Monday, 4 January 2010

गांधीवाद का दीपक सत्‍य का , तेल तप का , बाती करूणा तथा दया की और लौ क्षमा की है !!

गांधीवाद ऐसा रक्षा कवच है , जो हमें कलुषमुक्‍त रख सकता है। गांधीवाद वह संविधान है , जो हमारे विचार और व्‍यवहार को नियंत्रित करते हुए हमें सत्‍पथा में प्रवृत्‍त कराता है। राष्‍ट्रीय एकता ईंट , पत्‍थर और सिमेंट से जोडकर नहीं तैयार की जा सकती है। यह तो इंसान के दिल और दिमाग मे खामोशी से जन्‍म लेकर पल्‍लवित और पुष्पित करायी जा सकती है। यह वह प्रक्रिया है , जो धीमी , किन्‍तु स्‍थायी और दृढ होती है। इसी एकता को बनाने के लिए राष्‍ट्रपिता आदर्श हैं , जो सबकुछ त्‍यागकर उपेक्षित भारतवासियों में आत्‍म विश्‍वास , आत्‍म गरिमा एवं गतिशीलता का उन्‍मेष कर उन्‍हें राष्‍ट्र के सबल और सक्रिय स्‍वतंत्राता संग्राम के सेनानी के रूप में खडा कर दिया। यह उनका सपना , समता , ममता , स्‍वधर्म के अनुशासन व अनुशासन के परिणाम स्‍वरूप राष्‍ट्र अक्षय वैभव प्राप्‍त करेगा। आपसी विग्रह प्रतिरोध से नहीं , उदारता से समाप्‍त होंगे , ऐसा मानना था बापू का। पर आज के राजनायकों ने क्‍या खिल्‍ली उडायी है उनके आदर्शों ?

मनुष्‍यता की पहचान है बापू , मानवता के प्राणवान प्रतीक हैं बापू , पुरूषों में संत और संतों में सर्वश्रेष्‍ठ भक्‍त हैं बापू , पर बापू के रामराज्‍य का नारा आज प्रनचिन्‍ह बना है। मानस में अंकित ...
दैहिक दैविक भौतिक तापा , रामराज्‍य नहिं कहहि व्‍यापा ।

इसी काब्‍य के पठन और मनन के बाद ही बापू ने रामराज्‍य का नारा दिया होगा। बापू के व्‍यवहार में जादू था , तभी तो सभी उसपर प्राण न्‍यौच्‍छावर करने को तैयार रहते थे। उनके साथ जुडे लोगों को आज के राजनायकों की तरह धन , पद या पेट्रोल की पर्ची या अन्‍य प्रलोभन नहीं दिए जाते थे।

बापू प्रगतिशील , क्रांतिकारी , समाज सुधारक , युग सृष्‍टा , युगदृष्‍टा ने अनुभव के सागर में गोता लगाकर हमारे नवयुवकों को एक शब्‍द दिया 'स्‍वावलंबन' । स्‍वाधीनता का जो प्रकाशदीप दर्शाया , उसका दीपक सत्‍य का , तेल तप का , बाती करूणा तथा दया की और लौ क्षमा की है। क्षमता की लौ से निकला प्रकाश ही मानवता का प्रतीक है। संदेश है गमता और समता का। उनके द्वारा प्रतिष्‍ठापित प्रतिष्ठित जीवन मूल्‍यों को अपने जीवन में उतारने हेतु मानवीय मूल्‍यों व मर्यादा से इसी धर्ममय विवेकमय , शीलरूप ,निष्‍पक्ष , निरपेक्ष बनते हुए मानवता की मंगलमयी सुगंध को अपने जीवन में विकसित , पललवित , पोषित करते रहना हमारी सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी।

(लेखिका .. डॉ रजनी सरीन)




2 comments:

Kajal Kumar said...

काली कमाई के नोटों पर भी छपे गांधी जी को कैसा लगता होगा..

Kulwant Happy said...

आपका लेखन बहुत शानदार है। आपका नजरिया गांधी जी के प्रति बहुत अच्छा ये देखकर बहुत अच्छा लगा। लेकिन मैं कुछ तरह सोचता हूं।


ગાંધી जब से गांधीवाद हुए हैं,
तब से शुरू विवाद हुए हैं,

अगर हो सके तो एक नजर
मेरे सपनों में नहीं आते गांधी

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