैनुअल में 'खेत्री' नाम की एक अन्‍य जाति का भी विवरण है, जो जेपौर के जमींदार थे। इनके 16 कुल हैं , सभी जनेउ पहनते हैं। इसी जेपोर एजेंसी के क्षेत्र में कुछ खत्री कृषको का भी उल्‍लेख है , जो दक्षिण के जुलाहे खत्रियों से भिन्‍न हैं। ये सूर्य, बाघ , कच्‍छप और नागवंशी खत्रियों में बंटे हैं। ये अपनी कन्‍याओं का विवाह व्‍यस्‍क होने से पूर्व करते हैं और एक उडिया ब्राह्मण इनके विवाह संस्‍कार कराता है। संस्‍कार कन्‍या के घर पर होता है , वर विवाह के समय पहली बार जनेउ धारण करता है। इनका रंग साफ है और ये उडिया भाषा बोला करते हैं।

इतिहासों में यह उल्‍लेख मिलता है कि मई या जून सन् 1360 ईस्‍वी में वारंगल के युद्ध में राज्‍य के सब नगरों के हिन्‍दू महाजन तथा रूपए की अदला बदली करनेवाले व्‍यापारी राजाज्ञा से मार डाले गए। आर्थिक जीवन में उनका स्‍थान उत्‍तरी भारत की खत्री जाति ने ले लिया , जो कि उन विभिन्‍न सेनाओं के साथ आए थे , जिन्‍होने दक्षिण भारत पर आक्रमण किए। वे लोग फिरोज शाह बहमनी (1374-1422) के राज्‍य तक व्‍यापार और महाजनी के धंधे में सर्वेसर्वा रहें। उसके ही राज्‍य में मारे गए व्‍यापारियों के पुत्रों को पुन: अपना व्‍यापार आरंभ करने की आज्ञा मिली।

दक्षिण भारत के खत्री सामान्‍यतया अल्‍पसंख्‍यक और असंगठित होने के कारण पिछडेपन के शिकार हैं , अत: स्‍थानीय सरकारों ने आरक्षण नीति के अंतर्गत उन्‍हें पिछडे वर्ग में रखा है। तमिलनाडु में भी खत्री समाज को पिछडे वर्ग में ही रखा गया है।

(खत्री सीताराम टंडन जी के सौजन्‍य से)





Friday, 13 November 2009

रिजले साहब की भूल का दूषित कुप्रभाव समाज से दूर नहीं हुआ !!

हिन्‍दू समाज में खत्रियों की क्‍या स्थिति है , इस विवाद ग्रस्‍त प्रश्‍न पर पिछली सदी से पर्याप्‍त कहा लिखा जा चुका है। इस प्राचीन सैनिक जाति को तीसरी श्रेणी में रखकर रिजले ने काफी क्षति पहुंचायी। संभव है यह त्रुटि भूल या उपेक्षा से ही हुई हो। बाद में क्षमा मांगते हुए उन्‍होने इसे सुधार तो दिया और निश्‍चय ही इस विवादग्रस्‍त प्रश्‍न का अंत हो गया , पर ऐसा लगता है कि रिजले साहब की भूल का दूषित कुप्रभाव समाप्‍त नहीं हुआ। 'दी संविन मूर्स इंडियन अपील' द्वारा इस विषय पर अधिकारपूर्ण दृष्टिकोण से पर्याप्‍त प्रकाश डाला गया है। इसमें एक शती से भी पूर्व प्रीवी कौंसिल द्वारा सदा के लिए निर्णय कर दिया गया था कि खत्री लोग प्राचीन फिरकों या जाति में से एक प्रस्‍फुटित या निर्मित जामत का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। भारतीय समाज में अपनी वास्‍तविक स्थिति को निर्धारित करने के लिए इतना पर्याप्‍त था , पर ब्रिटीश कूटनीतिज्ञता की कार्यप्रणाली का क्‍या कहना ? उन्‍नीसवीं सदी के अंतिम भाग में जनगणना के कार्यों में हाथ लगाया गया और जानबूझकर यह अपकार कर डाला गया।

यदि ट्राइब्‍स एंड कास्‍ट्स ऑफ बंगाल के पहले खंड से कुछ उपयोगी वाक्‍यांश उद्धृत किए जाएं , तो अनुपयुक्‍त न होगा ' जाति की आंतरिक व्‍यवस्‍था इस बात की द्योतक है कि खत्री न तो ब्राह्मणों के वंशज हैं और न ही क्षत्रियों के । जो सिद्धांत उन्‍हें क्षत्रियों से संबंधित बताता है , उसका अस्तित्‍व किसी स्‍थायी नींव पर न होकर केवल नाम मात्र की समरूपता पर है। अपने रंगरूप के कारण वे अधिकारपूर्ण रूप से खुद को आर्यवंश के अंतर्गत रख सकते हैं। किन्‍तु उनके जिन विभिन्‍न भेदों का उल्‍लेख हुआ है , उसमें से कोई भी अस्‍थानीय नाम राजपूत वंश की विशेषताओं के द्योतक नहीं हैं। यदि वे उसी नस्‍ल के होते , जिनसे राजपूतों के विभिन्‍न कुल हैं , तो उनके भी वही जातीय नाम होते , यह समझना वास्‍तव में कठिन हो जाता है कि उन्‍होने कम महत्‍वपूर्ण पैतृक अल्‍लों के लिए उनका क्‍यूं परित्‍याग कर दिया।'

इस अवांछनीय मत के प्रति संपूर्ण देश में क्षोभ और क्रोध की आग फैल गयी। जिसके कारण जनगणना के कमिश्‍नर ने महाराजा बर्दवान को पत्र लिखकर इस त्रुटि का संशोधन कर दिया। इसमें इन्‍होने बताया कि ' बिना इस वितर्क पर जोर देते हुए कि मैं तुरंत कह सकता हूं कि मेरे सम्‍मुख जो प्रमाण रखा गया है , उससे यह बात स्‍पष्‍ट हो जाती है कि कम से कम ब्रिटीश भारत में साधारणतया खत्री हिन्‍दू परंपरा के क्षत्रियों के सच्‍चे प्रतिनिधि हैं। जनगणना के कार्य के लिए यह बात कि बहुत से लोगों का ऐसा विश्‍वास है और यह पूछना कि किन बातों के आधार पर वे ऐसा कहते हैं , निस्‍सर होगा। अत: जनगणना अधिकारियों को यह आदेश दिया जाता है कि क्षत्रियों के अंतर्गत ही जातियों के विभाजन के समय खत्रियों को समिमलित कर लिया जाए !!

(लेखक .. खत्री डा वैजनाथ पुरी जी)




Thursday, 12 November 2009

अंत में यमुना गंगा प्रदेश में आनेवाले खत्री अभी तक पंजाबी खत्री ही कहलाते हैं !!

पंजाबी खत्रियों का पूर्व की ओर गंगा यमुना प्रदेश में आने का समय व्‍यापक राजनीतिक चेतना और आजादी की नई लहर और जागृति का युग रहा है। इसलिए पंजाबियों की पूरी संस्‍कृति इनमें अभी तक दिखाई पड ही रही है। ये लोग बहुत शीघ्र ही अपने पहले आए खत्री भाइयों से घुल मिल गए और इनके विवाहादि संबंध भी पूर्विए और पच्‍छए दोनो से होने लगे।

पूर्विए खत्रियों ने कुछ प्रगतिशील कदम पहले ही उठा लिए थे। जैसे उन्‍होने समस्‍त अल्‍ल के खत्रियों के साथ आपस में विवाह संबंध करना शुरू कर दिया था , जबकि पच्‍छए चौजातिए ( मेहरोत्रे , खन्‍ने , कपूर और सेठ) अपने घेरे से बाहर आकर विवाह संबंध कायम करने में अभी पिछले 20 25 वर्ष पूर्व तक सकुचाते रहे हैं। यह प्रसन्‍नता की बात है कि अब ऐसा युग आ गया है कि समस्‍त खत्री जाति में संकीर्णता के बंधन टूअ गए हैं और अब समस्‍त खत्री भाइयों के मध्‍य , चाहे वे जिस अल्‍ल के हों या पूर्विए , पच्‍छए या पंजाबी जो भी हों , सबमें विवाह संबंध बिना रोक टोक होने लगे हैं और यह खत्रियों की प्रगति का चिन्‍ह है।

( खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंति विशेषांक से)




Wednesday, 11 November 2009

पच्छिए खत्रियों का पंजाब के साथ संबंध बना रहा !!

पच्छिए खत्रियों के आगमन का युग और उसके बाद की राजनैतिक अवस्‍था ऐसी थी , जिससे उनका पंजाब के साथ किसी न किसी प्रकार का संबंध बना रहा। पच्छिए खत्रियों के आगमन के आगमन के समय इनके पुरोहित सारस्‍वत ब्राह्मणों का एक बडा दल भी पंजाब से आकर इन प्रदेशों में बस गया। इन्‍हें अपने संस्‍कार रीति रिवाज संपन्‍न कराने के लिए अपने पुरोहित सुलभ थे। इस कारण ये अपने रीतिरिवाज को बनाए रखने में सफल रहे। इनमें क्षेत्रीय परिस्थितियों के कारण कुछ आवश्‍यक मामूली परिवर्तन ही देखने को मिलते हैं।

देश के बंटवारे के पूर्व तक पच्‍छए खत्रियों के अधिकांश बच्‍चे एक बार चोटी उतरवाने के लिए 'बाबे के मंदिर' में जाते थे और इस प्रकार पंजाब से उनका भावनात्‍मक संबंध सदैव बना रहा। इनके घरों में बोली जानेवाली भाषा भी शुद्ध खडी बोली रही। पच्‍छए खत्रियों के घर में नू(बहू), धी(पुत्री),  पुत्‍तर(पुत्र), भावो(मां), कुडी(लडकी), गुत्‍त(चोटी), का प्रयोग अभी तक होता आ रहा है। यहां तक कि विवाहादि अवसरों पर दोहे सिटनी में बडे स्‍तर पर पंजाबी शब्‍दों का प्रयोग होता है।

( खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंति विशेषांक से)

Tuesday, 10 November 2009

पूर्विए खत्री के साथ उनके प्रदेशों में सारस्‍वत ब्राह्मण नहीं जा सकें !!

प्रारंभ में पंजाब से आनेवाले खत्रियों के साथ खत्रियों के पुरोहित 'सारस्‍वत ब्राह्मण' नहीं जा सके थे और उन्‍हें अपने संस्‍कार , यज्ञोपवीत विवाह आदि के लिए ब्राह्मणों की आवश्‍यकता थी। संस्‍कारों का विधिवत संपन्‍न कराने के लिए उन्‍हें स्‍थानीय ब्राह्मणों में से ही अपने लिए पुरोहित पाधा को स्‍वीकार करना पडा। बहुत पहले से रहने के कारण उनकी बोली पर भी क्षेत्र का व्‍यापक प्रभाव पडना स्‍वाभाविक ही था। अत: खडी बोली के साथ ही साथ अवधी और ब्रजभाषा का व्‍यपक प्रभाव उनकी बोली चाली , रहन सहन पर पडा। उस समय की राजनीतिक उथल पुथल के कारण उनका संपर्क पंजाब के साथ नहीं रह सका।

पूर्विए खत्रियों ने अपने मूल पुरोहित सारस्‍वत ब्राह्मणों के अभाव और क्षेत्रीय लोकाचार के कारण पूर्व के अनेक रीति रिवाजों को भी अपना लिया। फिर भी खत्रियों के रक्‍त का प्रभाव ही था कि प्रतिकूल पारस्थितियों में भी वे खत्री जाति के मूल रूप को बनाए रखने में सफल रहें। विवाह संस्‍कार के शुभ अवसर पर 'घोडी' , 'तलवार' , 'वेदी' और हाथी दांत का 'चूडा' आदि खत्री विवाह संसकार की आवश्‍यक विशेषताओं को इन्‍होने कभी नहीं छोडा और अपने जाति का गौरव बनाए रखा।

( खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंति विशेषांक से)

Monday, 9 November 2009

सभी खत्रियों का मूल स्‍थान पंजाब ही है !!

सभी खत्री , वे चाहे जिस कुल , उपजाति या अल्‍ल के हों , उनका संबंध मूल रूप से सूर्यवंश और चंद्रवंश से ही है। देश , काल और अनेक कारणों से अल्‍लों में परिवर्तन होता रहा है , जिसके कारण खत्रियों की सक्‍डों अल्‍ले बन गयी हैं। अपने अस्तित्‍व और पवित्रता की रक्षा करने वाली एक महत्‍वाकांक्षी जाति में ऐसा होना स्‍वाभाविक ही है।

पंजाब के महत्‍वाकांक्षी खत्री पंचनद प्रदेश में ही बंधकर नहीं रह सके , वे आगे बढे और उनके कार्यक्षेत्र का विस्‍तार बढते बढते गंगा यमुना प्रदेश तक हो गया। खत्री पंजाब , दिल्‍ली , उ प्र बिहार और बंगाल तक फैल गए। एक विशेष बात यह भी रही कि खत्रियों ने प्राय। प्रमुख नगरों को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाया।

अल्‍ल कैसे परिवर्तित होती है , इसका अच्‍छा उदाहरण नेहरू परिवार है। स्‍व जवाहर लाल नेहरू जी ने अपनी पुस्‍तक 'मेरी कहानी' में लिखा है कि हमारे जो पुरखा सबसे पहले आए , उनका नाम था राजकौल। राजकौल को एक मकान और कुछ जागीर दी गयी। मकान नहर के किनारे था , इसी से उनका नाम नेहरू पड गया। कौल उनका कौटुम्बिक नाम था , बदलकर कौल नेहरू हुआ और आगे चलकर कौल गायब ही हो गया और महज नेहरू रह गया।

खत्री पंजाब से निकलकर पूर्व की ओर बढे और इस बढने के काल और क्रम से इनके तीन प्रमुख भेद बन गए ... पूर्विए , पच्छिए और पंजाबी। ईसा की आठवीं शताब्‍दी से 1700 ईस्‍वी तक जो लोग पंजाब से आगे बढकर यमुना गंगा के प्रदेश के विभिन्‍न भागों में बस गए , वे पूर्विए कहलाए। 1700 से 1900 के बीच जो परिवार पंजाब से आगे बढकर इन प्रदेशों में बसे , उन्‍हें पच्छिए कहा जाने लगा। जो पंजाब में ही रह गए , बहुत बाद में इन प्रदेशों में आए , वे पंजाबी कहलाए।

( खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंति विशेषांक से)




Sunday, 8 November 2009

बहुत चुनौतियां हैं अभी हमारे सामने

खत्री जाति ने प्रत्‍येक काल में अपनी जातिय अस्मिता बनाए रखने के साथ ही साथ संपूर्ण समाज की उन्‍नति और मानव मात्र की सेवा में अनवरत सहयोग दिया है। इससे यह बात निर्मूल सिद्ध हो जाती है कि जातिय चेतना का फल संकुचित मानसिकता होती है। हमारी स्‍वस्‍थ परंपरा का ही प्रभाव है कि यद्यपि उन शताब्दियों में जब कि सारा भारतीय समाज रूढिग्रस्‍त हो गया था , खत्री समाज में भी कुछ अस्‍वस्‍थ परंपराओं ने भले ही प्रवेश पा लिया हो , तथापि कुल मिलाकर इस जाति के लोग अग्रिम पंक्ति में बने ही रहें।

पर हमारे पूर्वजों ने जो किया , उसी में बात समाप्‍त नहीं हो जाती। खत्रियों की महत्‍वपूर्ण भूमिका की परंपरा यदि हमें बनाए रखनी है , तो हमें स्‍वप्रेरणा के बल पर आज की समस्‍याओं से टक्‍कर लेनी होगी। बेरोजगारी , निर्धनता और शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍यहीनता से बडी समस्‍या आज सामाजिक विघटन की है। तरह तरह के बहाने गढकर स्‍वार्थी लोग बहाने बना बनाकर जनता को विभिन्‍न आधारों पर विभक्‍त करने का काम कर रहे हैं। इसी प्रकार स्‍वार्थों के वशीभूत होकर सती जैसी बर्बर और अशास्‍त्रीय रूढि का पुनरूत्‍थान करने और कहीं कहीं धर्मग्रंथों की शाब्दिक सीमाओं में बंधकर विधवाओं को उनके मानवीय अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है।

खत्री समाज समय समय पर अपनी जाति में अस्‍वस्‍थ परंपराओं के विरूद्ध संघर्ष छेडता रहता है और उसमें यथेष्‍ट रूप से सफलता भी प्राप्‍त की है। पर हमें इतने से ही संतोष नहीं करना चाहिए और पूरे समाज के सुधार में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। हम इस कार्य के लिए सक्षम भी हैं , क्‍यूकि हमारी आर्थिक , शैक्षणिक , सामाजिक और वैचारिक स्थिति इतनी मजबूत है। जरूरत सिर्फ अपने दायित्‍व के बोध और दृढ निश्‍चय की है।कुरीतियों के विरूद्ध अभियान , एकता के प्रयास , स्‍वास्‍थ्‍य एवं शिक्षा का प्रसार , भ्रष्‍टाचार विरोध ओर ऐसे अन्‍य उद्देश्‍यों के लिए हमारे जातीय संगठनों को अग्रसर होना चाहिए। इसमें अन्‍य जाति के प्रगतिशील तत्‍वों का सहयोग भी लेना चाहिए ।

(लेखक .. खत्री कृष्‍ण चंद्र बेरी जी)




Saturday, 7 November 2009

खत्री परिचय

मात्र 'ख' और 'क्ष' में परिवर्तन बोलचाल भाषा की ही देन है। क्षत्रियों का व्‍यवसाय राज्‍य एवं युद्ध करना था , पर खत्रियों के व्‍यापार से संबंधित होने के कारण जनमत गणना अधिकारियों ने चाल चलते हुए इसे सम्‍मानित स्‍तर से एक श्रेणी नीचे रख दिया था। पर 1901 का सामाजिक जाति आंदोलन अपने ढंग का था और इसमें हमें सफलता मिली। इसी घटना ने जाति के इतिहास लिखने के लिए लोगों को प्रोत्‍साहित भी किया।

आज इतिहास का मोड बदल जाने के बाद 'खत्री' 'क्षत्री' समानता या एकीकरण की समस्‍या नहीं रह गयी है।राजनीतिक और प्रशासलनक क्षेत्रों में मध्‍य काल से ही खत्री उच्‍च पदों पर आसीन रहे हैं। अलाउद्दीन से लेकर मुगलों के समय तक इनका उत्‍तरी भारत की राजनीति में एवं प्रशासन , शिक्षा तथा वित्‍तीय क्षेत्र में अधिकार रहा। कई राज्‍यों में ये दीवान के पद पर भी असीन् रहे। व्‍यापार में इनकी सफलता दिल्‍ली , ढाका कलकत्‍ता ओर अहमदाबाद में इस स्‍तर तक पहुंच गयी थी कि विदेशी यात्रियों ने भी इसका विवरण दिया है।

साहित्‍य एवं धार्मिक क्षेत्रों में भी इन्‍होने फारसी , हिन्‍दी और उर्दू में रचनाएं की । इन्‍होने धर्म को राजनीति से जोडकर इसे एक नई दिशा दी। गुरू नानक से लेकर गुरू गोविंद सिंह जी तक सभी सिख गुरू खत्री ही थे। आधुनिक युग में इनका स्‍वाधीनता आंदोलन में भी बडा हाथ रहा। स्‍वतंत्रता प्राप्‍त करने के बाद भी ये सेना के तीनो अंगों में सर्वोच्‍च पदों पर रहें। जैसा कि भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्टिस हिदायत उल्‍ला ने मेरी पुस्‍तक 'खत्रीज ए शोसियो, हिस्‍टोरिकल स्‍टडीज' की भूमिका में लिखा है कि 'खत्री चाहे जिस क्षेत्र में रहे हों सदैव सर्वोच्‍च पद पर पहुंच चुके हैं' ।

(लेखक .. खत्री बैजनाथ पुरी जी)




Friday, 6 November 2009

खत्री जाति : एक सिंहावलोकन

खत्री जाति का इतिहास बहुत ही महत्‍वपूर्ण है। प्राचीन काल से ही यह जाति द्वितीय वर्ण यानि क्षत्रिय मानी जाती रही है। इस जाति में बडे बडे शूरवीर , योद्धा , व्‍यापारी , विद्वान और धर्म प्रवर्तक हुए हैं, जिनसे भारत वर्ष के पन्‍ने रंजित हैं। ये प्राचीन सूर्यवंश और चंद्रवंश के उततराधिकारी हैं। मुसलमानी राज्‍य में भी ये उच्‍च पदों पर प्रतिष्ठित रहें। दिल्‍ली , आगरे , संयुक्‍त प्रांत और बिहार से होते हुए ये बंगाल तक चले गए। खत्री क्षत्री के ही रूप हैं , इसके प्रमाण में चार बातें हैं ....

आर्यों का आदि उपनिवेश पंचनद प्रदेश में हुआ और वहीं भाषा के अनेक रूपों का विकास हुआ। प्राकृतों में 'क्ष' अक्षर नहीं हैं , उसके स्‍थान पर 'ख' का प्रयोग किया जाता है। भाषा विज्ञान के इसी उच्‍चारण विधान के कारण 'खत्री' शब्‍द चलन में आया और वह अबतक प्रचलित है। इस तरह प्राचीनकाल में पंजाब के क्षत्रिय वर्ण के 'खत्री' नाम से प्रसिद्ध होने की पुष्टि मिल जाती है।

यह बात प्रसिद्ध है कि परशुराम जी ने अनेक बार क्षत्रिय राजाओं का नाश कर उनके राज्‍य ब्राह्मणों को दिए थे। इस प्रकार कई बार खत्रियों का समूल नाश हो गया था। जो खत्री बच गए , वे अपने पुरोहित सारस्‍वत ब्राह्मणों की कृपा से बचे। इधर उधर छिप छुपाकर ही खत्रियों ने अपनी रक्षा की थी , जबकि स्त्रियों और बालकों की रक्षा सारस्‍वत पुरोहितों द्वारा विशेष रूप से हुई थी।

खत्रियों के सभी संस्‍कार सारस्‍वत ब्राह्मणों द्वारा शास्‍त्रोक्‍त रीति से ही कराए जाते हैं , यह उनके उच्‍च कुलोद्भव होने के प्रमाण हैं।

सारस्‍वत ब्राह्मणों का निवास सरस्‍वती नदी के तट पर था , वे ही पूर्वकाल से खत्रियों के पुरोहित रहे हैं और उनके यहां की कच्‍ची रसोई तक खाते रहे हैं। इस संबंध में खत्री और सारस्‍वतों के गांत्र भी स्‍पष्‍ट प्रमाण उपस्थित करते हैं।

बरेली में सन् 1901 में हुए खत्री सम्‍मेलन ने एक बहुत महत्‍वपूर्ण काम किया था। सम्‍मेलन के सभापति राजा बन बिहारी कपूर ने जो आवेदन पत्र सेंसर कमिश्‍नर रिजली साहब को प्रस्‍तुत किया था , उसमें खत्रियों के संबंध में बहुत सी प्रामाणिक बातें आ गयी थी और यह सिद्ध हो गया था कि खत्री वास्‍तव में क्षत्रिय कुल के ही हैं !!

(लेखक .. राय बहादुर श्‍याम सुंदर दास जी)




Wednesday, 4 November 2009

वर्षों से पूरे भारत के खत्री समाज को एकजुट करने की कोशिश में खत्री सतीशचंद्र सेठ जी

कल के आलेख में मैने लिखा कि किसी भी राष्‍ट्र , समाज , समुदाय या संस्‍था के उत्‍थान में पत्र पत्रिकाओं का विशेष महत्‍व होता है। परंतु हमारे किसी भी पत्र पत्रिका का प्रकाशन लंबे समय तक नहीं हा सका। पर नवम्‍बर 1936 में आगरा और अवध की संयुक्‍त प्रांत(वर्तमान में उत्‍तर प्रदेश) की राजधानी के खत्री समाज की एकमात्र प्रतिनिधि सभा 'श्री खत्री उपकारिणी सभा , लखनउ' ने अपने सक्रिय सदस्‍य स्‍व महाराज किशोर टंडन जी की योजना को साकार करते हुए 'ख्त्री हितैषी' मासिक का प्रकाशन आरंभ किया , जो अभी तक निरंतर जारी रहकर देश के करोडों खत्री समाज का मार्गदर्शन और सेवा कर रही है।

इसमें सर्वाधिक योगदान करनेवाले खत्री सतीश चंद्र सेठ जी ( जन्‍म 24 मई 1937 ) नि:स्‍वार्थ तौर पर वर्षों से पूरे भारत के खत्री समाज को एकजुट करने की कोशिश में लगे हुए हैं। खत्री समाज के कीर्तिस्‍तंभ और जातिभूषण श्री सेठ जी मौरावां के राजघराने के हैं। यह उनका बडप्‍पन है कि इन्‍होने स्‍वयं को जातिसेवा हेतु समर्पित कर दिया है। अब तो जातिसेवा इनके नित्‍यकर्म में ही शामिल है। उ प्र खत्री सभा के महामंत्री होकर उन्‍होने जाति का गौरव बढाया है। 'खत्री‍ हितैषी' पत्रिका जब से इनके हाथों में आयी है , उत्‍तरोत्‍तर प्रगति ही कर रही है। ईश्‍वर आपको चिरायु करें , ताकि आप भविष्‍य में दूनी ताकत से इस कार्य में अग्रसर होकर खत्री जाति का हित करते रहें। देश के विभिन्‍न भागों में खत्री समाज के गठन के साथ ही साथ समाज के समस्‍याओं को दूर करने में इनका योगदान रहा है। इन समाचारों में भी आप पढ सकते हैं।

(लेखिका .. संगीता पुरी)




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