मंगलवार, 17 नवंबर 2009

हिन्‍दू धर्म और सिख धर्म को जोडनेवाली कडी भी खत्री ही है !!

khatri history in hindi


सिक्‍खों का इतिहास वास्‍तव में सिक्‍ख खत्री गुरूओं का ही इतिहास है , जो गुरू नानक से गुरू गोविन्‍द सिंह तक बताया जाता है। सिख धर्म प्रचारक गुरू नानक लाहौर जिले के तलबंडी (ननकाहा साहिब) के वेदी खत्री थे। उनके उत्‍तराधिकारी गुरू अंगद टिहुन खत्री थे। उसका असली नाम लहना था। गुरू अमरदास ( 1552-1574) भल्‍ला खत्री थे। हरमंदिर या स्‍वर्णमंदिर के संस्‍थापक गुरू रामदास (1554-1581 ) खत्रियों की सोढी अल्‍ल के थे। गुरू गोविंद सिंह ने अपने ग्रंथ 'विचित्र नाटक के अध्‍याय दो से 4 में अपनी और गुरू नानक की उत्‍पत्ति भगवान रामचंद्र के पुत्र लव और कुश के वंश में बतायी है। गुरू गोविन्‍द सिंह सिक्‍खों के अंतिम गुरू थे।


मुगल काल में सिक्‍ख खत्री गुरूओं के इतिहास की एक अलग ही कहानी है। 1901 की जनगणना के कुल 1030078 खत्रियों की जनसंख्‍या में 60685 सिख खत्री दर्ज किए गए थे। इस जनगणना में जैन धर्म को माननेवाले 704 और बौद्ध धर्म को माननेवाले 27 खत्री भी दर्ज किए गए थे। आज इन सिक्‍ख खत्रियों में कुछ अल्‍ले विशेष रूप से पायी जाती हैं , जैसे अगिया , अरिन , उहिल , एलवी , कालछर , खुमाड , गंगादिल , चारखंडे , चुनाई , छेमदा , जुडे , तिपुरा , तेहर , थागर , पखरा , फलदा , भगादि , भोगर , मालगुरू , बालगौर , वाहगुरू , शोडिल , हेगर , हूगर औ हांडी वगैरह । 

khatri history in hindi

हिन्‍दू और सिक्‍ख खत्रियों का संबंध तो पूरी तरह रोटी बेटी का सा एक ही रहा है। दोनो का खान पान , विवाह संस्‍कार और अन्‍य प्रथाएं भी एक जैसी रही हैं। एक समय में खत्री परिवार में पैदा होनेवाला पहला बालक संस्‍कार करके सिख बनाया जाता था। अरदास और भोग हिन्‍दु खत्रियों में भी समान रूप से प्रचलित था। सिक्‍ख खत्रियों में गुरू नानक वेदी और अन्‍य सभी सोढी खत्री थे। सिक्‍ख खत्री आज भी अपने नाम के साथ खत्री ही लगाते हैं , ताकि उनमें और जाट सिक्‍खों में अंतर किया जा सके तथा अन्‍य सिखों में उन्‍हें आसानी से पहचाना जा सके। 

इस तरह हिन्‍दू और सिख धर्म को जोडनेवाली कडी खत्री ही है। धर्म से उनके बीच कोई फर्क नहीं पडा है तथा दोनो ही धर्म मानने वाले खत्री साथ साथ भोजन तो करते ही हैं , विवाहादि संबंध भी वैसे ही करते हैं , जैसे वैश्‍य वर्ग के लोग जैनियों से करते हैं। बीच में आतंकवादी गतिविधियों के कारण इसमें कुछ व्‍यवधान अवश्‍य आया था , पर समय के साथ पुन: यह प्रभावहीन होता चला गया और पंजाब में हिन्‍दुओं और सिखों के मध्‍य विभाजन नहीं हो सका।इस राजनीतिक चाल का असफल हो जाना बहुत अच्‍छी बात रही। यह सिख हिन्‍दु मैरिज एक्‍ट और डाइवोर्स एक्‍ट के अधीन ही आते हैं। इस तरह शताब्दियों पुरानी खत्री जाति परंपराएं , रीति रिवाज और संबंधों की ही ऐसी कडी बनाता आया हैं , जिन्‍हें व्‍यक्तिगत स्‍वार्थवश नहीं तोडा जा सकता।




( लेखक .. सीताराम टंडन जी)




सोमवार, 16 नवंबर 2009

पुस्‍तक के दूसरे खंड में मुसलमान खत्रियों की महान विभूतियों ,महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों के साथ ही साथ कल्‍याणकारी संस्‍थाओं का विवरण है !!


कल के आलेख में कुछ समय पूर्व यानि 1975-1976 में हाजी यूसुफ आला राख्‍या पटेल करांची नाम के एक मुसलमान खत्री ने इन खत्रियों पर किया गया अध्‍ययन के गुजराती भाषा में दो खंडों मे प्रकाशित किए जाने की चर्चा हुई थी , जिसमें वर्तमान पाकिस्‍तान के ही नहीं , भारत और पाकिस्‍तान के बाहर रहनेवाले मुसलमान खत्रियों का भी विस्‍तृत विवरण दिया गया था। पहले खंड के बारे में आपको संक्षेप में जानकारी दे ही दी गयी थी , इस पुस्‍तक के दूसरे खंड में मुसलमान खत्रियों की महान विभूतियों ,महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों , संस्‍थाओं के साथ ही साथ कल्‍याणकारी संस्‍थाओं का भी विवरण दिया गया है। 

इस खंड की मुख्‍य रोचक बात इसकी प्रस्‍तावना है , जिसमें मुसलमान खत्रियों द्वारा अपने मूल वंश में जन्‍म पर गर्व प्रकट किया गया है और अपनी व्‍यक्तिगत पहचान बनाए रखने पर प्रसन्‍नता जाहिर की गयी है। इनके अनुसार धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन जाने से जाति का प्राचीन सांस्‍कृतिक गौरव नष्‍ट नहीं हो जाता है। सबसे बढकर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि पोशाक , धर्म और देश तक के भिन्‍न हो जाने से उनके मध्‍य जातिप्रेम की कमी नहीं अायी। इनके विवाह संबंध भी अपने ही मुसलमान तड या जाति में होते हैं। वे अभी भी अनेक मूल खत्री प्रथाओं तथा रिवाजों का पालन करते हैं। ऐसा भी ज्ञात हुआ था कि अनेक मुसलमान खत्री अपने लडके लडकियों की जन्‍म‍पत्रिका मिलाकर विवाह करने को उत्‍सुक रहे हैं। 

सन् 1930 के आसपास फजले हसन नाम के एक मुसलमान खत्री वाइसराय की एक्‍जेक्‍यूटिव कौंसिल के मेंबर थे। वह सहगल खत्री थे और विवाह की साइत निकालने के लिए ब्राह्मण पुरोहित को बुलवाया करते थे। इसका उल्‍लेख दुर्गादास ने अपनी पुस्‍तक 'इंडिया फ्राम कर्जन टू नेहरू' में भी किया है। ऐसी ही प्रथा अभी तक लखनऊ में बसे कुछ मुसलमान गद्दी परिवारों में भी पायी जाती है। ऐसे कुछ परिवार गुजरात और पंजाब के बाहर भी जाकर बस गए थे , यद्यपि वे अपना मूल भूल गए हैं। पहले कुछ मुसलमान खत्री अपने मुसलमानी नाम के साथ अपनी खत्री अल्‍ल भी लगाया करते थे। पाकिस्‍तानी पंजाब में अब यह प्रथा काफी कम हो गयी है। यूसुफ पटेल का कहना है कि इन मुसलमान खत्रियों को अपने नाम के साथ खत्री लगाने में कोई दिक्‍कत नहीं थी , पर कुछ ने अपने प्रशासनिक पदवियों को अपने साथ लगा रखा था , जैसे युसुफ साहब के नाम के साथ खुद पटेल की पदवी लगी थी .




( लेखक .. सीताराम टंडन जी)








 


रविवार, 15 नवंबर 2009

पंजाब के खत्री मुसलमान लोग 'खोजा' कहलाते हैं !!


डी इब्‍टेशन के 'पंजाब कास्‍ट्स' के पृष्‍ठ 248 के अनुसार करीब 2600 मुसलमान खत्री मुल्‍तान और झंग में बसे हुए थे और उन्‍हें वहां खोजा कहा जाता था, क्‍यूंकि इनमें से ज्‍यादा खत्री कपूर अल्‍ल के थे। शाहपुर के लगभग सभी खोजा खत्री ही हैं , पर झांगे में बसे खोजा इस्‍लाम धर्म अपनाने वाले पूर्व के अरोडा खत्री हैं। मुसलमान फेरीवालों के लिए पंजाब में एक शब्‍द 'पारचा' भी प्रयुक्‍त किया जाता है। नमक की पहाडियों की तरफ के इन पारचाओं का मुख्‍यालय पिंडी के पास मुखाड में है तथा अटक और पेशावर में इनकी बडी बडी बस्तियां हैं , जहां से ये मध्‍य एशिया के शहरों में दूर दूर तक सूती , रेशमी वस्‍त्र , नील और चाय का दूर दूर तक व्‍यापार करते थे। 

यह कहा जाता है कि शाहजहां के समय में ये मूलखंड से आकर बसे थे। कोई कोई कहते हें कि ये लाहौर के खत्री थे , जिन्‍हें जमनशाह ने निकाल दिया था। ये अपनी लडकियां सिर्फ पारचा लोगों को ही देते हैं। यद्यपि कभी कभी वे बाहर से लडकियां ले लेते हैं। इनमें हिन्‍दुओं की राजा उपाधि अभी तक चलती है। कुछ समय पूर्व यानि 1975-1976 में हाजी यूसुफ आला राख्‍या पटेल करांची नाम के एक मुसलमान खत्री ने इन खत्रियों पर किया गया अध्‍ययन गुजराती भाषा में दो खंडों मे प्रकाशित किया था, जिसमें वर्तमान पाकिस्‍तान के ही नहीं , भारत और पाकिस्‍तान के बाहर रहनेवाले मुसलमान खत्रियों का भी विस्‍तृत विवरण दिया गया था। यूसूफ ए पटेल स्‍वयं कच्‍छ के रहनेवाले थे और सन् 1948 में पाकिस्‍तान चले गए थे। पाकिस्‍तान में वे पाकिस्‍तान खत्री कान्‍फ्रेंस के अध्‍यक्ष भी रहें। 

उन्‍होने पाकिस्‍तान में रहनेवाले खत्रियों का ही नहीं , भारत में रहनेवाले खत्रियों का भी सांस्‍कृतिक और ऐतिहासिक अध्‍ययन प्रस्‍तुत किया है। इस अध्‍ययन में कच्‍छ , मकराना , गुजरात , काठियावाड , सिंध , मांडवी , मालवी और करांची के हलाई मुसलमान खत्रियों पर विशेष अध्‍ययन प्रस्‍तुत किया गया था तथा हिन्‍दू और मुसलमान दोनो प्रकार के सिन्‍धी खत्रियों का भी जिक्र है। इस बुजुर्ग विद्वान लेखक ने अलग अलग स्‍थानो पर उनकी केवल जनसंख्‍या ही नहीं दी , बल्कि सामाजिक प्रथाओं और रीति रिवाजों का भी विस्‍तृत विवरण दिया है। उन्‍होने यह भी बताया कि कच्‍छ , काठियावाड , सिन्‍ध , गुजरात में मुसलमान खत्रियों के 56 मुखिया हैं। उनके दिए खत्री परिवारों की जनसंख्‍या के आंकडे तो रोचक है ही , साथ ही उसमें मुसलमान खत्री समुदाय को उदार दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी गयी है और उनके कल्‍याण की भी कामना की गयी है

( लेखक .. सीताराम टंडन जी)





शनिवार, 14 नवंबर 2009

यत्र तत्र खासकर कच्‍छ में कुछ खत्री मुसलमान भी बन गए थे !!

(खत्री सीताराम टंडन जी के सौजन्‍य से)
1901 की जनगणना रिपोर्ट , पृष्‍ठ 289 में मुसलमान खत्रियों की जनसंख्‍या 11751 लिखी गयी है , जिसमें पंजाब तथा देश के अन्‍य भागों में बसे खत्री मुसलमानों की संख्‍या शामिल है। बंबई गजेटियर में कच्‍छ के मुसलमान खत्रियों का खासकर उल्‍लेख किया गया है। ये खत्री 16वीं शताब्‍दी के मध्‍य में सन् 1554 के आसपास सिंध से आए बताए जाते हैं। कहा जाता है कि किसी खत्रिय का अपने पुरोहित सारस्‍वत ब्राह्मण से किसी कारणवश झगडा हो गया था , इस कारण उसने इस्‍लाम धर्म स्‍वीकार कर लिया। गुजरात का एक अन्‍य खत्री ने भी परिस्थितिवश इस्‍लामधर्म स्‍वीकार कर लिया था। यद्यपि वह दबाबवश मुसलमान हो गया था , पर उसे अपने प्राचीन वंश पर बडा मान था। गुजरात में अहमदाबाद के निकट शंखे स्‍थान पर शेख अहमद खत्री मस्जिद और मकबरा बना है , जो सन् 1446 ईस्‍वी में बना था। इसका निर्माण मुहम्‍मद शाह द्वारा आरंभ किया गया था और पांच वर्ष पश्‍चात् कुतुबुद्दीन द्वारा पूरी किया गया।

सभी खत्री मुसलमान अपना सर मुंडाते , दाढी रखते और मुसलमानों के वस्‍त्र पहनते हैं। साफ रंग , चपटा चेहरा , लंबे कान और चौडे मस्‍तक वाले ये मुसलमान खत्री अत्‍यंत परिश्रमी और ईमानदार , सभ्‍य , मितव्‍ययी और शालीन हैं।ये रंगरेज , बढई , खरादी और कृषकों का काम करते हैं। इनकी औरतें सिलाई, कढाई और झालर बनाने में अत्‍यंत कुशल होती हैं। धार्मिक दृष्टि से ये कट्टर सुन्‍नी हैं औ आपस में ही शादी विवाह करते हैं। इनमें अधिकतर रूढिवादी हैं और नए व्‍यवसाय नहीं करते। अपने में से ही व्‍यक्तियों को चुनकर ये सामाजिक विवादों का निबटारा कर लेते हैं। खोजा , मेमन और बोहरे भी इस्‍लाम धर्म अपनाने वाले पूर्व क्षत्रिय यानि खत्रिय ही हैं।





भारतवर्ष के कई राज्‍यों में 'खेत्री' के नाम से जानेवाली जाति भी खत्री ही है !!



विशाखापतनम मैनुअल में 'खेत्री' नाम की एक अन्‍य जाति का भी विवरण है, जो जेपौर के जमींदार थे। इनके 16 कुल हैं , सभी जनेउ पहनते हैं। इसी जेपोर एजेंसी के क्षेत्र में कुछ खत्री कृषको का भी उल्‍लेख है , जो दक्षिण के जुलाहे खत्रियों से भिन्‍न हैं। ये सूर्य, बाघ , कच्‍छप और नागवंशी खत्रियों में बंटे हैं। ये अपनी कन्‍याओं का विवाह व्‍यस्‍क होने से पूर्व करते हैं और एक उडिया ब्राह्मण इनके विवाह संस्‍कार कराता है। संस्‍कार कन्‍या के घर पर होता है , वर विवाह के समय पहली बार जनेउ धारण करता है। इनका रंग साफ है और ये उडिया भाषा बोला करते हैं। 

इतिहासों में यह उल्‍लेख मिलता है कि मई या जून सन् 1360 ईस्‍वी में वारंगल के युद्ध में राज्‍य के सब नगरों के हिन्‍दू महाजन तथा रूपए की अदला बदली करनेवाले व्‍यापारी राजाज्ञा से मार डाले गए। आर्थिक जीवन में उनका स्‍थान उत्‍तरी भारत की खत्री जाति ने ले लिया , जो कि उन विभिन्‍न सेनाओं के साथ आए थे , जिन्‍होने दक्षिण भारत पर आक्रमण किए। वे लोग फिरोज शाह बहमनी (1374-1422) के राज्‍य तक व्‍यापार और महाजनी के धंधे में सर्वेसर्वा रहें। उसके ही राज्‍य में मारे गए व्‍यापारियों के पुत्रों को पुन: अपना व्‍यापार आरंभ करने की आज्ञा मिली। 

दक्षिण भारत के खत्री सामान्‍यतया अल्‍पसंख्‍यक और असंगठित होने के कारण पिछडेपन के शिकार हैं , अत: स्‍थानीय सरकारों ने आरक्षण नीति के अंतर्गत उन्‍हें पिछडे वर्ग में रखा है। तमिलनाडु में भी खत्री समाज को पिछडे वर्ग में ही रखा गया है।


(खत्री सीताराम टंडन जी के सौजन्‍य से)



शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

रिजले साहब की भूल का दूषित कुप्रभाव समाज से दूर नहीं हुआ !!



हिन्‍दू समाज में खत्रियों की क्‍या स्थिति है , इस विवाद ग्रस्‍त प्रश्‍न पर पिछली सदी से पर्याप्‍त कहा लिखा जा चुका है। इस प्राचीन सैनिक जाति को तीसरी श्रेणी में रखकर रिजले ने काफी क्षति पहुंचायी। संभव है यह त्रुटि भूल या उपेक्षा से ही हुई हो। बाद में क्षमा मांगते हुए उन्‍होने इसे सुधार तो दिया और निश्‍चय ही इस विवादग्रस्‍त प्रश्‍न का अंत हो गया , पर ऐसा लगता है कि रिजले साहब की भूल का दूषित कुप्रभाव समाप्‍त नहीं हुआ। 'दी संविन मूर्स इंडियन अपील' द्वारा इस विषय पर अधिकारपूर्ण दृष्टिकोण से पर्याप्‍त प्रकाश डाला गया है। इसमें एक शती से भी पूर्व प्रीवी कौंसिल द्वारा सदा के लिए निर्णय कर दिया गया था कि खत्री लोग प्राचीन फिरकों या जाति में से एक प्रस्‍फुटित या निर्मित जामत का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। भारतीय समाज में अपनी वास्‍तविक स्थिति को निर्धारित करने के लिए इतना पर्याप्‍त था , पर ब्रिटीश कूटनीतिज्ञता की कार्यप्रणाली का क्‍या कहना ? उन्‍नीसवीं सदी के अंतिम भाग में जनगणना के कार्यों में हाथ लगाया गया और जानबूझकर यह अपकार कर डाला गया। 

यदि ट्राइब्‍स एंड कास्‍ट्स ऑफ बंगाल के पहले खंड से कुछ उपयोगी वाक्‍यांश उद्धृत किए जाएं , तो अनुपयुक्‍त न होगा ' जाति की आंतरिक व्‍यवस्‍था इस बात की द्योतक है कि खत्री न तो ब्राह्मणों के वंशज हैं और न ही क्षत्रियों के । जो सिद्धांत उन्‍हें क्षत्रियों से संबंधित बताता है , उसका अस्तित्‍व किसी स्‍थायी नींव पर न होकर केवल नाम मात्र की समरूपता पर है। अपने रंगरूप के कारण वे अधिकारपूर्ण रूप से खुद को आर्यवंश के अंतर्गत रख सकते हैं। किन्‍तु उनके जिन विभिन्‍न भेदों का उल्‍लेख हुआ है , उसमें से कोई भी अस्‍थानीय नाम राजपूत वंश की विशेषताओं के द्योतक नहीं हैं। यदि वे उसी नस्‍ल के होते , जिनसे राजपूतों के विभिन्‍न कुल हैं , तो उनके भी वही जातीय नाम होते , यह समझना वास्‍तव में कठिन हो जाता है कि उन्‍होने कम महत्‍वपूर्ण पैतृक अल्‍लों के लिए उनका क्‍यूं परित्‍याग कर दिया।' 

इस अवांछनीय मत के प्रति संपूर्ण देश में क्षोभ और क्रोध की आग फैल गयी। जिसके कारण जनगणना के कमिश्‍नर ने महाराजा बर्दवान को पत्र लिखकर इस त्रुटि का संशोधन कर दिया। इसमें इन्‍होने बताया कि ' बिना इस वितर्क पर जोर देते हुए कि मैं तुरंत कह सकता हूं कि मेरे सम्‍मुख जो प्रमाण रखा गया है , उससे यह बात स्‍पष्‍ट हो जाती है कि कम से कम ब्रिटीश भारत में साधारणतया खत्री हिन्‍दू परंपरा के क्षत्रियों के सच्‍चे प्रतिनिधि हैं। जनगणना के कार्य के लिए यह बात कि बहुत से लोगों का ऐसा विश्‍वास है और यह पूछना कि किन बातों के आधार पर वे ऐसा कहते हैं , निस्‍सर होगा। अत: जनगणना अधिकारियों को यह आदेश दिया जाता है कि क्षत्रियों के अंतर्गत ही जातियों के विभाजन के समय खत्रियों को समिमलित कर लिया जाए !!

(लेखक .. खत्री डा वैजनाथ पुरी जी)


गुरुवार, 12 नवंबर 2009

अंत में यमुना गंगा प्रदेश में आनेवाले खत्री अभी तक पंजाबी खत्री ही कहलाते हैं !!



पंजाबी खत्रियों का पूर्व की ओर गंगा यमुना प्रदेश में आने का समय व्‍यापक राजनीतिक चेतना और आजादी की नई लहर और जागृति का युग रहा है। इसलिए पंजाबियों की पूरी संस्‍कृति इनमें अभी तक दिखाई पड ही रही है। ये लोग बहुत शीघ्र ही अपने पहले आए खत्री भाइयों से घुल मिल गए और इनके विवाहादि संबंध भी पूर्विए और पच्‍छए दोनो से होने लगे। 

पूर्विए खत्रियों ने कुछ प्रगतिशील कदम पहले ही उठा लिए थे। जैसे उन्‍होने समस्‍त अल्‍ल के खत्रियों के साथ आपस में विवाह संबंध करना शुरू कर दिया था , जबकि पच्‍छए चौजातिए ( मेहरोत्रे , खन्‍ने , कपूर और सेठ) अपने घेरे से बाहर आकर विवाह संबंध कायम करने में अभी पिछले 20 25 वर्ष पूर्व तक सकुचाते रहे हैं। यह प्रसन्‍नता की बात है कि अब ऐसा युग आ गया है कि समस्‍त खत्री जाति में संकीर्णता के बंधन टूअ गए हैं और अब समस्‍त खत्री भाइयों के मध्‍य , चाहे वे जिस अल्‍ल के हों या पूर्विए , पच्‍छए या पंजाबी जो भी हों , सबमें विवाह संबंध बिना रोक टोक होने लगे हैं और यह खत्रियों की प्रगति का चिन्‍ह है।

( खत्री हितैषी के स्‍वर्ण जयंति विशेषांक से)








 


क्‍या ईश्‍वर ने शूद्रो को सेवा करने के लिए ही जन्‍म दिया था ??

शूद्र कौन थे प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर थी, पर धीरे-धीरे यह व्यवस्था जन्म आधारित होने लगी । पहले वर्ण के लोग विद्या , द...