बुधवार, 11 नवंबर 2009

पच्छिए खत्रियों का पंजाब के साथ संबंध बना रहा !!



पच्छिए खत्रियों के आगमन का युग और उसके बाद की राजनैतिक अवस्‍था ऐसी थी , जिससे उनका पंजाब के साथ किसी न किसी प्रकार का संबंध बना रहा। पच्छिए खत्रियों के आगमन के आगमन के समय इनके पुरोहित सारस्‍वत ब्राह्मणों का एक बडा दल भी पंजाब से आकर इन प्रदेशों में बस गया। इन्‍हें अपने संस्‍कार रीति रिवाज संपन्‍न कराने के लिए अपने पुरोहित सुलभ थे। इस कारण ये अपने रीतिरिवाज को बनाए रखने में सफल रहे। इनमें क्षेत्रीय परिस्थितियों के कारण कुछ आवश्‍यक मामूली परिवर्तन ही देखने को मिलते हैं। 

देश के बंटवारे के पूर्व तक पच्‍छए खत्रियों के अधिकांश बच्‍चे एक बार चोटी उतरवाने के लिए 'बाबे के मंदिर' में जाते थे और इस प्रकार पंजाब से उनका भावनात्‍मक संबंध सदैव बना रहा। इनके घरों में बोली जानेवाली भाषा भी शुद्ध खडी बोली रही। पच्‍छए खत्रियों के घर में नू(बहू), धी(पुत्री), पुत्‍तर(पुत्र), भावो(मां), कुडी(लडकी), गुत्‍त(चोटी), का प्रयोग अभी तक होता आ रहा है। यहां तक कि विवाहादि अवसरों पर दोहे सिटनी में बडे स्‍तर पर पंजाबी शब्‍दों का प्रयोग होता है।

( खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंति विशेषांक से)

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

पूर्विए खत्री के साथ उनके प्रदेशों में सारस्‍वत ब्राह्मण नहीं जा सकें !!



प्रारंभ में पंजाब से आनेवाले खत्रियों के साथ खत्रियों के पुरोहित 'सारस्‍वत ब्राह्मण' नहीं जा सके थे और उन्‍हें अपने संस्‍कार , यज्ञोपवीत विवाह आदि के लिए ब्राह्मणों की आवश्‍यकता थी। संस्‍कारों का विधिवत संपन्‍न कराने के लिए उन्‍हें स्‍थानीय ब्राह्मणों में से ही अपने लिए पुरोहित पाधा को स्‍वीकार करना पडा। बहुत पहले से रहने के कारण उनकी बोली पर भी क्षेत्र का व्‍यापक प्रभाव पडना स्‍वाभाविक ही था। अत: खडी बोली के साथ ही साथ अवधी और ब्रजभाषा का व्‍यपक प्रभाव उनकी बोली चाली , रहन सहन पर पडा। उस समय की राजनीतिक उथल पुथल के कारण उनका संपर्क पंजाब के साथ नहीं रह सका। 

पूर्विए खत्रियों ने अपने मूल पुरोहित सारस्‍वत ब्राह्मणों के अभाव और क्षेत्रीय लोकाचार के कारण पूर्व के अनेक रीति रिवाजों को भी अपना लिया। फिर भी खत्रियों के रक्‍त का प्रभाव ही था कि प्रतिकूल पारस्थितियों में भी वे खत्री जाति के मूल रूप को बनाए रखने में सफल रहें। विवाह संस्‍कार के शुभ अवसर पर 'घोडी' , 'तलवार' , 'वेदी' और हाथी दांत का 'चूडा' आदि खत्री विवाह संसकार की आवश्‍यक विशेषताओं को इन्‍होने कभी नहीं छोडा और अपने जाति का गौरव बनाए रखा।


( खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंति विशेषांक से)

सोमवार, 9 नवंबर 2009

सभी खत्रियों का मूल स्‍थान पंजाब ही है !!



सभी खत्री , वे चाहे जिस कुल , उपजाति या अल्‍ल के हों , उनका संबंध मूल रूप से सूर्यवंश और चंद्रवंश से ही है। देश , काल और अनेक कारणों से अल्‍लों में परिवर्तन होता रहा है , जिसके कारण खत्रियों की सक्‍डों अल्‍ले बन गयी हैं। अपने अस्तित्‍व और पवित्रता की रक्षा करने वाली एक महत्‍वाकांक्षी जाति में ऐसा होना स्‍वाभाविक ही है।

पंजाब के महत्‍वाकांक्षी खत्री पंचनद प्रदेश में ही बंधकर नहीं रह सके , वे आगे बढे और उनके कार्यक्षेत्र का विस्‍तार बढते बढते गंगा यमुना प्रदेश तक हो गया। खत्री पंजाब , दिल्‍ली , उ प्र बिहार और बंगाल तक फैल गए। एक विशेष बात यह भी रही कि खत्रियों ने प्राय। प्रमुख नगरों को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाया।

अल्‍ल कैसे परिवर्तित होती है , इसका अच्‍छा उदाहरण नेहरू परिवार है। स्‍व जवाहर लाल नेहरू जी ने अपनी पुस्‍तक 'मेरी कहानी' में लिखा है कि हमारे जो पुरखा सबसे पहले आए , उनका नाम था राजकौल। राजकौल को एक मकान और कुछ जागीर दी गयी। मकान नहर के किनारे था , इसी से उनका नाम नेहरू पड गया। कौल उनका कौटुम्बिक नाम था , बदलकर कौल नेहरू हुआ और आगे चलकर कौल गायब ही हो गया और महज नेहरू रह गया। 

खत्री पंजाब से निकलकर पूर्व की ओर बढे और इस बढने के काल और क्रम से इनके तीन प्रमुख भेद बन गए ... पूर्विए , पच्छिए और पंजाबी। ईसा की आठवीं शताब्‍दी से 1700 ईस्‍वी तक जो लोग पंजाब से आगे बढकर यमुना गंगा के प्रदेश के विभिन्‍न भागों में बस गए , वे पूर्विए कहलाए। 1700 से 1900 के बीच जो परिवार पंजाब से आगे बढकर इन प्रदेशों में बसे , उन्‍हें पच्छिए कहा जाने लगा। जो पंजाब में ही रह गए , बहुत बाद में इन प्रदेशों में आए , वे पंजाबी कहलाए।

( खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंति विशेषांक से)




रविवार, 8 नवंबर 2009

बहुत चुनौतियां हैं अभी हमारे सामने


खत्री जाति ने प्रत्‍येक काल में अपनी जातिय अस्मिता बनाए रखने के साथ ही साथ संपूर्ण समाज की उन्‍नति और मानव मात्र की सेवा में अनवरत सहयोग दिया है। इससे यह बात निर्मूल सिद्ध हो जाती है कि जातिय चेतना का फल संकुचित मानसिकता होती है। हमारी स्‍वस्‍थ परंपरा का ही प्रभाव है कि यद्यपि उन शताब्दियों में जब कि सारा भारतीय समाज रूढिग्रस्‍त हो गया था , खत्री समाज में भी कुछ अस्‍वस्‍थ परंपराओं ने भले ही प्रवेश पा लिया हो , तथापि कुल मिलाकर इस जाति के लोग अग्रिम पंक्ति में बने ही रहें। 

पर हमारे पूर्वजों ने जो किया , उसी में बात समाप्‍त नहीं हो जाती। खत्रियों की महत्‍वपूर्ण भूमिका की परंपरा यदि हमें बनाए रखनी है , तो हमें स्‍वप्रेरणा के बल पर आज की समस्‍याओं से टक्‍कर लेनी होगी। बेरोजगारी , निर्धनता और शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍यहीनता से बडी समस्‍या आज सामाजिक विघटन की है। तरह तरह के बहाने गढकर स्‍वार्थी लोग बहाने बना बनाकर जनता को विभिन्‍न आधारों पर विभक्‍त करने का काम कर रहे हैं। इसी प्रकार स्‍वार्थों के वशीभूत होकर सती जैसी बर्बर और अशास्‍त्रीय रूढि का पुनरूत्‍थान करने और कहीं कहीं धर्मग्रंथों की शाब्दिक सीमाओं में बंधकर विधवाओं को उनके मानवीय अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है। 

खत्री समाज समय समय पर अपनी जाति में अस्‍वस्‍थ परंपराओं के विरूद्ध संघर्ष छेडता रहता है और उसमें यथेष्‍ट रूप से सफलता भी प्राप्‍त की है। पर हमें इतने से ही संतोष नहीं करना चाहिए और पूरे समाज के सुधार में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। हम इस कार्य के लिए सक्षम भी हैं , क्‍यूकि हमारी आर्थिक , शैक्षणिक , सामाजिक और वैचारिक स्थिति इतनी मजबूत है। जरूरत सिर्फ अपने दायित्‍व के बोध और दृढ निश्‍चय की है।कुरीतियों के विरूद्ध अभियान , एकता के प्रयास , स्‍वास्‍थ्‍य एवं शिक्षा का प्रसार , भ्रष्‍टाचार विरोध ओर ऐसे अन्‍य उद्देश्‍यों के लिए हमारे जातीय संगठनों को अग्रसर होना चाहिए। इसमें अन्‍य जाति के प्रगतिशील तत्‍वों का सहयोग भी लेना चाहिए ।

(लेखक .. खत्री कृष्‍ण चंद्र बेरी जी)








 


शनिवार, 7 नवंबर 2009

खत्री परिचय



मात्र 'ख' और 'क्ष' में परिवर्तन बोलचाल भाषा की ही देन है। क्षत्रियों का व्‍यवसाय राज्‍य एवं युद्ध करना था , पर खत्रियों के व्‍यापार से संबंधित होने के कारण जनमत गणना अधिकारियों ने चाल चलते हुए इसे सम्‍मानित स्‍तर से एक श्रेणी नीचे रख दिया था। पर 1901 का सामाजिक जाति आंदोलन अपने ढंग का था और इसमें हमें सफलता मिली। इसी घटना ने जाति के इतिहास लिखने के लिए लोगों को प्रोत्‍साहित भी किया। 

आज इतिहास का मोड बदल जाने के बाद 'खत्री' 'क्षत्री' समानता या एकीकरण की समस्‍या नहीं रह गयी है।राजनीतिक और प्रशासलनक क्षेत्रों में मध्‍य काल से ही खत्री उच्‍च पदों पर आसीन रहे हैं। अलाउद्दीन से लेकर मुगलों के समय तक इनका उत्‍तरी भारत की राजनीति में एवं प्रशासन , शिक्षा तथा वित्‍तीय क्षेत्र में अधिकार रहा। कई राज्‍यों में ये दीवान के पद पर भी असीन् रहे। व्‍यापार में इनकी सफलता दिल्‍ली , ढाका कलकत्‍ता ओर अहमदाबाद में इस स्‍तर तक पहुंच गयी थी कि विदेशी यात्रियों ने भी इसका विवरण दिया है। 

साहित्‍य एवं धार्मिक क्षेत्रों में भी इन्‍होने फारसी , हिन्‍दी और उर्दू में रचनाएं की । इन्‍होने धर्म को राजनीति से जोडकर इसे एक नई दिशा दी। गुरू नानक से लेकर गुरू गोविंद सिंह जी तक सभी सिख गुरू खत्री ही थे। आधुनिक युग में इनका स्‍वाधीनता आंदोलन में भी बडा हाथ रहा। स्‍वतंत्रता प्राप्‍त करने के बाद भी ये सेना के तीनो अंगों में सर्वोच्‍च पदों पर रहें। जैसा कि भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्टिस हिदायत उल्‍ला ने मेरी पुस्‍तक 'खत्रीज ए शोसियो, हिस्‍टोरिकल स्‍टडीज' की भूमिका में लिखा है कि 'खत्री चाहे जिस क्षेत्र में रहे हों सदैव सर्वोच्‍च पद पर पहुंच चुके हैं' ।


(लेखक .. खत्री बैजनाथ पुरी जी)




शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

खत्री जाति : एक सिंहावलोकन


खत्री कुलनाम

खत्री जाति का इतिहास बहुत ही महत्‍वपूर्ण है। प्राचीन काल से ही यह जाति द्वितीय वर्ण यानि क्षत्रिय मानी जाती रही है। इस जाति में बडे बडे शूरवीर , योद्धा , व्‍यापारी , विद्वान और धर्म प्रवर्तक हुए हैं, जिनसे भारत वर्ष के पन्‍ने रंजित हैं। ये प्राचीन सूर्यवंश और चंद्रवंश के उततराधिकारी हैं। मुसलमानी राज्‍य में भी ये उच्‍च पदों पर प्रतिष्ठित रहें। दिल्‍ली , आगरे , संयुक्‍त प्रांत और बिहार से होते हुए ये बंगाल तक चले गए। खत्री क्षत्री के ही रूप हैं , इसके प्रमाण में चार बातें हैं ....

आर्यों का आदि उपनिवेश पंचनद प्रदेश में हुआ और वहीं भाषा के अनेक रूपों का विकास हुआ। प्राकृतों में 'क्ष' अक्षर नहीं हैं , उसके स्‍थान पर 'ख' का प्रयोग किया जाता है। भाषा विज्ञान के इसी उच्‍चारण विधान के कारण 'खत्री' शब्‍द चलन में आया और वह अबतक प्रचलित है। इस तरह प्राचीनकाल में पंजाब के क्षत्रिय वर्ण के 'खत्री' नाम से प्रसिद्ध होने की पुष्टि मिल जाती है।

यह बात प्रसिद्ध है कि परशुराम जी ने अनेक बार क्षत्रिय राजाओं का नाश कर उनके राज्‍य ब्राह्मणों को दिए थे। इस प्रकार कई बार खत्रियों का समूल नाश हो गया था। जो खत्री बच गए , वे अपने पुरोहित सारस्‍वत ब्राह्मणों की कृपा से बचे। इधर उधर छिप छुपाकर ही खत्रियों ने अपनी रक्षा की थी , जबकि स्त्रियों और बालकों की रक्षा सारस्‍वत पुरोहितों द्वारा विशेष रूप से हुई थी। 

खत्रियों के सभी संस्‍कार सारस्‍वत ब्राह्मणों द्वारा शास्‍त्रोक्‍त रीति से ही कराए जाते हैं , यह उनके उच्‍च कुलोद्भव होने के प्रमाण हैं। 

सारस्‍वत ब्राह्मणों का निवास सरस्‍वती नदी के तट पर था , वे ही पूर्वकाल से खत्रियों के पुरोहित रहे हैं और उनके यहां की कच्‍ची रसोई तक खाते रहे हैं। इस संबंध में खत्री और सारस्‍वतों के गांत्र भी स्‍पष्‍ट प्रमाण उपस्थित करते हैं। 

बरेली में सन् 1901 में हुए खत्री सम्‍मेलन ने एक बहुत महत्‍वपूर्ण काम किया था। सम्‍मेलन के सभापति राजा बन बिहारी कपूर ने जो आवेदन पत्र सेंसर कमिश्‍नर रिजली साहब को प्रस्‍तुत किया था , उसमें खत्रियों के संबंध में बहुत सी प्रामाणिक बातें आ गयी थी और यह सिद्ध हो गया था कि खत्री वास्‍तव में क्षत्रिय कुल के ही हैं !!

(लेखक .. राय बहादुर श्‍याम सुंदर दास जी)




बुधवार, 4 नवंबर 2009

सतीशचंद्र सेठ जी



कल के आलेख में मैने लिखा कि किसी भी राष्‍ट्र , समाज , समुदाय या संस्‍था के उत्‍थान में पत्र पत्रिकाओं का विशेष महत्‍व होता है। परंतु हमारे किसी भी पत्र पत्रिका का प्रकाशन लंबे समय तक नहीं हा सका। पर नवम्‍बर 1936 में आगरा और अवध की संयुक्‍त प्रांत(वर्तमान में उत्‍तर प्रदेश) की राजधानी के खत्री समाज की एकमात्र प्रतिनिधि सभा 'श्री खत्री उपकारिणी सभा , लखनउ' ने अपने सक्रिय सदस्‍य स्‍व महाराज किशोर टंडन जी की योजना को साकार करते हुए 'ख्त्री हितैषी' मासिक का प्रकाशन आरंभ किया , जो अभी तक निरंतर जारी रहकर देश के करोडों खत्री समाज का मार्गदर्शन और सेवा कर रही है।

इसमें सर्वाधिक योगदान करनेवाले खत्री सतीश चंद्र सेठ जी ( जन्‍म 24 मई 1937 ) नि:स्‍वार्थ तौर पर वर्षों से पूरे भारत के खत्री समाज को एकजुट करने की कोशिश में लगे हुए हैं। खत्री समाज के कीर्तिस्‍तंभ और जातिभूषण श्री सेठ जी मौरावां के राजघराने के हैं। यह उनका बडप्‍पन है कि इन्‍होने स्‍वयं को जातिसेवा हेतु समर्पित कर दिया है। अब तो जातिसेवा इनके नित्‍यकर्म में ही शामिल है। उ प्र खत्री सभा के महामंत्री होकर उन्‍होने जाति का गौरव बढाया है। 'खत्री‍ हितैषी' पत्रिका जब से इनके हाथों में आयी है , उत्‍तरोत्‍तर प्रगति ही कर रही है। ईश्‍वर आपको चिरायु करें , ताकि आप भविष्‍य में दूनी ताकत से इस कार्य में अग्रसर होकर खत्री जाति का हित करते रहें। देश के विभिन्‍न भागों में खत्री समाज के गठन के साथ ही साथ समाज के समस्‍याओं को दूर करने में इनका योगदान रहा है।

(लेखिका .. संगीता पुरी)



क्‍या ईश्‍वर ने शूद्रो को सेवा करने के लिए ही जन्‍म दिया था ??

शूद्र कौन थे प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर थी, पर धीरे-धीरे यह व्यवस्था जन्म आधारित होने लगी । पहले वर्ण के लोग विद्या , द...