Saturday, 30 January 2010

व्‍यक्तित्‍व विकास के लिए हीनता सबसे बडी बीमारी है !!

क्‍या आपके साथ भी ऐसा होता है कि किसी धनी , सुदर और प्रभावशाली व्‍यक्तित्‍व को देखकर और उससे मिलने पर घबराहट , बेचैनी और घुटन महसूस करते हैं, जिससे आप बात शुरू कर सकें या शुरू की गयी बात को जल्‍द समाप्‍त कर सकें या कृत्रिम मुस्‍कान के साथ बने रहें , तो इसका अर्थ यह है कि आप अपने आपको सामने वाले से कम आंकते हैं और अपने अंदर हीन भावना पाते हैं। आत्‍मविश्‍वासी और पढी लिखी किशोरियां और महिलाओं के दूसरों के सामने खुलकर न बोल पाने या घबडाने के पीछे की हीन भावना भी अपने आपको हर रूप में श्रेष्‍ठ दिखाने की लालसा के कारण जन्‍म लेती है।

हमारे दाम्‍पत्‍य जीवन में भी आत्‍महीनता जहर घोलती है , किशोरावस्‍था से ही किसी के मन में यह भावना घर कर जाए कि वह असुंदर है और इसपर सौभाग्‍य से इसका पार्टनर बीस हो गया , तो उसके अंदर हमेशा असुरक्षा की भावना पनपती है। कुछ लोग बचपन में हुई गल्‍ती के लिए भी अपने को उत्‍तरदायी मान लेते हैं और अपने दाम्‍पत्‍य जीवन का नुकसान कर डालते हैं। ऐसे व्‍यक्तित्‍व के चंहरे हमेशा मुर्झाए , उदास , शंकालु और बुझे बुझे दिखते हैं। लडकियों में आत्‍महीनता लडकों से प्रतिस्‍पर्धा के कारण भी जन्‍म लेती है , क्‍यूंकि आज भी उन्‍हें पराया घन समझकर ही शिक्षा दी जाती है ,।

विभिन्‍न प्रयोगों से स्‍पष्‍ट है कि अपने को हेय समझना हमारे व्‍यक्तित्‍व की सबसे बडी कमजोरी है , दूसरों को हमेशा अपने से समर्थ और स्‍वयं को मिन्‍म समझना जीवन में सफलता पाने में सबसे बडी बाधा है। दब्‍बू , झेंपू और संकोची किस्‍म की लडकियां प्रतिभासंपन्‍न होते हुए भी अपने मन की साधारण सी बात कहने में भी घुटन महसूस करती है। किसी स्‍थान पर साक्षात्‍कार के नाम से ही उनके हाथ पांव फूलने लगगते हैं। प्राय: देखा गया है कि दुर्भावनाएं भी आत्‍महीनता की घुटन में ही जन्‍म लेती हैं। इसलिए आत्‍महीनता से बचने के लिए स्‍वयं को श्रेष्‍ठ समझने की प्रवृत्ति का विकास किया जाना चाहिए , व्‍यवहार में आत्‍मीयता लाएं , सकारात्‍मक दृष्टिकोण रखते हुए स्‍वयं में और ईश्‍वर पर विश्‍वास रखें !!

लेखिका ... डॉ श्रीमती मीनू मेहरोत्रा

3 comments:

संजय भास्कर said...

lajwaab

anitakumar said...

हीन भावना का बहुत अच्छा विशलेषण किया है आप ने

Udan Tashtari said...

सारगर्भित आलेख.

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