Saturday, 14 November 2009

यत्र तत्र खासकर कच्‍छ में कुछ खत्री मुसलमान भी बन गए थे !!

(खत्री सीताराम टंडन जी के सौजन्‍य से)
1901 की जनगणना रिपोर्ट , पृष्‍ठ 289 में मुसलमान खत्रियों की जनसंख्‍या 11751 लिखी गयी है , जिसमें पंजाब तथा देश के अन्‍य भागों में बसे खत्री मुसलमानों की संख्‍या शामिल है। बंबई गजेटियर में कच्‍छ के मुसलमान खत्रियों का खासकर उल्‍लेख किया गया है। ये खत्री 16वीं शताब्‍दी के मध्‍य में सन् 1554 के आसपास सिंध से आए बताए जाते हैं। कहा जाता है कि किसी खत्रिय का अपने पुरोहित सारस्‍वत ब्राह्मण से किसी कारणवश झगडा हो गया था , इस कारण उसने इस्‍लाम धर्म स्‍वीकार कर लिया। गुजरात का एक अन्‍य खत्री ने भी परिस्थितिवश इस्‍लामधर्म स्‍वीकार कर लिया था। यद्यपि वह दबाबवश मुसलमान हो गया था , पर उसे अपने प्राचीन वंश पर बडा मान था। गुजरात में अहमदाबाद के निकट शंखे स्‍थान पर शेख अहमद खत्री मस्जिद और मकबरा बना है , जो सन् 1446 ईस्‍वी में बना था। इसका निर्माण मुहम्‍मद शाह द्वारा आरंभ किया गया था और पांच वर्ष पश्‍चात् कुतुबुद्दीन द्वारा पूरी किया गया।

सभी खत्री मुसलमान अपना सर मुंडाते , दाढी रखते और मुसलमानों के वस्‍त्र पहनते हैं। साफ रंग , चपटा चेहरा , लंबे कान और चौडे मस्‍तक वाले ये मुसलमान खत्री अत्‍यंत परिश्रमी और ईमानदार , सभ्‍य , मितव्‍ययी और शालीन हैं।ये रंगरेज , बढई , खरादी और कृषकों का काम करते हैं। इनकी औरतें सिलाई, कढाई और झालर बनाने में अत्‍यंत कुशल होती हैं। धार्मिक दृष्टि से ये कट्टर सुन्‍नी हैं औ आपस में ही शादी विवाह करते हैं। इनमें अधिकतर रूढिवादी हैं और नए व्‍यवसाय नहीं करते। अपने में से ही व्‍यक्तियों को चुनकर ये सामाजिक विवादों का निबटारा कर लेते हैं। खोजा , मेमन और बोहरे भी इस्‍लाम धर्म अपनाने वाले पूर्व क्षत्रिय यानि खत्रिय ही हैं।





7 comments:

Nirmla Kapila said...

हम तो इन्सानियत समाज से ताल्लुक रखते हैं शुभकामनायें। आपका भी स्वागत है।

Nirmla Kapila said...

संगीता जी इस पहली टिप्पणी को अन्यथा न लें पता नेहीं क्यों मुझे जातिवाद और प्रादेशवाद पर बात कुछ अखरती है इस लिये ऐसी बातों पर मुझे लगता है कि हमे जातिवाद मे सिर्फ इन्सानियत और प्रदेश के नाम पर लेवल भारत पर ही बात करनी चाहिये। इस लिये एक दम वो टिप्पणी दे दी। शुभकामनायें

संगीता पुरी said...

नहीं निर्मला दी .. तकलीफ की कोई बात नहीं .. मैने खुद हमारा खत्री समाज के
नीचे यह लिखा है .. पहले सच्‍चे इंसान, फिर कट्टर भारतीय, अपने सनातन
धर्म से प्रेम के बाद ही स्‍वजातीय संगठन की बारी आती है !! .. इसपर
ध्‍यान दें आप ! आशा है आपका स्‍नेह यूं ही बना रहेगा। इसी संदर्भ में कृपया इस आलेख को भी पढें ....
http://khatrisamaj.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html

mehek said...

ek naye culture ke baare mein jankar achha laga.hamare liye ye jankari nayi hi hai.baki jaise apne kaha,pehle sab hindustani hi hai.phir baki bolibhasha alag hai.anekta mein ekta bani rahe yahi dua hai.

sanjaygrover said...

मैं निर्मला कपिला जी से सहमत हूँ . ये जात-पात, ऊँच-नीच की बातें अब बंद होनी चाहिए . इनसे मानव समाज को पहले भी सिर्फ नुकसान पहुंचा है और आगे भी यही होगा . इससे और कुछ हासिल नहीं होने वाला .

संगीता पुरी said...

संजय ग्रोवर जी ,
हाल फिलहाल में ब्‍लागिंग के विकास के बाद 'हमारा ब्‍लागर समाज' विकसित हो रहा है .. इसी प्रकार विभिन्‍न सेमिनार वगैरह में भाग लेने के क्रम में सारे इंजिनियर डाक्‍टर या अन्‍य पेशेवाले की एक दूसरे से जान पहचान बनती है .. जिसके बच्‍चे तक आपस में मिले .. तो अपनापन सा लगता है .. इसी प्रकार प्राचीन काल से एक जैसा काम करनेवालों के बीच संबंध विकसित होते गए .. इसे इतनी जल्‍दी भुला देना भी आसान नहीं .. पर उद्देश्‍य या मानसिकता बुरी नहीं होनी चाहिए .. सिक्‍खों के दसों गुरू खत्री ही थे और उन्‍होने पूरे मानव समाज के उत्‍थान के लिए काम किए .. आज तो हर क्षेत्र में बेईमानी का बोलबाला है .. किस किस क्षेत्र को बंद करवा सकेंगे आप .. शब्‍द कोई भी बुरा नहीं होता .. उसका अर्थ लगानेवाले बुरे होते हैं .. मैं तो खत्री जाति के इतिहास के माध्‍यम से आपलोगों के सामने ऐसी एक वास्‍तविकता सामने रखना चाहती हूं .. जिससे यह पता चले कि सारे धर्म और जाति का निर्माण मनुष्‍यता की रक्षा के लिए ही हुआ है .. उसके विनाश के लिए नहीं !!

mahashakti said...

आपकी बात से सहमत हूँ, आज भी बहुत से ऐसे मुस्लिम मिल जायेगे जो आपको छत्रिय मुस्‍लमान कहते है। जो तत्‍कालीन प‍रस्थिति के कारण वे धर्म परिवर्तन करना पड़ा।

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