Monday, 31 January 2011

हमारे संस्‍कार ( खत्री हरिमोहन दास टंडन जी) ... भाग . 3


हिंदू धर्म में उपनयन का बहुत महत्‍व है। इस संस्‍कार को बालक के समझदार होने पर करने का विधान है , जिससे वह धार्मिक कृत्‍यो को अच्‍छी तरह समझ सके और चरित्र निर्माण संबंधी बातों को समझ पाए। इसके बाद ही उसे धार्मिक कर्म ( यज्ञ , पूजन , श्राद्ध आदि) तथा शालाध्‍ययन का अधिकार प्राप्‍त होता है। उसे द्विजता प्राप्‍त होती है और वह गायत्री मंत्र का भी अधिकारी होता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्‍म है , बालक प्रथम जनम मे मां के उदर के अंधकार से मुक्‍त होता है और सांस्‍कारित जन्‍म में वह अज्ञान से मुक्‍त होकर ाान के प्रकाश की ओर उन्‍मुख होता है। उसं गायत्री मंत्र संध्‍याकृत के साथ दो बार जाप करने का निर्देश दिया जाता है। संसार में सबसे ज्‍योतिर्मय सूर्य है। उससे ही स्थिरता , संयमितता और प्रखर बुद्धि के विकास की द्विज कामना करता है। विवेक , बुद्धि से वो प्रतिभाशाली और म‍हान बनता है। उपनयन के समय ब्रह्मचारी को उपवीत सूत्र पहनाया जाता है , जिसे जनेऊ कहते हैं। पहले बालक और बालिका दोनो का उपनयन होता था , परंतु कालांतर में बालिकाओं का उपनयन बंद हो गया , क्‍यूंकि उनका गुरूकुल में रहकर ज्ञानार्जन बंद हो गया। इसी कारण विवाहोपरांत जोडा जनेऊ पहना जाता है , क्‍यूंकि सभी धार्मिक कृत्‍य पति और पत्‍नी मिलकर करते हैं।

समावर्तन के बाद ब्रह्मचारी को विवाहोपरांत गृहस्‍थ जीवन व्‍यतीत करने का अधिकार मिलता है। हिंदू धर्म में विवाह को केवल कामयोग की कानूनी स्‍वीकृति नहीं माा गया है , यह स्‍त्री और पुरूष के बीच मिलकर घर गृहस्‍थी चलाने का एक समझौता भी नहीं है , जिसे ढोया या रद्द किया जा सके। यह एक समर्पण है , सहयोगी भावना से जीवन चलाने का संकल्‍प है , स्‍त्री सहधर्मिर्णी है , अर्द्धांगिनी है , विवाह का बंधन अटूट है। सुत , शील और धर्म तीनों ही पति और पत्‍नी के सामंजस्‍य पर निर्भर हैं।

जो जन्‍म लेता है , उसकी मृत्‍यु भी होती है , हिंदू धर्म पुनर्जन्‍म पर दृढ विश्‍वास रखता है। अत: अंत्‍येष्टि संस्‍कार में अनेक ऐसे कर्मकांड हैं , जो व्‍यक्ति को अगले जनम में शांतिपूर्ण जीवन जीने में मदद करते हैं। यदि उन्‍होने कोई पाप भी किया हो , तो कर्मकांड की मदद से उसका प्रक्षालन करने की कोशिश की जाती है। पूर्वजों से प्राणी का संबंध स्‍थापित कर उसे गौरव प्रदान करने की भावना को लेकर भी हमारे यहां कई कर्मकांड हैं। दशगात्र , सपिंडी , तथा पितृ मिलन की क्रिया तदर्थ ही निहित है। वार्षिक श्राद्ध करने की परंपरा आर्य गौरव तथा संस्‍कृति की रक्षा की भावना से प्रचलित हुई है। उसका ध्‍येय है कि पूर्वजों द्वारा अर्जित धवल यश कीर्ति सदैव आकाशदीप बनकर हमारा मार्गदर्शन करता रहे।
आजकल ऐसा प्रदर्शन बढ रहा है कि कुछ संस्‍कार सनातन धर्म के हिसाब से और कुछ आर्य समाज के हिसाब से किए जाते हैं। यह स्थिति श्रेययस्‍कर कदापि नहीं। निजी सुविधा , धार्मिक कृत्‍यों पर अविश्‍वास और आर्थिक कारणों से अव्‍यवस्‍था निरंतर फैल रही है। मनुष्‍य को एक धर्म या संप्रदाय के अनुसार अपनी जीवनप्रणाली निश्चित करनी चाहिए। हम सनातनधर्मी हैं और उसके अनुसार संस्‍कार करके ही संसार की सर्वोत्‍तम संस्‍कृति का निर्माण कर सके हैं। अत: सनातन धर्म के अनुसार संस्‍कार करने में हमारी भलाई है। संस्‍कार एक शिक्षा है और कर्मकांड एक विधि। देश , काल , पात्र और परिस्थिति के अनुसार कर्मकांड में सुधार हो सकता है , पर संस्‍कार नियत है। कर्मकांड विवेचना एक विस्‍तृत विषय है और इसपर आज की विशेष परिस्थिति में विद्वज्‍जन ही प्रकाश डाल सकते हैं।

Sunday, 30 January 2011

हमारे संस्‍कार ( खत्री हरिमोहन दास टंडन जी) ... भाग . 2


वर्तमान समय में संस्‍कारों की उपेक्षा में केवल शिक्षा तथा संसर्ग या कलिकाल ही एकमात्र कारण नहीं है , उसका एक प्रमुख कारण पूर्वजों के अज्ञान , आचरण , अशिक्षा और अंधविश्‍वास में भी है। लगभग 1200 वर्ष के विदेशी शासन और उसके कारण उत्‍पन्‍न अस्थिरता के फलस्‍वरूप हमारी शिक्षा और सामाजिक व्‍यवस्‍था छिन्‍न भिन्‍न हो गयी है। पूर्वजों ने संस्‍कार रीति रिवाज और धार्मिक कट्टरता को एक सूत्र में पिरो दिया। धीरे धीरे सबकुछ इतना गड्ड मड्ड हो गया कि इनको अलग करना बहुत कठिन हो गया।

भारतीय मान्‍यता के अनुसार संस्‍कार का संबंध न केवल इस जन्‍म से बल्कि जनम जनमांतर से भी है , जबकि रीति रिवाज परिवर्तनशील होते हैं। हम एक उदाहरण के द्वारा इस बात को स्‍पष्‍ट कर सकते हैं। पूर्वकाल में मुंडन और विवाह के अवसर पर एक ढीला ढाला वस्‍त्र पहनाया जाता था , जिसे बागा कहते थे। वह केवल शोभा थी , संस्‍कार नहीं। इस तरह विवाह के अवसर पर आमोद प्रमोद के लिए कई रस्‍में हुआ करती हैं , जैसे वर के जूत्‍ते को छुपा देना , वर से छंद सुनना , कठौती , कंगना खोलना आदि , जो आज समयाभाव से प्राय: समाप्‍त हो रही है। पर संस्‍कार हिंदूत्‍व के अभिन्‍न अंग हैं , उनके त्‍याग से हिंदू धर्म का ही लोप हो जाएगा।

हिंदू शास्‍त्रकारों के मतानुसार जन्‍म से बच्‍चे का कोई धर्म नहीं होता , उसका जब किसी विशेष धर्म के अनुसार संस्‍कार किया जाता है , तो वह धर्म के नाम से अभिहित होता है। ईसाई , पारसी , मुसलमान ,‍ हिंदू , बौद्ध आदि धर्मों में ऐसे संस्‍कारों की व्‍यवस्‍था है , जिनके कर्मकांडों को पूरा करने के बाद ही बालक उसका अंग बनता है। शिक्षा और अन्‍य जीवन पद्धतियों के द्वारा विशिष्‍ट धर्म पर आस्‍था पैदा की जाती है और शुभाशुभ फल के प्रति विश्‍वास पैदा किया जाता है।

हिंदू शास्‍त्रों का मत है कि जैसा बीज बोया जाता है , वैसा ही वृक्ष होता है। उसपर भूमि , जल , वायु और प्रकाश का भी प्रभाव पउता है। इस प्रकार चरित्रवान , विचारवान , सुशिक्षित , स्‍वस्‍थ और धार्मिक व्‍यक्ति की संतान सुसंस्‍कृत परिवार और समाज के सहयोग से अधिकाधिक गुणवान और प्रतिभाशाली होती हैं। जिस तरह कृषक का धर्म है कि दोष रहित बीज को ऋतु और मिट्टी का ध्‍यान रखते हुए आरोपित करे , उसी प्रकार गर्भाधान में भी काल , अवसर , स्‍वास्‍थ्‍य और मानसिक शांति का ध्‍यान रखना आवश्‍यक होता है। केवल पशुवत् वासना तृप्ति ही जीवन का ध्‍येय नहीं होता।

जिस प्रकार कुछ समय व्‍यतीत होने पर बीज से अंकुर निकलकर पल्‍लवित होता है , उसके बाद फल प्राप्ति होने से पूर्व तक माली को विशेष देख रेख करनी होती है , उसी प्रकार गर्भाधान के बाद संतान के जनम से पूर्व दो प्रकार के संस्‍कार किए जाते हैं। तीसरे महीने में पुसवन और छठे या आठवे महीने में सीमन्‍त सीमन्‍तोन्‍नयन संस्‍कार संपन्‍न होता है। पुंसवन के बाद से माता के विचार और व्‍यवहार का प्रभाव निर्माणाधीन बच्‍चे पर पडने लगता है। सीमांत संस्‍कार के काल से गर्भ के बच्‍चे में ग्रहण की शक्ति आ जाती है। अर्जुन पुत्र अभिमन्‍यू ने चक्रव्‍यूह भेदन का ज्ञान और अष्‍टावक्र ने आध्‍यात्‍म ज्ञान उसी अवस्‍था में ग्रहण किया था। खत्रियों के यहां ये दोनो संस्‍कार रीति और गोद भरने के रूप में प्रचलित हैं।

जातकर्म , नामकरण , निष्‍कम्रण , अन्‍नप्राशन , विद्यारंभ , और कर्णभेद संस्‍कार नाम से ही स्‍पष्‍ट हैं। जीवन से संबंधित हर कार्य धार्मिक दृष्टि से ही करने का विधान है।सुमंगल की दृष्टि से उनके लिए तिथि , वार , नक्षत्र आदि का विचार करने की व्‍यवस्‍था की गयी है। षष्‍ठी पूजन एक संस्‍कार नहीं , अनुष्‍ठान है। वह भगवती षष्‍ठी को , जो स्‍वामी कार्तिकेय जी की पतनी है और बालकों की अधिष्‍ठात्री देवी हैं , को प्रसन्‍न करने के लिए किया जाता है। संतान की दीर्घ आयु , सुरक्षा और भरण पोषण के लिए इस देवी की पूजा का प्रचलन हुआ।

चूडाकर्म संस्‍कार के बिना शिशु हिंदू नहीं बनता है। सभी वर्णों के लिए यह अनिवार्य संस्‍कार है। चूडाकर्म के द्वारा बालको के गर्भ के बालों का क्षौर कर चोटी रख दी जाती है। प्रत्‍येक हिंदू के लिए चोटी की रक्षा करना आवश्‍यक होता है , क्‍यूंकि धार्मिक अनुष्‍ठान , संध्‍या , श्राद्ध आदि कर्मकांडों में उसकी आवश्‍यकता रहत है। यह हिंदुत्‍व की पहचान है। विद्यारंभ से लेकर समावर्तन तक के पांच संस्‍कार शैक्षणिक कहे जाते हैं। विद्यारंभ , उपनयन , वेदारंभ , केशांत और समावर्तन तक के नाम से प्रसिद्ध हैं। बालक या बालिका को पांच वर्ष तक शिक्षा देना माता का धर्म है , उसके बाद अक्षरारंभ और आरंभिक ज्ञान का अवसर आता है , बालक समाज के बीच विचरण करता है , तब उसके आचरण और चारित्रिक गुणों का विकास करना पिता का कर्तब्‍य है।

क्षत्रियों का उपनयन संस्‍कार 11 वें वर्ष में करने का विधान है। उसके बाद बालक या बालिका की उच्‍च शिक्षा और चरित्र निर्माण आदि का भार सुयोग्‍य गुरू को सौंप देना चाहिए। ब्रह्मचर्य पालन के साथ साथ यम , नियम आदि का पालन और योग्‍यतानुसार विद्या का अभ्‍यास समावर्तन तक चलता रहता है। खत्रियों के लिए उपनयन की अधिकतम आयु 21 वर्ष है। उपनयन और समावर्तन दोनो ही अवसरों पर केशांत किया जाता है। शीश पर केश शोभा की वस्‍तु है , जिसका त्‍याग करना रेयस्‍कर माना गया है , क्‍यूंकि सांसारिकता के मोह का त्‍याग ही संस्‍कारों का लक्ष्‍य है। समावर्तन वर्तमान दीक्षांत समारोहों के समान है ख्, जिसमें गुरू विद्यार्थियों को भविष्‍य में जीवन के कर्तब्‍यों , विद्या के सदुपोग और बाधाओं से जूझने के लिए उपदेश देता है।

Friday, 28 January 2011

हमारे संस्‍कार ( खत्री हरिमोहन दास टंडन जी) ... भाग . 1


संस्‍कृत कोष के अनुसार संस्‍कार का मुख्‍य अर्थ है .. शिक्षा , अनुशीलन , मानासक प्रशिक्षण , अन्‍त: शुद्धि , पवित्रिकरण , पुनीत कृत्‍य , श्रंगार , चमकाना आदि। मनुष्‍य का प्रशिक्षण आ पवित्रिकरण कर उसको अधिक से अधिक चमकाना , मानव चरित्र का परिमार्जन कर उसके अंदर सद्भावना , सत्‍य , अहिंसा , दया , सहनशीलता आदि सद्गुणों का विकास करना ही संस्‍कार का उद्देश्‍य है। यह एक लंबी कष्‍टसाधन प्रक्रिया है , जिसके द्वारा किसी जाति या समाज की पहचान बनती है और यही पहचान संस्‍कृति कहलाती है।

भारतीय मनीषीयों ने चिंतन , मनन और अनुभव के द्वारा मानव जीवन का उद्देश्‍य , उसका लक्ष्‍य तथा उसके स्‍वरूप का निश्‍चय किया। पशुजगत में व्‍याप्‍त मनोविकारों , मोह आदि के आकर्षणों से मन को हटाकर सत्‍यानुभूति की ओर उन्‍मुख करने की चेष्‍टा ऋषियों ने की अर्थात् मनुष्‍य को कतिपय संस्‍कारों से शुद्ध कर उसे शाष्‍वत मूल्‍यों को ग्रहण करने की प्रेरणा दी। सृष्टि संचालन के ध्‍येय से भौतिकता का महत्‍व स्‍वीकार करते हुए परमतत्‍व की प्राप्ति को जीवन का लख्‍य निर्धारित किया गया। इस तरह नश्‍वरता से अनश्‍वरता की ओर बढने का प्रयास आध्‍यात्मिकता का आधार है। यह भारतीय संस्‍कृति की विशिष्‍टता है , उसकी पहचान है। सनातन सत्‍य की खोज और ज्ञान का निरंतर परिष्‍कार सनातन धर्म की शक्ति है। श्री हरिभाई उपाध्‍याय के शब्‍दों में जो मार्ग , जो विधि , जो क्रिया हमें ईश्‍वरत्‍व की ओर ले जाती है , वही हिंदू संस्‍कृति , आर्य संस्‍कृति , सज्‍जन संस्‍कृति और सुसंस्‍कृति है। इसके अंतर्गत ही आचार , व्‍यवहार तथा विचार .. सभी का समावेश होता है।
मानव जीवन को पवित्र और उत्‍कृष्‍ट बनाने वाले आध्‍यात्मिक उपचार का नाम संस्‍कार है। वह श्रेष्‍ठता की ओर बढने हेतु किया गया संकल्‍प है। कर्म सिद्धांत के कारण हमने जीवन में संयम , नियम , त्‍याग , प्रेम , अहिंसा , दान , दया , क्षमा और सहिष्‍णुता आदि गुणों को आवश्‍यक मान लिया। भारतीय संस्‍कृति में संयुक्‍त परिवार , विश्‍व बंधुत्‍व , विविधता में एकता आदि अनेक गुण ऐसे हैं , जो  उसे अबाध गति से विकास करने में सहायक हैं।शरीर , इंद्रियां , मन , बुद्धि , चित्‍त आदि .. इन सबके अत्‍यधिक उत्‍कर्ष तक संस्‍कार होते हैं। योग , जप , तप आदि सभी संस्‍कार ही हैं। मोटे तौर पर संस्‍कार दो प्रकार के होते हैं .. मलापनयन और अतिशयाधान। दर्पण को किसी चूर्ण या साबुन से साफ करने को मलापनयन संस्‍कार कहते हें। तेल या रंग द्वारा हाथी के मस्‍तक या काठ या धातु की वस्‍तु को चमकाना या सुंदर बनाना को अतिशयाधान संस्‍कार कहते हैं। 48 संस्‍कारों में कुछ के ारा शारीरिक और मानसिक मल , पाप , अज्ञान आदि का अपनयन और कुछ के द्वारा पवित्रता , शुद्धि , विद्या आदि की अतिशयता का प्रयास किया जाता है।

संस्‍कार और रीति रिवाज में फर्क है। रीति रिवाज परिवार या समाज के सुख , दुख  , उत्‍साह , संबंध , शुभशुभ आदि के प्रदर्शन से जनम लेते हैं। पुत्र जनम  , विवाह आदि अवसरों पर संबंधियों को भेंट देना , तन्‍नी या मंडप के नीचे हल्‍दी तोडना , सेहरा बांधना , मृत्‍यु होने पर महापात्र को दान देना , वर्षभर ब्राह्मण को भोजन कराना कब्र में मूल्‍यवाण वस्‍तुओं को रखना इत्‍यादि रीति रिवाज हैं। संस्‍कारों का विधान शास्‍त्रों में वर्णित है। वर्णों के अनुसार उसमें यत्किंचित भेद तो है , पर मूलभूत विधान में एकता है। देश , काल और परिस्थिति क कारण रीति रिवाजों में सदा परिवर्तन होता रहा है और आगे भी होता रहेगा , पर सनातन धर्म की रक्षा संस्‍कारों द्वारा ही संभव है। संस्‍कार बदलने या त्‍याग देने से धर्म या संप्रदाय ही बदल जाता है। वर्तमान काल में आर्य समाज , ब्रह्म समाज , राधास्‍वामी , सिक्‍ख आदि संप्रदायों का जनम इसी प्रकार हुआ है। किसी भी धर्म या संप्रदाय में दीक्षित होने से पहले और बाद में कुछ संस्‍कार होते हैं , पर सभी धर्मों के मूलभूत सिद्धांत एक ही हैं। जीव दया , दान , सहिष्‍णुता , संयम , समता , परस्‍पर सहानुभूति आदि को ग्रहण करने का उपदेश सभी धर्म देते हैं। वैदिक काल के अबतक प्रचलित हिंदू धर्म के स्‍तंभ प्रधान रूप से 16 संस्‍कार हैं।

सनातन धर्म मनुष्‍य मात्र में समता भावना की शिक्षा देता है। सियाराम मय सब जग जानि या सर्वे भवन्‍तु सुखिन: आदि वाक्‍य समता के उद्घोषक हैं। समय समय पर बौद्धिक और शारीरिक शक्ति संपन्‍न वर्ग ने निर्बल वर्ग को हीन दृष्टि से देखा है। फलत: महान व्‍यक्तियों का प्रादुर्भाव होता है। श्रीराम ने न केवल शक्तिशाली , वरन् अत्‍याचारी रावण से समाज को मुक्ति दिलायी। उन्‍होने निषाद , शबरी , वानर , रीछ आदि उपेक्षित जातियों के बीच भाईचारे की भावना पैदा की थी। कृष्‍ण ने न केवल अत्‍याचारी कंस , शिशुपाल , जरासंध , आदि को नष्‍ट किया , उन्‍होने ग्रामीण जीवन में जुडे उपेक्षित समाज को भी निर्भय कर सम्‍मान दिलाया। गौतम बुद्ध आदि युगपुरूषों ने राजवैभव को तुच्‍छ मानकर अहिंसा , दया , समता का प्रचार किया। धर्म की रक्षा निरंतर होती रहे, समाज और देश में शांति बनीं रहे , और अत्‍याचार पर अंकुश लगा रहे .. इस उद्देश्‍य से क्षत्रियों को उसके नियंत्रण की जिम्‍मेदारी सौंपी गयी। उसके लिए एक सूत्र बना.. धर्मों रक्षति रक्षिता अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है , उसकी रक्षा धर्म करता है। क्षत्रियों ने अपने कर्तब्‍य का सदा पालन किया। यदि उन्‍होने कभी धर्म की उपेक्षा की , तो उन्‍हें ही कष्‍ट भी झेलना पडा , सजा भुगतनी पडी। आज हम पुन: संक्रांति काल से गुजर रहे हैं , क्‍युंकि हम अपने धर्म के मूलाधार संस्‍कारों की उपेक्षा करने मे अपना बडप्‍पन समझते हैं। 

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