होली की बात क्या कहूं , होली में रंग है।
त्यौहार की खुशी में सब लोग संग हैं।।
गालों पे है गुलाल , लगा माथे पर अबीर।
मस्ती से खेलते हैं , सभी रंक और अमीर।।
ये अंगराज से सजा हुआ सा अंग है।
होली की बात क्या कहूं , होली में रंग है।।
होली को खेला सूर ने , तुलसी कबीर ने।
खेला है इसे संत और सूफी अजीज ने।।
रहमान राम कृष्ण पयंबर भी संग है।
होली की बात क्या कहूं , होली में रंग है।।
फागुन भी क्या चीज है, जरा देखिए हुजूर।
मस्ती भरी हुई है जरा खेलिए हुजूर।।
अल्लाह मियां भी देख मेरा अंग दंग है।
होली की बात क्या कहूं , होली में रंग है।।
हिंदू या मुसलमान हो या सिक्ख या ईसाई।
मिलजुलकर खेलिए सभी इसमें भलाई।।
हम एक हैं यहां पे सदा से अखण्ड हैं।
होली की बात क्या कहूं , होली में रंग है।।
इंसानियत की राह पे चलते हैं, चलेंगे।
हिंदुस्तान के लिए जीते हैं , जीएंगे।।
होली तो एकता के लिए मानदंड है।
होली की बात क्या कहूं , होली में रंग है।।
( लेखक ----- अजीज जौहरी जी )
पहले सच्चे इंसान, फिर कट्टर भारतीय और अपने सनातन धर्म से प्रेम .. इन सबकी रक्षा के लिए ही हमें स्वजातीय संगठन की आवश्यकता पडती है !! khatri meaning in hindi, khatri meaning in english, punjabi surname meanings, arora caste, arora surname caste, khanna caste, talwar caste, khatri caste belongs to which category, khatri caste obc, khatri family tree, punjabi caste surnames, khatri and rajput,
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010
जाति से संबंधित कुछ भ्रांतियों का उन्मूलन
jativad kya hai
जाति से संबंधित कुछ भ्रांतियों का उन्मूलन
प्रश्न ... प्राचीन काल में एक गोत्र और अल्ल में विवाह क्यूं वर्जित था ?
उत्तर .. वह इसलिए ताकि आनेवाली पीढी में किसी प्रकार के रोगयुक्त होने का भय कम से कम तो हो ही , इसके अलावे वे पीढी से शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक सक्षम हो।
प्रश्न .. यदि ऐसी बात थी , तो फिर दो जातियों के मध्य विवाह क्यूं नहीं होते थे ?
उत्तर .. क्यूंकि उस समय प्रत्येक जाति एक तरह के पेशे से जुडे हुए थे। इसके कारण न सिर्फ दोनो परिवारों को एक दूसरे से सामयोजन कर पाने में ही आसानी होती थी , मां और पिताजी दोनो के परिवार के एक ही पेशे से जुडे होने से आनेवाली पीढी को दो परिवारों के अनुभव का फायदा मिलता था , जिससे आनेवाली पीढी उस काम में अधिक कुशल होती जाती थी। अपनी अपनी जाति के अंतर्गत विवाह होने के मूल में यही बात थी। वर्तमान युग में भी खास पेशे में जुडे लोग अपने ही पेशे में बच्चों को और विकसित देखना चाहते हैं , यह कोई असामान्य बात नहीं थी।
प्रश्न .. कोइ व्यक्ति गलत काम करे तो कहते हैं 'देखो जात दिखा गया या देखो जात का असर है.ऐसा क्यूं ?
उत्तर . .प्राचीन काल में तो कर्म के आधार पर लोगों को काम दिया जाता था और उसी आधार पर जाति बनी थी पर कालांतर में कुछ ह्रास तो हुआ है , कला या मेहनत का मूल्य जैसे जैसे कमजोर होने लगा, उनका पतन होता चला गया। विविधता तो प्रकृति का नियम है , संसाधन के हिसाब से मनुष्य की मन:स्थिति रहनी स्वाभाविक है। भारत के लोग क्यूं आक्रामक नहीं होते , क्यूंकि ये संसाधन संपन्न देश है, लोग रक्षात्मक ढंग से रहना पसंद करते हैं, वे क्यूं विदेशों का रूख करेंगे ? अपने देश में किसी चीज की कमी नहीं और जिन देशों से साधनहीनता है , वहां के लोग भटकते हैं , आक्रमणकारी कहलाते हैं, क्षेत्र की तरह ही जाति का भी प्रभाव चरित्र पर पडता ही है, संसाधन के हिसाब से लोगों में चिंतन की शक्ति विकसित होती है, जिसका असर कालांतर में जीन में भी दिखाई पडता है। जिसको जैसा पारिवारिक माहौल मिला या जिसे जैसे संसाधन मिले, उसी के अनुरूप उसकी सोंच विकसित होती गयी , जिसे ही बाद में जातीय विशेषताएं कही जाने लगी। सरकार द्वारा छोटी जाति के लोगों को आरक्षण देने के पीछे इसी कमजोर सोंच को महत्व दिया गया है। अब धीरे धीरे लोगों के मध्य परस्पर मेल भाव होने से काफी समानता आयी है, पर शिक्षा के बावजूद सोंच में कुछ न कुछ तो फर्क आएगा ही । 90 प्रतिशत लोगों में तो जाति और क्षेत्र का प्रभाव रहता है, उन्हीं लोगों के लिए कहा गया है .. 'देखो जात दिखा गया या देखो जात का असर है , हालांकि यह भी बढा चढाकर प्रस्तुत किया जाता है।
प्रश्न ...कबीर ने कहा 'जात न पूछो साधू की पूछ लीजिये ज्ञान', क्या यह 'जात' और 'जाती' एक ही हैं?
उत्तर ..कभी कभी पूर्वजन्म के संस्कार भी काम करते हैं और किसी व्यक्ति में परिवार या क्षेत्र से अलग विशेषताएं देखने को मिलती हैं। उन्हीं लगभग 10 प्रतिशत लोगों के लिए है .. 'जात न पूछो साधू की पूछ लीजिये ज्ञान' और आनेवाले समय में मानवतावादी दृष्टिकोण बढे और उससे ऐसी सोंच 10 प्रतिशत से बढती हुई 100 प्रतिशत हो जाए , हम इसकी कामना करते हैं।
( यह पोस्ट मेरी एक चैट के दौरान हुई बातचीत को सार्वजनिक कर रही है)
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रविवार, 21 फ़रवरी 2010
रंग बिरंगी होली का यही तो है संदेश
ऐसे रंग में क्या रंगा, स्वयं हुए बदरंग।
प्रेम रंग सांचा 'रसिक' जीवन भरे उमंग।।
रंगी हथेली ले बढे,चेहरा रंगा उजास।
सच्ची होली हो तभी, फैले प्रेम प्रकाश।।
लाल लाल उडने लगी , चारो ओर गुलाल।
शहर शहर बाजार से, गांव गांव चौपाल।।
जल में जैसे रंग घुला, एक हृदय हो मीत।
वैमनस्य मिट जाए सब , रहे मित्रता जीत।।
चमक रही आभा लिए, जैसे रजत अबीर।
समता बढे समाज में , निर्धन बन अमीर।।
लेखक ... संत कुमार टंडन 'रसिक' जी
प्रेम रंग सांचा 'रसिक' जीवन भरे उमंग।।
रंगी हथेली ले बढे,चेहरा रंगा उजास।
सच्ची होली हो तभी, फैले प्रेम प्रकाश।।
लाल लाल उडने लगी , चारो ओर गुलाल।
शहर शहर बाजार से, गांव गांव चौपाल।।
जल में जैसे रंग घुला, एक हृदय हो मीत।
वैमनस्य मिट जाए सब , रहे मित्रता जीत।।
चमक रही आभा लिए, जैसे रजत अबीर।
समता बढे समाज में , निर्धन बन अमीर।।
लेखक ... संत कुमार टंडन 'रसिक' जी
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010
आकाश राज जी ... क्या आप अपने गांव और जिले का नाम लेने से परहेज कर सकेंगे ??
भारतवर्ष के इतिहास से पता चलता है कि खत्री जाति का काम प्रजा की रक्षा करना था। समाज में , राज्य में और शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में उनकी अहम् भूमिका रही है। पर कालांतर वे सिर्फ व्यवसाय में ही रम गए और आज भी उसी में रमे हैं। समाज और देश के इस बिगडे हुए हालात से , देशवासियों की दुर्दशा से वे तनिक भी विचलित नहीं हो रहे हैं। मैं इस ब्लॉग के माध्यम से उन्हें एकजुट करने और देश की स्थिति को सुधारने की अपील कर रही हूं। मेरे विचारों को पढने और अनुसरणकर्ता बनने के लिए मैने सबसे अनुरोध किया है , जो भी हमारे विचारों से इत्तेफाक रखते हों, मेरे साथ चल सकते हैं। मेरा एक भी पोस्ट ऐसा नहीं है , जो स्वार्थपूर्ण होकर लिखा गया हो। इसी सिलसिले में कल इस ब्लॉग पर लेखक ... कैलाश नाथ जलोटा 'मंजू' द्वारा लिखी गयी एक बहुत ही अच्छी पोस्ट प्रेषित की गयी थी , जिसको पढकर आकाश राज जी ने हमारी पंक्तियों को लिखते हुए टिप्पणी की .......
"यदि हम चाहें , तो संपूर्ण भारत में जाति जागरण का डंका बजा सकते हैं और अपनी खोई हुई कीर्ति को वापस ला सकते हैं। हम पुन: संपूर्ण समाज का प्रेरणास्रोत बनकर विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने में समर्थ हो सकते हैं। यही हमारा जाति के प्रति धर्म और त्याग होगा।"
संपूर्ण भारत में जाति जागरण का डंका तो न जाने कब से बजा पड़ा है और इसलिए तो हमारे देश में सबसे ज्यादा शांति है हिंदू - मुस्लिम - शिख - इशाई काफी नही जो अब उप जातिओं का डंका पुरे भारतवर्ष में बजाया जाये|
मैं आप पाठकों से ही पूछती हूं कि ऊपर की पंक्तियों में क्या बुराई थी , जिसका विरोध किया गया ??
मुझे तो लग रहा है कि आज अपने को आधुनिक समझनेवाले लोग हर परंपरागत बात का विरोध करने को तैयार रहते हैं। किसी को कुछ कहने लिखने के पहले ये तो ध्यान देना ही चाहिए कि इसकी मंशा क्या है ? किसी के घर में बिना पूजा के कोई काम नहीं होगा , बिना मुहूर्त्त के विवाह नहीं होगा , असफलता मिलने पर छुपछुपकर लोग ज्योतिषी के पास जाएंगे , पर सामने ज्योतिषियों की हर बात का विरोध करेंगे , इतनी बडी आबादी के बावजूद जिस महीने में लगन नहीं होता , उस महीने में कभी कभार ही शादी होते देखा जाता है , जबकि पंडित जी जिस दिन लगन अच्छा कह दें , बुकिंग की भीड हो जाती है। समाज मे यह सब मान्य है , पर मैं यदि सामाजिक भ्रांतियो को दूर करने की कोशिश करूं , तो वह अंधविश्वास हो जाता है। कमाल की मानसिकता है लोगों की ??
युवक खुद दूसरी जाति में विवाह न करें , माता पिता की बात मानकर प्रेमिकाओं को धोखा देते फिरें , पर सामने अवश्य विरोध करेंगे , बडे बडे भाषण देंगे। अपने , अपने परिवार,अपनी जाति , अपने गांव, अपने क्षेत्र और अपने देश पर सबको अभिमान होता है। अपनी अच्छी परंपरा की रक्षा करने का सबको हक है। अब जाति के कारण समाज बंट रहा है , तो जाति का नाम ही न लिया जाए । धर्म के कारण समाज बंट रहा है , तो धर्म का नाम ही न लिया जाए , ये कोई बात है ? फिर तो क्षेत्र के कारण समाज बंट रहा है , तो क्या आप अपने गांव और जिले का नाम लेने से परहेज कर सकेंगे ? आज आवश्यकता है , अपनी मानसिकता को परिवर्तित करने की , सबको समान दृष्टि से देखने की। जब वह हो जाएगी , तो हम किसी भी जाति के हों , किसी भी धर्म के हों और किसी भी क्षेत्र के हों , कोई अंतर नहीं पडनेवाला। अभी इतनी आसानी से भारत में जातिबंधन समाप्त होनेवाला नहीं , अपनी जाति के दूर दराज के परिवार में भी हम आराम से विवाह संबंध कर लेते हैं , बीच में कोई न कोई परिचित निकल आता है। पर दूसरी जाति में तब ही करते हैं , जब वह हमारे बहुत निकटतम मित्र हों। यदि विवाह संबंध करते समय आप इसका ध्यान नहीं रखते हैं , तो कभी भी आपके समक्ष भी समस्या आ सकती है। आशा है , बिना समझे बूझे हर बात का विरोध करना बंद करेंगे।
"यदि हम चाहें , तो संपूर्ण भारत में जाति जागरण का डंका बजा सकते हैं और अपनी खोई हुई कीर्ति को वापस ला सकते हैं। हम पुन: संपूर्ण समाज का प्रेरणास्रोत बनकर विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने में समर्थ हो सकते हैं। यही हमारा जाति के प्रति धर्म और त्याग होगा।"
संपूर्ण भारत में जाति जागरण का डंका तो न जाने कब से बजा पड़ा है और इसलिए तो हमारे देश में सबसे ज्यादा शांति है हिंदू - मुस्लिम - शिख - इशाई काफी नही जो अब उप जातिओं का डंका पुरे भारतवर्ष में बजाया जाये|
मैं आप पाठकों से ही पूछती हूं कि ऊपर की पंक्तियों में क्या बुराई थी , जिसका विरोध किया गया ??
मुझे तो लग रहा है कि आज अपने को आधुनिक समझनेवाले लोग हर परंपरागत बात का विरोध करने को तैयार रहते हैं। किसी को कुछ कहने लिखने के पहले ये तो ध्यान देना ही चाहिए कि इसकी मंशा क्या है ? किसी के घर में बिना पूजा के कोई काम नहीं होगा , बिना मुहूर्त्त के विवाह नहीं होगा , असफलता मिलने पर छुपछुपकर लोग ज्योतिषी के पास जाएंगे , पर सामने ज्योतिषियों की हर बात का विरोध करेंगे , इतनी बडी आबादी के बावजूद जिस महीने में लगन नहीं होता , उस महीने में कभी कभार ही शादी होते देखा जाता है , जबकि पंडित जी जिस दिन लगन अच्छा कह दें , बुकिंग की भीड हो जाती है। समाज मे यह सब मान्य है , पर मैं यदि सामाजिक भ्रांतियो को दूर करने की कोशिश करूं , तो वह अंधविश्वास हो जाता है। कमाल की मानसिकता है लोगों की ??
युवक खुद दूसरी जाति में विवाह न करें , माता पिता की बात मानकर प्रेमिकाओं को धोखा देते फिरें , पर सामने अवश्य विरोध करेंगे , बडे बडे भाषण देंगे। अपने , अपने परिवार,अपनी जाति , अपने गांव, अपने क्षेत्र और अपने देश पर सबको अभिमान होता है। अपनी अच्छी परंपरा की रक्षा करने का सबको हक है। अब जाति के कारण समाज बंट रहा है , तो जाति का नाम ही न लिया जाए । धर्म के कारण समाज बंट रहा है , तो धर्म का नाम ही न लिया जाए , ये कोई बात है ? फिर तो क्षेत्र के कारण समाज बंट रहा है , तो क्या आप अपने गांव और जिले का नाम लेने से परहेज कर सकेंगे ? आज आवश्यकता है , अपनी मानसिकता को परिवर्तित करने की , सबको समान दृष्टि से देखने की। जब वह हो जाएगी , तो हम किसी भी जाति के हों , किसी भी धर्म के हों और किसी भी क्षेत्र के हों , कोई अंतर नहीं पडनेवाला। अभी इतनी आसानी से भारत में जातिबंधन समाप्त होनेवाला नहीं , अपनी जाति के दूर दराज के परिवार में भी हम आराम से विवाह संबंध कर लेते हैं , बीच में कोई न कोई परिचित निकल आता है। पर दूसरी जाति में तब ही करते हैं , जब वह हमारे बहुत निकटतम मित्र हों। यदि विवाह संबंध करते समय आप इसका ध्यान नहीं रखते हैं , तो कभी भी आपके समक्ष भी समस्या आ सकती है। आशा है , बिना समझे बूझे हर बात का विरोध करना बंद करेंगे।
बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
खत्री जाति को देशवासियों के लिए प्रेरणास्रोत बनना चाहिए !!
खत्री जाति सदा से ही समाज का सिरमौर रही है , इसने सभी को आश्रय दिया है। हम रामचंद्र के वंशज हैं, यह निर्विवाद सत्य है। यदि हम उस काल के इतिहास पर दृष्टि डालें , तो ज्ञात होगा कि भगवान राम ने ब्राह्मणों , वैश्यों और शूद्रों को प्रश्रय ही नहीं दिया , अपितु उन्हें गले से भी लगाया। उसके बाद के युग में भी समाज के प्रत्येक अंग की उन्नति और सुख संपन्नता को बनाए रखने में हमने अपने को अग्रसर रखा।
युद्ध का क्षेत्र हो या शांति का साम्राज्य , प्रत्येक अवसर पर हमने स्वदेश प्रेम का प्रगाढ परिचय दिया है। शिक्षा , विज्ञान ,युद्ध , राजनीति , आर्थिक क्षेत्र से लेकर खेल कूद तथा समाज सेवा में हमने बढ चढकर अमूल्य योगदान दिया है। स्वयं को उत्सर्ग करके भी समाज के प्रत्येक अंग की रक्षा की है। अपनी सूझ बूझ और कला कौशल से संसार को चकाचौंध करनेवाले व्यक्ति विशेष खत्री समाज के हमेशा से रहे हैं। इतिहास इसका साक्षी है। हम उन महापुरूषों और वीरों के प्रति नतमस्तक हैं।
किन्तु वर्तमान युग में हमारी जाति के लोग भटक रहे हैं। अपनी आन बान और शान को धूल धूसरित होता देखकर भी अपनी आंखे बंद किए हैं। जो सफलता हमारे चरण चूमती थी , उससे हम कोसों दूर हैं। सारे भारत में लाखों खत्री भाई हैं , पर उनमें संगठन का अभाव है। हम 'खत्री हितैषी' के सदस्य बनकर पत्रिका के माध्यम से अपने विचार अपने जाति भाइयों के समक्ष प्रस्तुत करें और उन्नति के नए मार्ग ढूंढे।
यह सर्वथा निश्चित है कि यदि हम चाहें , तो संपूर्ण भारत में जाति जागरण का डंका बजा सकते हैं और अपनी खोई हुई कीर्ति को वापस ला सकते हैं। हम पुन: संपूर्ण समाज का प्रेरणास्रोत बनकर विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने में समर्थ हो सकते हैं। यही हमारा जाति के प्रति धर्म और त्याग होगा। तो आइए हम संकल्प लें कि आज से सभी खत्री भाई अपनी जाति के प्रति निष्ठावान होकर उसके उत्थान और संपन्नता के लिए जी जान से एकजुट हो जाएं और अपनी बिखरी हुई शक्ति को समेटकर एक बार पुन: प्रमाणित करें कि वास्तव में हम सारे भारतीय समाज के प्रेरणास्रोत हैं।
जिसको न निज कुल, जाति, धर्म,स्वदेश का कुछ ध्यान है।
वह 'मंजू' जीवन में पले , फिर भी न होता मान है।।
वह जाति का है लाल , जो नित प्रेम का वर्षण करे।
प्रिय जाति की पीडा हरे , निज प्राण भी अर्पण करे।।
लेखक ... कैलाश नाथ जलोटा 'मंजू'
शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010
खत्री जाति को इस ढंग से परिभाषित किया जा सकता है !!
वास्तव में व्यापक व्यक्तिगत अंतरों को स्पष्ट करने के उद्देश्य से जाति प्रथा को जन्म दिया गया था। आधुनिक वैज्ञानिक व्यख्या के अनुसार 'जाति' ऐतिहासिक प्रक्रिया में विकसित एक जनसमुदाय है , जिसका उदय अपने को अभिव्यक्त करनेवाले एक समान मनोवैज्ञानिक बनावट के आधार पर होता है। जाति अपनी संस्कृति की विशेषताओं से निराली बनती है। उसका निरालापन उसके अतीत की गहराइयों से उद्भूत होता ह। रक्त और स्वरूप की एकता ने परस्पर आत्मीयता उत्पन्न की , जितनी आत्मीयता बएती गयी , उतना ही निजत्व की भावना का क्षेत्र विकसित होता गया। जाति का प्राण धार्मिक संस्कारों में है। धार्मिक संस्कारों में अनास्था जाति के प्रति अनास्था है।
जहां तक खत्री जाति की बात है , सुकर्म , सुवचन और सुविचार और इसके द्वारा अपने जीवन को उच्च बनाने की प्रक्रिया हमारे जाति जीवन का मूलमंत्र है। सत्य आस्था और लगन जीवन की प्रगति का मूल है और हम इसे जीवन के यथार्थ में उतारने का भरसक प्रयास करते हैं। हमें अपने अतीत से साक्षात्कार करने , अपने इतिहास को सुरक्षित रखने का प्रयास करना चाहिए। संस्कार पूर्वजन्म के कर्म से ही नहीं, आसपास के वातावरण से भी बनते हैं। हमें सिर्फ पैतृक संपत्ति ही नहीं , जातीय संस्कार भी पीढी दर पीढी मिलती आयी है। सबों को अपने वर्तमान से आगे बढते जाना चाहिए ।
खत्री जाति प्रारंभ से ही अपार मुसीबतों , संकटों और अपरिमित कठिनाइयों में से गुजरकर जीवन यापन करती रही है। फिर भी उसने हमेशा स्वर्ण की तरह शुद्ध होकर अपने जातीय स्वाभिमान की रक्षा की है। जब जीना असह्य हो , फिर भी जीने की क्षमता श्रेष्ठ मानव का लक्षण है। अपने जीवन को सदैव उपयोगी बनाना और अपनी जातिय विशेषता के चरित्र का निर्माण हमारी पहली शर्त होनी चाहिए। हमारा जीवन ऐसा होना चाहिए कि उसमें कायरता और तुच्छता का धब्बा न लगे। निरूद्देश्य समय गंवाने का पडतावा न रहे।
हमारी जातीय जीवन पद्धति में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं कि हमारे समाज का गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपनी कठिनाइयों पर विजय पाने के लिए प्रयासरत होता है। हमें साधारण जनता का विश्वास नहीं खोना चाहिए। कम शिक्षित और कम साधन संपन्न होने के बावजूद हम संस्कार हीन या संस्कृति शून्य नहीं बन सकते। तुच्छता , स्वार्थ लिप्सा और संकीर्णता खत्री मानसिकता के विपरीत चीज है। हमें इन प्रवृत्तियों से बचने का हमेशा प्रयास करना चाहिए।
('खत्री हितैषी' के स्वर्ण जयंती विशेषांक में संपादक महोदय के विचार)
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
जीवन में ये बातें हमेशा याद रखें !!
किसी गरीब के सामने गर्वभरी वाणी बोलना , उसके साथ रूखा और कठोर व्यवहार करना भगवान का अपराध है , क्यूंकि उस गरीब के रूप में भगवान ही तुम्हारे सामने प्रकट हैं। अतएव सभी के साथ नम्र होकर अपनी मधंर वाणी बोलो, अपनी विनय विनम्र पीयूषवर्षिणी वाणी तथा व्यवहार के द्वारा सर्वत्र शीतल मधुर सुधा की धारा बहा दो, दुख की विषज्वाला से जलते हुए हृदयों में सुधा डालकर उन्हें विषशून्य , शीतल ,शांत और मधुर बना दो और यह सब केवल भगवान की सेवा के लिए करो, उन्हीं को शक्ति , प्रेरणा और वस्तु मानकर। तुम्हारी निरभिमान त्यागमयी सेवा से भगवान बहुत प्रसन्न होंगे और उनकी प्रसन्नता जीवन को सफल बना देगी।
बदला लेने की भावना कभी भी मन में मत आने दो। अपना बुरा करने पर , गाली देने पर , निंदा करने पर , मारने पर भी किसी का कभी न बुरा करो , न बुरा चाहो , न बुरा होते देखकर प्रसन्न होओ , उसको ह्दय से क्षमा कर दो। जैसे स्वयं के अपराध पर व्यक्ति स्वयं को दंड नहीं दे पाता ... क्षमा चाहता है , ऐसे ही सबमें अपनी आत्मा को समझकर सबको क्षमा कर दो। बदला लेने की भावना बहुत बुरी है , बदला लेने की भावना मन में रखने वाला व्यक्ति इस जीवन में कभी भी शांति , सुख और प्रेम नहीं पाता । वह स्वयं डूबता है और वैरभाव के बुरे परमाणु वायुमंडल में फैलाकर दूसरों का भी अनिष्ट करता है।
दुख मनुष्य के विकास का साधन है , सच्चे मनुष्य का जीवन दुख में ही खिल उठता है , सोने का रंग तपने पर ही निखरता है।
( खत्री हितैषी के स्वर्ण जयंती विशेषांक से साभार )
बदला लेने की भावना कभी भी मन में मत आने दो। अपना बुरा करने पर , गाली देने पर , निंदा करने पर , मारने पर भी किसी का कभी न बुरा करो , न बुरा चाहो , न बुरा होते देखकर प्रसन्न होओ , उसको ह्दय से क्षमा कर दो। जैसे स्वयं के अपराध पर व्यक्ति स्वयं को दंड नहीं दे पाता ... क्षमा चाहता है , ऐसे ही सबमें अपनी आत्मा को समझकर सबको क्षमा कर दो। बदला लेने की भावना बहुत बुरी है , बदला लेने की भावना मन में रखने वाला व्यक्ति इस जीवन में कभी भी शांति , सुख और प्रेम नहीं पाता । वह स्वयं डूबता है और वैरभाव के बुरे परमाणु वायुमंडल में फैलाकर दूसरों का भी अनिष्ट करता है।
दुख मनुष्य के विकास का साधन है , सच्चे मनुष्य का जीवन दुख में ही खिल उठता है , सोने का रंग तपने पर ही निखरता है।
( खत्री हितैषी के स्वर्ण जयंती विशेषांक से साभार )
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