Tuesday, 9 March 2010

हमारे मान्‍य पशु पक्षी और अस्‍त्र शस्‍त्र

गाय समस्‍त हिंदुओं की माता है। गाय को बेचना एक महान पाप है। प्रत्‍येक गृहस्‍थ के घर में एक गाय पाली जाती है। मृत्‍यु के समय भी गोदान सर्वोत्‍तम होता है। प्रत्‍येक शुभ संस्‍कार के अवसर पर गोदान महत्‍वपूर्ण माना जाता है। गोशाला को खोलना और चलाना अत्‍यंत शुभ और पवित्र काम है। प्राचीन युग के राजाओं की दंत कथाएं गाय के प्रति उनकी श्रद्धा को दिखाने में समर्थ है। गृहस्‍थ में यदि गाय रखने की क्षमता न हो , तो वह उसे किसी ब्राह्मण या गौशाला को देता है। बछडा दान का भी अपना महत्‍व है। गाय और बछडे की पूजा भी वर्ष में एक बार की जाती है। उनके मस्‍तक में रोली का टीका लगाकर , उनपर अक्षत डालकर , उन्‍हें पुष्‍पमाला पहनाकर स्‍वादिष्‍ट भोजन कराया जाता है। नवग्रह की पूजा में भी गोदान और गौ पूजा होती है। प्रतिदिन के भोजन में भी गोग्रास निकाला जाता है। इस तरह हिंदुओं के यहां , और तद्नुरूप खत्रियों के यहां भी ब्राह्मण से अधिक महत्‍व गाय को दिया जाता है।

सांप भी हमारे यहां पवित्र माना जाता है। नागपंचमी पर नागदेवता की पूजा होती है। बाल्‍यावस्‍था के कुछ संस्‍कारों में , विशेषकर कपूरों के यहां नाग को दूध पिलाए जाने की प्रथा है। हिंदु कितने अहिंसक थे, यह इस बात का प्रमाण है। सांप जैसे विषैले जीव के प्रति भी दया और प्रेम का भाव रखते थे। चरित्र की उच्‍चता का यह प्रदर्शन स्‍तुत्‍य है।

हिंदुओं की दृष्टि में तोता भी एक पवित्र पक्षी है , इसलिए इसे भी काफी घरों में पाला जाता है।

मोर सरस्‍वती का वाहन है , कुछ घरों में मोर भी पाला जाता है , घर में मोर होने से सांप का भय नहीं होता है।

नीलकंठ भी एक पवित्र पक्षी है , दशहरे के दिन नीलकंठ का देखना शुभ माना जाता है।

खत्री एक शूर जाति है। अत: प्राचीन अस्‍त्र शस्‍त्र जैसे धनुष, बाण , भाला , कटार, तलवार आदि क्षत्रियों के हथियार थे। अब ये अस्‍त्र शस्‍त्र खत्रियों के यहां नहीं मिलेंगे। पर जिस तरह सिखों के यहां कटार रखने का नियम है , वैसे ही तलवार खत्रियों के हर घर में मिल जाएगा। यह खत्रियों का पवित्र हथियार है। दशहरे के दिन अस्‍त्र शस्‍त्र , विशेषकर तलवार की पूजा हर खत्री करता है। तलवार न होने पर कटार या चाकू से भी काम चलाया जा सकता है। विवाह के अवसर पर वर तलवार लिए घोडे पर सवार होकर ब्‍याह करने जाता है और अपनी तलवार से नारियल पर वार करता है।

( खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंती विशेषांक से साभार )

4 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

मौलिक रूप से सभी जीवों के प्रति प्रेम भाव रखना ही इंसान का उद्देश्‍य होना चाहिए।

अविनाश वाचस्पति said...

मौलिक रूप से सभी जीवों के प्रति प्रेम भाव रखना ही इंसान का उद्देश्‍य होना चाहिए।

Sudhaker said...

aapne phir comment likhne pe majboor ker diya.jati ke baare mein aapke post per maine likha tha ki aap khud dharmgranth padhker kyuin nahin dakhti ,aapko apne-aap saari asaliyat maloom ho jayegi.per aap sirf likhna chaheti hein,padhana nahi.vaidik granton mein gaaye ka bada mahatva hai,us kaal mein mudra ke aabhav mein vinimaye ka sadhan gaaye hi thi,ye sahi hai,gaaye ka doodh,cherm,meat her cheez ki badi upyagita thi.gaaye ka prayog bade paimane pe khane ke liye kiya jata tha.vaidik granthon mein ATITHI ke liye GOGHNE shabd ka prayog hua hai,jiska arth hai 'gaaye ko maarne vaala' ya jiske aane pe gaaye maari jaaye. RIGVED mein INDRA ko anek bail khane vala bataya gaya hai.MAHABHARAT ke shatiperv mein VASHISHTHA muni ke aane pe ek bachiya marne ka ullakh hai.VASHISHTHA ke baare mein prasiddha tha ki vo ek bachiya akele kha jaya kerte the.GO-MEGH YAGYA mein gaaye ki bali di jaati thi,aur gaaye ke meat se ek pakvaan MADHUPERK banaya jata tha. jab vaidik kabeele sthaayee huye,teb krashi ka mahatva badhane laga,isi samaye BAUDH dharam ke aane se mansahaar aur yagyon mein pashu-bali ka virodh shuru hua.baudh graton mein paheli baar gaaye ko AANDA-VAANDA-SUKHADA kaha gaya.iske baad go-bhakshak achanak go-rakshak ho gaye aur gaaye 'GO MATA' ho gayi.

चंदन कुमार झा said...

बहुत सुन्दर आलेख । आभार


गुलमोहर का फूल

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