Saturday, 10 July 2010

खत्रियों की अल्‍लों का संकलन तो और भी मुश्किल है ... खत्री हरिमोहन दास टंडन जी

भारत का प्राचीन इतिहास आर्यों का इतिहास है और निस्‍संदेह खत्रियों के अंदर आर्य रक्‍त हैं। उत्‍तर भारत में खत्रियों के राज्‍य का विस्‍तार चारो ओर फैला हुआ था , परंतु उसका मुख्‍य केन्‍द्र पंचनद तथा गंगा यमुना का क्षेत्र था। उनके पुरोहित सारस्‍वत ब्राह्मण थे। संस्‍कृत का ‘क्ष’ प्राकृत और अपभ्रंश में ‘ख’ हो जाता है , जो करिदेश्‍वर ऋषि , वररूचि और हेमचंद्र के ग्रंथो से प्रमाणित है। पं हरिश्‍चंद्र शास्‍त्री , पं श्‍याम चरण शास्‍त्री , श्री तलवादमे , मि जे सी नेसफिल्‍ड , मि सी एच इलियट , सर जॉर्ज्‍ कैम्‍बल , मि ए एच विल्‍सन , आदि विद्वानों का मत है कि खत्री क्षत्रिय ही हैं और यह एक सैनिक जाति है।

विदेशियों के आक्रमणों को सबसे अधिक पंचनद प्रदेशों को ही झेलना पडा और इतिहास साक्षी है कि उन्‍होने वीरता पूर्वक देश की रक्षा के लिए युद्ध किया। परंतु खेद है कि वे संगठित नहीं हो सके और आपस की फूट के कारण असफल भी रहें। फलत: उस प्रदेश के निवासी समय समय पर भारत के अन्‍य प्रदेशों में प्रवास कर गए। जो पहले गंगा यमुना के किनारे किनारे कलकत्‍ते तक फैलते गए , वे पूर्विय खत्री कहलाए। और जो बाद में अपने प्रदेश से निकले , वे पछिए कहलाए। इसी प्रकार आगरेवाले , दिल्‍लीवाले , लाहौरिये आदि उपभेद बनते चले गए। राजस्‍थान और गुजरात में बसनेवाले ब्रह्मक्षत्रिय के नाम से विख्‍यात हुए। दक्षिण भारत में सहस्रार्जुन प्रसिद्ध सम्राट हुए हैं , उनके वंशज अपने को सोमवंशीय सहस्रार्जुन खत्री कहते हैं। यह ध्‍यान देने योग्‍य बातें हैं कि ब्रह्मक्षत्रिय और सहस्रार्जुन क्षत्रिय अपने विभेद का कारण प्रसिद्ध परशुराम जी को मानते हैं।

जैसे जैसे खत्री भारत के विभिन्‍न प्रदेशों में बसते गए , वैसे वैसे उन्‍होने स्‍थानीय रीति रिवाजों , व्‍यवहार और व्‍यसाय को अपनाना शुरू किया। इस तरह उनकी अनेक उपजातियां बन गयी। व्‍यवसाय , युद्धकौशल , विभिन्‍न धार्मिक संप्रदायों के प्रति आस्‍था और रहन सहन की विशेषताओं के उपजातियों के नामकरण होते गए , साथ ही सामाजिक प्रतिष्‍ठा और स्‍वाभिमान के कारण कुछ अपने को श्रेष्‍ठ समझने लगे। ऋषि परंपरा के गोत्र भी विभेद का कारण बने। खत्री जाति के उपभेदों को ‘अल्‍ल’ कहते हैं। अल्‍लों की उत्‍पत्ति का कुछ कारण ज्ञात है और कुछ अनुमानित , इसमें बहुत शोध होना आवश्‍यक है।

स्‍वाभाविक है कि भारतवर्ष के विस्‍तृत भूमि पर फैले खत्रियों का परस्‍पर परिचय और संपर्क भली भांति नहीं हो पा रहा था। यातायात के साधनों तथा पत्र पत्रिका पुसतकों की सुलभता की वृद्धि के साथ साथ अब संपर्क सूत्र बढ गया है। वर्तमान युग के सिद्धांतों के प्रभाव से उच्‍च नीच की भावना समाप्‍त हो गयी है। परस्‍पर उपजातियों में विवाह संबंध हो रहे हैं। पहले ढाई घर , चार घर , बारह घर , बावन जाति , सुखरान , सिखरा , सरीन , गुजराती , बहुजाति , ब्रह्मखत्री आदि का जो भेदभाव था , वह मिट रहा है। अत: अगले अंक में खत्रियों के अल्‍लों की सूचि कोष के क्रमानुसार ही दी जा रही है। इसमें अनेक भूल भी हो सकती है , क्‍यूंकि इस प्रकार का कोई अखिल भारतीय प्रयास नहीं होने के कारण जानकारी अभी अधूरी ही है। आशा है , भविष्‍य में खत्रियों के अल्‍लों की उत्‍पत्ति , व्‍यू‍त्‍पत्ति , विस्‍तार और विभेदों पर शोधकार्य किसी विद्वान के द्वारा किए जाने से पूरी जानकारी उपलब्‍ध हो सकेगी।

1 comment:

AlbelaKhatri.com said...

atyant upyogi aur saarthak aalekh

aapki is anupam prastuti ke liye

dhnyavaad !

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