गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

अरोड वंश की कुल 962 अल्‍लों का संकलन किया जा सका है( भाग - 2) ... खत्री सोहन लाल बजाज

कवर्ग से शुरू होनेवाले अल्‍ल .....

ककडे , ककरानी ,कगडा , कंघरे , कचरा , करेजे , करोडी , करोडे ,, कटारिये , कठोरे , कतरपाल , कतरेजे , कथल , कथायर , कामरे , कालडे , कथूरिये , कंतोड , कंधारी , कनडे , कपकजे , कोनी , किरानिये ,कुमार , कमालपुरिये , करवे , करमानी , करपालजही , करवाट , कुक्‍कड , कुरलै , कूमरे, करतने , करसेजे , करंदी , करात , करानी , केतरे , केसरा , केकडे , कलडा , कलेरमा , कलातरा , कथातडे , कबारजही , काट , कामली , काठपाल , किमरिये , किरतीये , कुब्‍बे , कुलपलेजे , कुण्‍डे , कुरड , कुकरेजे , केतला , केरे , केहर , केसाजही , केहरपोवे , कोचर , कोरिया , कोरतानी , कोयल , कबीरिया , कुलात्रा , किन्‍नड , कंजरा , काठ , कपूर , कटवानी , खड , खण्‍डपुरिये , खंडपुर , खदसेजा , खबानिये , खन्‍ना , खटृटर , खपरेजे , खब्‍भानी , खरवंदे , खरेजे , खरोदे , खरगोश , खारी , खाहरे , खेते , खेकभांजे , खेमवाणा , खेरवाट , खोसरे , खोरिये , खोराने , खेरे , खेतो , खोतडे , खेत्रपाल , खुम्‍बारी , खुंगर , गक्‍खड , गरपिये , गंद , गर्गे , गंगे , गगनेचे , गगड , गंध , गंभीर , गंड , गलोटे , गजेजई , गरगा , गलानिये , गगलानी , गाबडी, गावे , गांधी , गाले , गाडी , गाडखेल , गागडे , गीरधर , गिलहरी , गिरहौत , गिलौतरे , गिलोरिया , गीला , ग्रंथ ,गुरीजे , गुडृडी , गोरचंदे , गुरिये , गुरकाणी , गुड , गुलकानिये , गुलाटी , गुलरानी , गूजर , गुम्‍बर , गुटृटी , गुटतोड , गुलबधर , गेरे , गोचिज , गीट , गोटारे , गोगिये , गोरूनरे , गोरूबाडे , ग्रोवर , गोरसयानी , गोरायत , गोचारे , गोरतते , गोरे , गोरूवत्‍ते , ग्रेवल , कगलौटी , घघरे , घाघरे , घीक, घुमार , घुलानिये , घुलाटिये , घुंडीमोड , घेही , घोरे , घोग , घोझो , घेटी , घिया , घुनोया , घोका , घला ........

('खत्री हितैषी' के स्‍वर्ण जयंती विशेषांक से साभार)

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

अरोड वंश की कुल 962 अल्‍लों का संकलन किया जा सका है( भाग - 1) ... खत्री सोहन लाल बजाज

स्‍वर वर्ण से शुरू होनेवाले अल्‍ल .....

अकारी , अखलेजे , अगंदा , अंगी ,अधेले , अचरू , अछपानेवाले, अच्‍छपरानी , अजायती , अजमानी ,अजहाली, अठरेजा , अथडेजे , अथरेजे , अधरेजे, अधलिखे , अन्‍द , आन्‍दा , अनंदा , अन्‍दरानी , अन्‍दाहमुखी , अन्‍देमानी , अनेजे , अपन , अपनेजे , अपहून , अपनबी , अवरानी , अबयाए , अबहर ,अभवानिए , अम्‍बायवादी , अमरिए , अलूंगिए , अलूचे , अस्‍तावाधी , असरानी , असीजे , अभाणी , अजोडा , अभट्टा , अनदानी , असूंजा , अनरेजा , अधोस , आकली ,आनी , आभाटे , आमरे , आहूजे , इच्‍छपुजानी , इलाहाबादी , इस्‍तानी , इच्‍छामारणी , इंदरानी , इलफानी ख्‍ उत्‍तराधी , उत्‍तरेजे , उधरेकी , उबाबेजे ,  एथरे , एजियाल , एदानी , एलानहादिए , एलेसवी , ओतरेजे , ओपरगे , ओतरेजा ,ओरगिए ।

('खत्री हितैषी' के स्‍वर्ण जयंती विशेषांक से साभार)

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

अरोड वंश का इतिहास ( चतुर्थ भाग ).... अरोड वंश में पूज्‍य श्री अमर लाल (श्री झूले लाल)


सिंध के नसरपुर शहर में अरोडवंशी ठक्‍कर भक्‍त रतन राय के घर संवत् 1007 चैत्र सूदी दूज शुक्रवार प्रात: 4 बजे श्री वरूण दरियाब देव(श्री झूले लाल)साकार रूप में प्रकट हुए। उस समय सिंध में मराव नाम का मुसलमान बादशाह का राज्‍य था। सिंध की राजधानी तब उटा नगर थी। बादशाह को जब इस तेजस्‍वी बच्‍चे के जन्‍म की जानकारी मिली , तो उसने अपने वजीर अह्या को नसरपुर भेजा। वजीर ने भक्‍त ठक्‍कर राय के घर नवजात बालक को पालने में देखा। कहा जाता है कि श्री अमर लाल जी ने पालने में ही जो चमत्‍कार दिखाए , उससे वह नतमस्‍तक हो गया। अह्या की प्रार्थना पर ही श्री अमर लाल ने नीले घोडे पर युवक के रूप में जाकर बादशाह का अहंकार भी दूर किया। आज भी सिंध में पूज्‍य अमरलाल जी के नाम से उडेरा लाल ग्राम में सुुंदर विशाल मंदिर और क्षमायाचक मराव बादशाह के द्वारा बनवाया गया किला मौजूद है।

सावन भादो मास में अरोडवंशी पूज्‍य अमर लाल दरियाब देव जी को अपना इष्‍ट मानते हुए वरूण दरियाब देव का जल के किनारे पूजन भी करते हैं। राजस्‍थान निवासी अरोडवंशी भिति भादों बदी सात को उनका पूजन करते हैं। सिंधी भाई चैत्र सुदी दूज को सारे भारतवर्ष में पूज्‍य झूलेलाल का उत्‍सव दो तीन दिनो तक बडी धूमधाम से मनाते हैं , जिसे चेटी चंड कहा जाता है।

(अरोड वेश के इतिहास की जानकारी प्रदान करने वाली ये चारो कडियां डॉ ओम प्रकाश छाबडा जी द्वारा लिखित अरोडवंश इतिहास में उपलब्‍ध जानकारी पर आधारित है)

(खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंती विशेषांक से साभार)







शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

अरोड वंश का इतिहास ( तृतीय भाग ).... अरोडवंश और राजस्‍थान



ग्‍यारहवीं शताब्‍दी के प्रारंभ में जब पंजाब पर विदेशी आक्रमण हुए , तो कुछ अरोडवंशी राजस्‍थान की ओर भी चले गए। चिरकाल तक उनका संबंध पंजाबी अरोडवंशियों के साथ बना रहा। इस बात के अनेक प्रमाण मिलते हैं कि राजस्‍थान के अरोडवंशी पंजाब से होकर ही राजपूताने में बसे थे। कुछ हस्‍तलिखित ग्रंथों से इस बात के प्रमाण भी मिलते हैं। अरोडवंशी खत्रियों द्वारा बनवाया हुआ श्री दरियाब देव जी का मंदिर श्री पुष्‍कर राज में विद्यमान है। इसके अतिरिक्‍त जिन बडे कस्‍बों और नगरों में अरोडवंशी बिरादरी के घर अधिक हैं, वहां भी श्री दरियादेव जी के मंदिर स्‍थापित हैं। राजस्‍थान में अरोडवंशी खत्रियों की 84 अल्‍ले हैं। 

राजपूताना निवासी अरोडवंशियों में उत्‍तराधी , दरबने , डाहरे आदि भेदों का कोई समुदाय नहीं है। अधिकांश लोग इन भेदों से अनभिज्ञ भी हैं। लोगों के रीति रिवाजों को देखने पर राजस्‍थान के अरोडा दरबने प्रतीत होते हैं। राजस्‍थान के अरोडों में ज्‍यादातर व्‍यापार में ही लगे हैं। इस शताब्‍दी के प्रारंभ में राजस्‍थान के अरोडा समुदाय में एक विधवा के विवाह को लेकर फूट पड गयी और पूरी बिरादरी दो दलों में बंट गयी। यह दलबंदी अब भी देखने में आती है। एक दल का नाम जोधपुरी अरोडा खत्री तथा दूसरे दल वाले नागौरी अरोडा खत्री कहलाते हैं।

(खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंती विशेषांक से साभार )






मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

अरोड वंश का इतिहास ( द्वितीय भाग ).... ऐतिहासिक तथ्‍य


अरोड शब्‍द की व्‍याख्‍या के अनुसार अरोड प्रांत के राजा या क्षत्रिय अरोडा कहलाए। इतिहासकार टॉड की राय है कि अरोडनगर सिंधु नदी के किनारे पर वर्तमान रोडी या अरोडी नगर से पांच मील पूर्व की ओर था। सिंधु नदी किसी समय में अरोड नगर के नीचे बहा करती थी। 

लाहौर विश्‍वविद्यालय के पुस्‍तकालय में मौजूद फारसी में लिखी दो हस्‍त लिखित पुस्‍तक के आधार पर बताया जाता है कि अरोड सिंध की राजधानी थी। अरबों के आक्रमण के बाद आठवीं शताब्‍दी के प्रारंभ में अरोडा सिंधु नदी के किनारे किनारे उत्‍तर की ओर बढते गए , जहां उन्‍हें उचित स्‍थान मिला , वहां बसते गए तथा जो व्‍यवसाय धंधे मिलते गए , उसे अपनाते गए।

करीब तीन सौ वर्ष बाद जब पंजाब में आक्रमण हुए तो अनेक अरोडवंशी सिंध की ओर लौटे। वहां उन्‍होने स्‍वयं को लोहा वरणा या लोहावर कहा। धरे धीरे उच्‍चारण भेद से वे लोहाणे कहलाने लगे। आजकल भी लोहाणे में जो गीत गाए जाते हैं , वे लाहौर की ओर ही इशारा करते हैं। 

अरोडवंशियों की दिशांतर भेदों के अलावा धीरे धीरे स्‍थान और पूर्वजों के आधार पर भी अनेक शाखाएं हो गयी , जैसा कि उनके सैकडों अल्‍लों से पता चलता है। अरोड वंश के अल्‍लों की चर्चा भी इसी कडी में आगे की जाएगी। अरोडवंशी स्‍वयं को काश्‍यप गोत्र के क्षत्रिय मानते हैं।

अगले लेख में हम अरोडवंशियों का राजस्‍थान के साथ संबंध की चर्चा करेंगे।

(खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंती विशेषांक से साभार)







गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

अरोड वंश का इतिहास ( प्रथम भाग ).... उत्‍पत्ति

arora khatri samaj

भविष्‍य पुराण के जिस श्‍लोक के अनुसार अरोड वंशी ( अरोरा खत्री समाज ) अपने को त्रेतायुग में हुए महाराज श्री अरूट का वंशज मानते हैं , वह इस प्रकार है ......


'नाग वंशोद्या दिब्‍या, क्षत्रियास्‍म सुदाहता। 

ब्रह्म वंशोदयवाश्‍चान्‍ये, तथा अरूट वंश संभवा।।'

(भविष्‍यपुराण , जगत प्रसंग अध्‍याय 15)

अर्थात् नागवंश में होनेवाले , वैसे ही ब्रह्म वंश में होनेवाले तथा अरूट वंश में होनेवाले श्रेष्‍ठ क्षत्रिय कहलाए।

त्रेता युग में श्री परशुराम से सम्‍मानपूर्वक अभयदान पाकर सूर्यवंशी क्षत्रिय श्री अरूट ने सिंधु नदी के किनारे एक किला बनाकर उसका नाम अरूट कोट रखा , जिसे समयानुसार अरोड कोट कहा जाने लगा। महाराजा अरूट के साथी और वंशज ही अरोडा कहलाएं।


सिकंदर को भी महाराजा अरूट के वंशजों से लडना पडा था। इतिहास लेखक प्लिनी ने भी अरोडों को अरोटुरी लिखा है। कालांतर में अरोड राज्‍य की गद्दी देवाजी ब्राह्मण के हाथ में आ गयी । देवा जी ब्राह्मण के वंशज बौद्ध थे और उनकी राजधानी सिंधु नदी के पूर्वी किनारे पर अलोर या अरोड कोर्ट ही थी, जिसे आजकल रोडी कहते हैं। अरबों के आक्रमण के समय अरोड कोट के अंतिम राजा दाहर बडे प्रतापी थे। उनके शासनकाल में अरब आक्रमणकारियों ने समुद्र मार्ग से कई हमले किए थे, जिन्‍हे विफल किया जाता रहा। मुहम्‍मद बिन कासिम के आक्रमण के समय आपसी फूट के कारण अरोड कोट हमलावरों के हाथ में चला गया। इस भगदड में अरोडवंशियो का एक दल उत्‍तर दिशा की ओर गया , वह उत्‍तराधा कहलाया। दक्षिण दिशा को जानेवाला दक्षिणणाधा और पश्चिम दिशा को जानेवाला दाहिरा कहलाया। इसके बाद अरोड वंशियों ने व्‍यापार और खेती को जीवन निर्वाह का मुख्‍य साधन बनाया। ये ही अरोड़ा खत्री समाज है। 

कल दूसरे भाग में हम अरोडवंश से जुडे ऐतिहासिक तथ्‍यों की चर्चा करेंगे। 

(खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंती विशेषांक से साभार)





रविवार, 28 मार्च 2010

धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे मान्‍य तीर्थस्‍थान

तीर्थों के नाम

हिंदू परिवारों की तरह ही खत्रियों में भी कुछ तीर्थस्‍थान अत्‍यंत पवित्र माने जाते हैं। कम से कम प्रत्‍येक हिंदूओं की प्रबल इच्‍छा होती है कि वे इन तीर्थस्‍थानों में जाकर अपना परलोक सुधारे। जीवन में उनकी यात्रा करना एक कर्तब्‍य माना जाता है। कुछ प्रमुख तीर्थस्‍थान निम्‍न हैं ...... 


'चारो धाम' के अंतर्गत 1. उत्‍तर में बद्रिकाश्रम है। हरिद्वार से यात्रा आरंभ होती है , प्राय: केदारनाथ होते हुए लोग बदरीनाथ को जाते हैं। कुछ लोग गंगोत्‍तरी या यमुनोत्‍तरी होते हुए भी वहां जाते हैं , ये उत्‍तराखंड की यात्रा होती है। अनेक यात्री धर्मभाव से प्रेरित न होते हुए भी केवल हिमालय के अद्भुत प्राकृतिक दृश्‍य के अवलोकनार्थ या सैर सपाटों के लिए भी इन दर्शनीय स्‍थानों पर जाते हैं। 2. दक्षिण में रामेश्‍वरम् धाम है , इसके आसपास अनेक तीर्थस्‍थान हैं।लोग दक्षिण भारत के भ्रमण को जाने पर रामेश्‍वरम् जाना नहीं भूलते। 3. पूर्व में जगन्‍नाथपुरी है, साक्षी गोपाल , भुवनेश्‍वर और कोणार्क जैसे प्रसिद्ध तीर्थस्‍थान इसके निकट ही हैं। 4. पश्चिम में द्वारकाधाम है, इन चारो धाम के यात्रियों को यह अनुभव होता है कि समस्‍त देश हमारी ही मातृभूमि है। जगत्गुरू शंकराचार्य ने इन धामों पर अपनी गद्दिायां विकसित की।

खत्र

चारो धामों के अतिरिक्‍त 'सप्‍तपुरी' के अंतर्गत 1. अयोध्‍या , राजा रामचंद्र की राजधानी सरयू नदी के तट पर है। 2. मथुरा , योगेश्‍वर कृष्‍ण की कार्यभूमि यमुना तट पर है। 84 कोस ब्रज के अंतर्गत नंदगांव , पेम सरोवर , बरसाना, कोसी , छाता , कामबन, डीग , गोवर्द्धन , जतिपूरा , राधाकुंज , रावल , गोकुल , महाबन , ब्रह्मांड घाट , रमणरेती , बडे दाऊ जी , बृंदाबन आदि तीर्थस्‍थल हैं। 3. हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर लाखों की भीड होती हैं, गंगा दशहरा या अन्‍य पर्वों पर भी गंगा स्‍नान को यात्री आते हैं। कनखल , चंडीदेवी , भीमगोडा , सत्‍यनारायन चट्टी , ऋषिकेश , लक्ष्‍मणझूला , स्‍वर्गाश्रम आदि भी अपूर्व दर्शनीय स्‍थान आसपास हैं। 4 . काशी शैवों का केन्‍द्र बाबा विश्‍वनाथ तथा गंगा के कारण अत्‍यंत पुरातन और पवित्र तीर्थ है। 5. कांजीवरम दक्षिण भारत में विष्‍णु कांची तथा शिवकांची के रूप में प्रसिद्ध है। 6. उज्‍जैन शिप्रा नदी के तट पर महाकालेश्‍वर शिवलिंग के कारण विक्रमादित्‍य की राजधानी रहा है। 7. द्वारका भी सप्‍तपुरियों में से एक है। सोमनाथ , सुदामापुरी आदि तीर्थस्‍थान भी इसके निकट ही है।
तीर्थों के नाम


शैवों के लिए द्वादश ज्‍योतिर्लिंग अत्‍यंत महत्‍व और श्रद्धा के केन्‍द्र हैं। 1. सोमनाथ गुजरात में हैं, जिससे प्रत्‍येक इतिहास प्रेमी परिचित हैं। 2. त्रयम्‍बकेश्‍वर नासिक के निकट है। 3. ओकारेश्‍वर नर्मदा तट पर है। 4. महाकालेश्‍वर उज्‍जैन में है। 5. केदारनाथ हिमालय पर स्थित है। 6. विश्‍वनाथ महादेव काशी में है। 7. बैजनाथ धाम बिहार प्रांत में है। 8. रामेश्‍वरम दक्षिण में है। 9. मल्लिकार्जुन 10. नागनाथ 11. वृष्‍णेश्‍वर दक्षिण हैदराबाद में है। 12. भीमाशंकर पूना के पास है। 

इसके अतिरिक्‍त काश्‍मीर में अमरनाथ की गुफा भी प्रसिद्ध है। काली भक्‍तों के तीर्थ वहां वहां है , जहां उनके मठ हैं। नागरकोट के दुर्गामंदर में चैत और कुआर के महीनों में यात्री अधिक आते हैं। इसी प्रकार मिर्जापुर में विंद्यवासिनी देवी , कलकत्‍ते की काली माई दिल्‍ली के निकट गुरूगांव में शीतला देवी , कांगडा की ज्‍वालामुखी देवी का मंदिर भी प्रसिद्ध है।

सिक्‍खों का प्रसिद्ध तीर्थ अमृतसर का स्‍वर्ण मंदिर है।

गंगा तट पर 1. काशी संस्‍कृत विद्या का केन्‍द्र रहा है। 2. प्रयाग गंगा , यमुना सरस्‍वती के संगम पर प्रसिद्ध तीर्थस्‍थान है। 3. हरिद्वार 4. एटा जिला में कासगंज के निकट सोरों 5. जिला अलीगढ में गंगातट पर राजघाट 6. जिला मेरठ में गढ मुकत्‍ेश्‍वर 7. ब्रहमवर्त , बिठुर तथा गंगासागर आदि प्रसिद्ध तीर्थस्‍थान हैं। 

वैष्‍णवों के प्रधान तीर्थ नाथद्वारा , मथुरा और द्वारका है। कुरूक्षेत्र पंजाब में पानीपत के निकट है। गयाजी फल्‍गु नदी के तट पर मृत लोगों के पिंड दान के लिए पवित्र स्‍थान है। बिहार में गंगातट पर हरिहर क्षेत्र अपने मेले के लिए संसार भर में प्रसिद्ध है। जहां जहां प्राचीन ऋषि महर्षियों ने तपस्‍या की थी , या धार्मिक उद्देश्‍यों से इकट्ठे हुए थे , वो सब भी बाद में तीर्थस्‍थल बन गए। नैमिषारण्‍य मिश्रिक , हत्‍याहरण चित्रकूट, गोला गोकर्ण नाथ , जनकपुर , सीतामढी , राजगृह , नसलंदा , तारकेश्‍वर नवदीप , कामाख्‍या , परशुराम कुंड , ब्रह्म तीर्थपूर , पशुपतिनाथ महादेव , नेपाल , भेडाघाट , जबलपुर , रामटेक , नागपुर , श्रीरंगम , मदुरा , बालाजी , तिरूपति , लक्ष्‍मणबाला आदि भी प्रसिद्ध तीर्थ हैं।

( खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंती विशेषांक से साभार )




क्‍या ईश्‍वर ने शूद्रो को सेवा करने के लिए ही जन्‍म दिया था ??

शूद्र कौन थे प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर थी, पर धीरे-धीरे यह व्यवस्था जन्म आधारित होने लगी । पहले वर्ण के लोग विद्या , द...