Saturday, 30 January 2010

व्‍यक्तित्‍व विकास के लिए हीनता सबसे बडी बीमारी है !!

क्‍या आपके साथ भी ऐसा होता है कि किसी धनी , सुदर और प्रभावशाली व्‍यक्तित्‍व को देखकर और उससे मिलने पर घबराहट , बेचैनी और घुटन महसूस करते हैं, जिससे आप बात शुरू कर सकें या शुरू की गयी बात को जल्‍द समाप्‍त कर सकें या कृत्रिम मुस्‍कान के साथ बने रहें , तो इसका अर्थ यह है कि आप अपने आपको सामने वाले से कम आंकते हैं और अपने अंदर हीन भावना पाते हैं। आत्‍मविश्‍वासी और पढी लिखी किशोरियां और महिलाओं के दूसरों के सामने खुलकर न बोल पाने या घबडाने के पीछे की हीन भावना भी अपने आपको हर रूप में श्रेष्‍ठ दिखाने की लालसा के कारण जन्‍म लेती है।

हमारे दाम्‍पत्‍य जीवन में भी आत्‍महीनता जहर घोलती है , किशोरावस्‍था से ही किसी के मन में यह भावना घर कर जाए कि वह असुंदर है और इसपर सौभाग्‍य से इसका पार्टनर बीस हो गया , तो उसके अंदर हमेशा असुरक्षा की भावना पनपती है। कुछ लोग बचपन में हुई गल्‍ती के लिए भी अपने को उत्‍तरदायी मान लेते हैं और अपने दाम्‍पत्‍य जीवन का नुकसान कर डालते हैं। ऐसे व्‍यक्तित्‍व के चंहरे हमेशा मुर्झाए , उदास , शंकालु और बुझे बुझे दिखते हैं। लडकियों में आत्‍महीनता लडकों से प्रतिस्‍पर्धा के कारण भी जन्‍म लेती है , क्‍यूंकि आज भी उन्‍हें पराया घन समझकर ही शिक्षा दी जाती है ,।

विभिन्‍न प्रयोगों से स्‍पष्‍ट है कि अपने को हेय समझना हमारे व्‍यक्तित्‍व की सबसे बडी कमजोरी है , दूसरों को हमेशा अपने से समर्थ और स्‍वयं को मिन्‍म समझना जीवन में सफलता पाने में सबसे बडी बाधा है। दब्‍बू , झेंपू और संकोची किस्‍म की लडकियां प्रतिभासंपन्‍न होते हुए भी अपने मन की साधारण सी बात कहने में भी घुटन महसूस करती है। किसी स्‍थान पर साक्षात्‍कार के नाम से ही उनके हाथ पांव फूलने लगगते हैं। प्राय: देखा गया है कि दुर्भावनाएं भी आत्‍महीनता की घुटन में ही जन्‍म लेती हैं। इसलिए आत्‍महीनता से बचने के लिए स्‍वयं को श्रेष्‍ठ समझने की प्रवृत्ति का विकास किया जाना चाहिए , व्‍यवहार में आत्‍मीयता लाएं , सकारात्‍मक दृष्टिकोण रखते हुए स्‍वयं में और ईश्‍वर पर विश्‍वास रखें !!

लेखिका ... डॉ श्रीमती मीनू मेहरोत्रा

Friday, 29 January 2010

सारी दुनिया भारत की गोत्र व्‍यवस्‍था को देखकर चकित होती रही हैं !!

हमारी मूल गोत्र व्‍यवस्‍था , जो कालांतर में विकसित हुई और इसी का उल्‍लेख 'सेक्रेड बुक ऑफ द ईस्‍ट' नामक प्रसिद्ध अंग्रेजी ग्रंथ में किया गया है। उसी प्राचीन काल में वेदोक्‍त वैज्ञानिक नियम के कारण ऋषियों ने एक ही वंश में उत्‍पन्‍न लोगों का आपस में विवाह संबंध निषेध कर दिया था , और इस कारण शादी विवाह भिन्‍न भिन्‍न गोत्र में किए जाते थे। यही व्‍यवस्‍था आज भी चली आती है। विवाह संबंधों में मिलनी के समय , विवाह के समय तथा किसी संकल्‍प के समय या प्रत्‍येक धार्मिक कृत्‍य में पुरोहितों द्वारा अपने यजमानों के गोत्र का उच्‍चरण इसलिए उच्‍च स्‍वर में बोलकर किया जाता था , और अब भी किया जाता है ताकि लोगों को अपना गोत्र याद रहे। इसी परंपरानुसार विद्वान पंडितों या पुरोहितों द्वारा जन्‍मपत्री बनाते समय उसमें वंश, जातक का गोत्र और राशि का नाम लिख दिया जाता था , ताकि उक्‍त लेख का ज्ञान प्रत्‍येक व्‍यक्ति को उसकी जनमकुंडली से हो जाए , पर बाद में उसकी भी उपेक्षा होने लगी।

सारे संसार के लोग भी भारत की इस गोत्र व्‍यवस्‍था को देखकर चकित हैं कि किस प्रकार भारत में एक ही वंश परंपरा का ज्ञान गोत्र व्‍यवस्‍था सुरक्षित रखा गया और वह भी इतने सरल रूप में कि हर व्‍यक्ति अपने वंश के मूल रक्‍त समूह को जान सके तथा विवाह संबंधों में संतान की प्रगति के लिए उच्‍च कोटि का विकसित रकत समूह प्राप्‍त कर सके। आज के आधुनिक वैज्ञानिक स्‍वयं सगोत्र विवाह का निषेध करते हैं, क्‍यूंकि वैज्ञानिक शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि अति निकट के विवाह संबंध संतान की मानसिक और शारिरीक प्रगति में बाधक होते हें और विजातीय विकृतियां उत्‍पन्‍न करते हैं। हमारे पूर्वजों ने माता की पांच पीढी में और पिता की सात पीढी तक विवाह संबंधों को वर्जित माना और अपने ही समूह में विवाह करने की अनुमति दी गयी।

यह गोत्र व्‍यवस्‍था मात्र सम्‍मान के लिए ग्रहण नहीं‍ किए गए थे , बल्कि इस व्‍यवस्‍था के पीछे छिपी भारतीय सभ्‍यता की महानता और दूरदर्शिता को समझ पाना सबके बुद्धि से परे है और जहां अपने साम्राज्‍य को सुद्ढ करने का हित हो , वहां अपने गुलामों की सभ्‍यता को निकृष्‍ट बताकर उसके मूल ढांचे को नष्‍ट करने का प्रयास कर बााटो और राज्‍य करो का मूल सिद्धांत अपनाकर विदेशियों ने देश की व्‍यवस्‍था को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोडी। गनीमत यह थी कि उस समय का खत्री समाज गोत्र व्‍यवस्‍था का रहस्‍य जानता था , इसलिए रिजले की व्‍यवस्‍था के विरोध में उठ खडा हुआ था । उसने इस गोत्र व्‍यवस्‍था के पीछे छिपे वैज्ञानिक सिद्धांतों को स्‍पष्‍ट कर दिया था और आज उन्‍हीं खत्रियों की संतान आधुनिक सभ्‍यता की आड में स्‍वयं ही उसे भुलाने लगी है और गोत्र व्‍यवस्‍था का महत्‍व नहीं समझती।

लेखक ... खत्री सीता राम टंडन



Wednesday, 27 January 2010

संवेदनहीन संस्‍कृति के बाद भी विकास पर नाज कर सकते हैं हम ??

21 वीं सदी में हमारा न सिर्फ कंप्‍यूटर युग में प्रवेश हुआ है , वरन् हमने अनेक उपलब्धियां अ‍िर्जत की हैं , उसमें से एक महत्‍वपूर्ण उपलब्धि है आयु का बढना। प्रति व्‍यक्ति औसत आयु बढ रही है। इसे आधुनिक विज्ञान और चिकित्‍सा शास्‍त्र का चमत्‍कार कहा जा सकता है। पर आयु बढने से वृद्धों की समस्‍याएं भी बढती जा रही हैं। आवास , सुरक्षा , देखरेख की समस्‍या के साथ ही साथ जीवन के अंतिम प्रहर में सेवा , ममता और चिकित्‍सा की समस्‍या से हमारे बूढे बुरी तरह जूझ रहे हैं। भूमंडलीकरण के इस दौर में अंधाधुध रूपए कमाने की दौड में हमारा समाज अपने स्‍वयं और परिवार के भले तक ही सीमित रह गया है।

स्‍नेहपूर्ण आत्‍मीय संबंध आज बनावटी हो गए हें और जीवन में यौवन, मदिरा, भोग और दिखावे का महत्‍व बढ गया है। पद लोलुप लोगों का बोलबाला हर जगह बना हुआ है। आधुनिक पूंजीवाद और भोगवादी संस्‍कृति बढती जा रही है, झूठ , फरेब , मक्‍कारी , दुराचारी बाह्याडंबर पूरे समाज में बढता जा रहा है। परंपरागत वेशभूषा , खान पान को छोडकर पाश्‍चात्‍य , चायनीज , मांस मदिरा, जीन्‍स शर्ट आदि को बोलबाला बढ रहा है। सडकों पर शराब के नशे में नाचना हमारी संस्‍कृति है ? बूढे माता पिता , अशक्‍त परिवार जनों की देख रेख न करना हमारी संस्‍कृति है ? पिता का उत्‍तराधिकारी होने के कारण माता पिता‍ की सेवा करना बहू पुत्र का कर्तब्‍य है। विदेशीपन आधुनिकता, के मोह में बाहरी दिखावे के चलते हमारे नवयुवक युवतियां पाश्‍चात्‍य ही हृदयविहिन संवेदनहीन संस्‍कृति को अपनाने में लगे हैं, वह हमारे समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है। समाज के युवक युवतियां अपनी देख रेख, सेवा , उचित सम्‍मान , त्‍याग , बलिदान , सत्‍य , अहिंसा , तपस्‍या पर आधारित सांस्‍कृतिक धरोहरों का अनुसरण करें एवं समाज और राष्‍ट्र को नवगति प्रदान करें।

लेखक ... पुनीत टंडन

Monday, 25 January 2010

नारी संसार की प्रथम आवश्‍यकता है .... न्‍यूटन

  • हिन्‍दुओं में स्त्रियों को जितना सम्‍मान दिया जाता है , उतना संसार में कहीं भी किसी और प्राचीन जाति में नहीं दिया जाता। ..... एच एल विल्‍सन
  • सहधर्मिता के आदर्श को पूर्णत: निर्वाह करने वाली देवियां भारत के सिवाय अन्‍यत्र नहीं मिलती। ... अस्टिंजर एफ
  • साधारणत: भारतीय स्त्रियां पुरूषों से अधिक कार्यकुशल और निपुण होती हैं। ... सर एफ टी वर्ट
  • नारी की उन्‍नति और अवनति पर ही राष्‍ट्र की उन्‍नति अवनति निर्भर करती है। .. अरस्‍तु
  • संपूर्ण महान कार्यों के आरंभ में नारी का हाथ रहा है ।   .... लामाटिन
  • पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील , विश्‍व के लिए दया और जीवमा्र के लिए करूणा संजोने वाली महाप्रवृत्ति का नाम ही नारी है। ..... महात्‍मा गांधी
  • प्रेम और त्‍याग कैसे किया जाता है , ये केवल नारी ही जानती है। .... मोपासा
  • नारी नर की सहचरी , उसके धर्म की रक्षक , उसकी गृहलक्ष्‍मी और उसे देवता तक पहुंचाने वाली सायिका है। .... डा सर्वपल्‍ली राधा कृष्‍णन्
  • नारी की चरम सार्थकता मातृत्‍व में है। ... शरत् चंद्र
  • नारी पुरूष से अधिक बुद्धिमान होती है , वह जानती कम और समझती अधिक है ... स्‍टीफन्‍स
  • नारी संसार की प्रथम आवश्‍यकता है , गृहस्‍थ की दूसरी और मानवता की प्रतिपल ... न्‍यूटन
  • ममता , वात्‍सल्‍य , करूणा और समर्पण की मूर्ति नारी भूमि पर साक्षात देवी है। ... हजारी प्रसाद द्विवेदी
  • पुरूष हमेशा स्‍त्री का प्रथम प्‍यार बनना चाहता है , जबकि स्‍त्री हमेशा पुरूष का अंतिम प्‍यार बनना पसंद करती है। ... ऑस्‍कर वाइल्‍ड
  • नारी परमात्‍मा के अलौकि जादू की प्रतिमूर्ति है , नारी का जन्‍म शांति और प्रेरणा का अमर संदेश है। ... सी वी रमण
  • प्रकृति और परमात्‍मा के श्रेयपूर्ण अनुबंध का नाम है नारी। .... आइंस्‍टीन
  • नारी एक ईश्‍वरी उपहार है, जिसे ईश्‍वर ने स्‍वर्ग के अभाव की पूर्ति हेतु मनुष्‍य को दिया है। ... गेटे
  • स्‍त्री के अंत:करण में प्रेम इतना अधिक होता है कि पति उसका मूल्‍य कभी नहीं चुका सकता। ... अज्ञात
  • नारी सम्‍मोहन और सहनशीलता की परपौत्री है। ...जगदीश चंद्र बसु
  • नारी प्रकृति के फूलों में से एक फूल है। ... साउले
  • पुरूष का नारी के समान कोई बंधु नही। .... महाभारत
  • स्‍त्री जाति की कीर्ति स्‍फटिक दर्पण की तरह है , जो उज्‍जवल तथा चमकीला होने पर भी निकट से श्‍वास लेने पर मलीन हो जाता है। .... सरवाट
  • नारी विश्‍व की इंजन है , प्रेम श्रद्धा और सहयोंग के इंधन के बिना यह इंजन सात कदम भी नहीं चलता। ... मैडम क्‍यूरी
  • सद्गुणी स्‍त्री जहां कभी भी मिलती है , वहां आपको आनंद मिलता है , उसकी चितवन में बहुत सुंदर उद्दान है और वह सर्वश्रेष्‍ठ ज्ञानी पुस्‍तक है। ...... कावले
  • नारी सबकुछ कर सकती है , पर अपनी इच्‍छा के विरूद्ध प्रेम नहीं कर सकती। ..... सुदर्शन
  • जहां न होगी नारी , वहां न खिलेगी फुलवारी ...... (संकलनकर्ता ... नेहा कपूर)



Saturday, 23 January 2010

पुत्री के प्रति माता पिता का आज क्‍या दायित्‍व है ??

आज भी अधिकांश परिवारों में अपने लडकों के कैरियर और व्‍यक्तित्‍व विकास पर पूरा ध्‍यान दिया जाता है और लडकी के लिए माता पिता की इच्‍छा सिर्फ उसके अच्‍छे घर वर में विवाह करने की ही होती है। अपने प्रति होनेवाले  इस व्‍यवहार से लडकी इतनी दब्‍बू और संकोची हो जाती है कि हीन भावना से ग्रस्‍त होकर चार लोगों का सामना करने में भी सक्षम नहीं हो पाती है। एक के बाद एक लडके उसे जीवनसाथी बनाने से इंकार कर देते हैं, केवल इस वजह से कि उसमें उन गुणों की कमी है , जो लडका अपनी जीवनसाथी में देखना चाहता है , तो माता पिता पर क्‍या गुजरती है ??

आज वह समय नहीं रहा , जब लडके की रजामंदी के बगैर ही बेमेल रिश्‍ते कर दिए जाते थे। तब पर्दे और घूंघट की ओट में लडकी की हर कमी छुपायी जा सकती थी , पर आज माता पिता की भलाई इसी में है कि वे अपनी पुत्री को सर्वगुणसंपन्‍न बनाए, पुत्र से उसे कम न आंके। सुंदरता तो भगवान की दी हुई एक नियामत है , उसपर किसी का वश नहीं होता। अगर आपकी पुत्री सुंदर है तो आप उन सौभाग्‍यशालियों में हैं , जिन्‍हें मैरेज मार्केट में अधिक पापड नहीं बेलने पडेंगे। परंतु यदि पुत्री कम सुंदर है , तो उसमें इतना आत्‍म विश्‍वास भरें कि वह अपनी खूबियों पर गर्व करना सीखे।

कुछ परिवार में पुत्री की स्‍वाभाविक चाह को कुचल दिया जाता है। पुत्र की तरह ही यदि बेटियों को हर घर में माहौल मिल सके और उन्‍हें बेटे से कम आंकना हम छोड दें तो कोई कारण नहीं है कि हमारी पुत्रियां पुत्रों से किसी मायने में कम कहलाएगी। अनेको उदाहरण आज हमारे सामने हैं , जहां पुत्रियों ने पुत्रों की तुलना में बाजी मारी है। हर क्षेत्र में सफलता प्राप्‍त करने वाली लडकियां उन घरों से आती हें , जहां पुत्र और पुत्रियों में कोई भेद भाव नहीं होता है। आज के बदलते परिवेश में हर परिवार के लिए यह समझना आवश्‍यक है कि अब वे पुत्री के जन्‍म का दुख मनाना भूलकर उसके आनेवाले जीवन को खुशहाल बनाने की दिशा में प्रयासरत हो जाएं। वर्ना जो पुत्री अपने जन्‍मदाता माता पिता को सुख देनेवाली बन सकती है , कहीं गलत पालन पोषण से सचमुच अपने माता पिता के लिए एक बोझ न बन जाए !!

लेखक .. खत्री कमल सेठ




Thursday, 21 January 2010

चहुं ओर प्रकाश फेकने वाले दीप को ही हम सुंदर कह सकते हैं !!

आध्‍यात्मिक ज्ञान सहित जीवन प्रदत्‍त शिक्षा के लिए भारत विश्‍व में अग्रणी रहा है। साम्‍य भाव के स्‍तर पर निर्धन , धनी शिष्‍यों की एकता , नैतिकता और कर्मठता का पाठ व्‍यावहारिक , शैक्षिक स्‍थल से ही जिन गुरू आश्रमों में परहित भाव से प्राप्‍य था , अब वह अलभ्‍य ही नहीं , अपितु बदरंग हो नाना विधि प्रपंचों में दृष्टिगत है। पाश्‍चात्‍य शिक्षा और विज्ञान के विकासोन्‍मुख राह पर भले ही आज प्रगति की रंगीनी से व्‍यक्ति चांद तक पहुंचा है , किन्‍तु प्राचीनतम ग्रंथों की खोज से ज्ञात है कि किसी भी विषय के ज्ञान क्षेत्र मं भारत पिछडा न था।

आधुनिकतम शिक्षा जितनी महंगी और आडंबरपूर्ण है , उतनी ही कंटकों से भरपूर भी है। पहले तो अभिभावक पब्लिक स्‍कूलों में 'डोनेशन' से लेकर उच्‍च फीसें देकर अपनी संतति के लिए शीश महल बनाने के सपने देखते हैं , उसके बाद युवक इंजीनियरिंग , डाक्‍टरी या प्रशासनिक सेवाओं के लिए घर बार छोडकर अभिभावकों को गंधर्व नगर की योजनाओं से प्रलोभित कर नाना कोचिंग सेंटरों का आश्रय ले हजारों लाखों का धन और श्रम व्‍यय कर या नकली डिग्रियां उपलब्‍ध कर निराश्रित होते हैं। ये न केवल माता पिता की आंखों में धूल झोंकते हैं , अपने छल छद्म और भुलावे के हथकंडों से न केवल समाज को भ्रमित करते हैं ,अपितु स्‍वयं भी हीनता के गर्त से अभिभूत मानसिक संतुलन खो आनंद की खोज में नशीली ड्रग , शराब से तनाव रहित होने की चेष्‍टा में स्‍वयं के कर्मक्षूत्र से विरत मृगतृष्‍णा के भंवर से टकराते हैं। ऐसी दशा में अभिभावकों की आशाओं पर तुषारापात होता ही है , बल्कि शिक्षित युवा पीढी की असीम अर्थ लिप्‍सा औ इसके लिए दुष्‍चेष्‍टा निराश्रित मां बाप से भी कर्तब्‍य विमुख करती है।

वस्‍तुत: आज की शिक्षित युवा समाज की इस महामारी प्रकोप का उत्‍तरदायित्‍व दूषित संस्‍कार , शिक्षा और समाज पर है। बढते ऐश्‍वर्य साधन की उपज , व्‍यपारीकरण के कोरे ज्ञान दंभ का पक्षधर युवा महत्‍वाकांक्षाओं की उडान में मॉडलिंग , सौंदर्य प्रतियोगिताएं , चटपटे नग्‍न फैशन , नशाखोरी या टी वी के उत्‍तेजक दृश्‍यों से सर्वत: प्रलोभित सफलता के भ्रम से पचपका है। उचित शिक्षा नियंत्रण में दिशा दर्शन के लिए एक ओर जहां संयम और अनुशासनहीनता वश लाड प्‍यार लुटाने अभिभावक अपराधी हैं , तो दूसरी ओर कतिपय मनचले लोलुप शिक्षक और समाज। शिक्षा के मूलभूत आंतरिक स्‍वच्‍छता और निष्‍ठा के अभाव में युवाओं का पतन निहित है। आरंभिक शिक्षा के मूल से ही चरित्र और नैतिकता की पृष्‍ठभूमि पर बाह्य की अपेक्षा अंतस का पुनर्स्‍थापन संभव है। सागर की गहराई में मोती की उपलब्धि है। श्रेयस्‍कर वरीयता के लिए शिक्षा के बाह्य और अंत का संतुलन बेहद आवश्‍यक है। चहुं ओर प्रकाश फेकने वाले दीप को ही हम सुंदर कह सकते हैं।

लेखिका ... डा श्रीमती रमा मेहरोत्रा




जाति प्रथा की अच्‍छाइयों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए !!

धर्म के पालन में हमें जाति व्‍यवस्‍था को कतई ध्‍यान में नहीं रखना चाहिए , गौतम बुद्ध ने भी अपनी धर्म व्‍यवस्‍था में जाति को स्‍थान नहीं दिया और जाति व्‍यवस्‍था को कमजोर किया था। जैन धर्म , कबीर के वैष्‍णव धर्म और रामदास तथा सिक्‍ख धर्म भी ऐसे आंदोलन रहें , जिन्‍होने जाति प्रथा की कुछ बुराइयों , विशेष रूप से अस्‍पृश्‍यता को समाप्‍त करना चाहा। गुरू नानक एवं अन्‍य सिख गुरूओं ने भी मनुष्‍यों को भी समानता का उपदेश दिया तथा जाति , धर्म और धन के आधार पर भेद भाव का विरोध किया। वर्तमान समय में राजा राम मोहन राय तथा म‍हात्‍मा गांधी ने भी जाति प्रथा की बुराइयों को दूर करने का उपदेश दिया , पर जाति का पूर्ण विध्‍वंस किसी ने भी नहीं चाहा।यही कारण है कि जाति प्रथा का मूलभूत ढांचा अभी तक अपरिवर्तित रहा है।

आज भी माना जा सकता है कि जाति ही भारतीय संगठन की धुरी है , पर जाति क्‍या है , यह अभी तक लोगों के सामने स्‍पष्‍ट नहीं है। वास्‍तव में देश में केन्‍द्र सरकार , उससे नीचे राज्‍य में प्रांतीय सरकार , उसके नीचे में डिविजन में कमिश्‍नरी , जिले या नगर में जिला परिषद या नगर पालिका और ग्राम स्‍तर पर ग्राम पंचायत के कारण सबसे नीचे स्‍तर से सबसे ऊपर स्‍तर तक शासन व्‍यवस्‍था सुचारू रूप से चलती है , उसी प्रकार समाज के विभिन्‍न वर्गो के मध्‍य सामाजिक गतिक्रम को व्‍यवस्थित करके जाति व्‍यवस्‍था सुचारू सामाजिक व्‍यवस्‍था कायम करता है। कार्य दोनो का एक ही है , इन दोनो की आलोचना करनेवाले तो बहुत हो सकते हैं , पर इसका विध्‍वंस कौन कर सकता है ? यदि कोई चाहता है तो इसका विकल्‍प भी सुझाए , क्‍यूंकि सभी को व्‍यवस्‍था चाहिए , विध्‍वंस नहीं। जाति प्रथा की बुराइयों में कुछ भी कह सकते हैं लोग , पर उनकी अच्‍छाइयों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। भारतवर्ष के सभी समुदायों का रहन सहन , रीति रिवाज , सोंच समझ एक नहीं हो
सकता और एक जैसे लोगों का एक जगह पर होना उस क्षेत्र और क्षेत्र से जुडेलोगों को अधिक उत्‍तम बनाता है।

लेखक .. खत्री सीता राम टंडन

Tuesday, 19 January 2010

खत्रियों में ढाई घर , चार घर , बारह घर और बावन जाति आदि बनने का असली कारण

यह तडबंदी अलाउद्दीन खिलजी के समय में विधवा विवाह के प्रश्‍न को लेकर बनी , इसपर अधिक विवाद नहीं है , किन्‍तु कालांतर में इस ऊंच नीच समझी जानेवाली तडबंदी का असली कारण क्‍या था और ऊंच नीच की भावना फर्जी थी या नहीं , यह प्रयन खत्री समाज में परम विवाद का विषय बना , यह अनुवर्ती परिस्थितियों से जाहिर है। ऐसा भी नहीं है कि ऊंच नीच की यह भावना घरों की ऐसी मर्यादा स्‍थापित होने के साथ ही स्‍थापित कर दी गयी थी और इसके पीछे समाज के उस समय के बुजुर्गों का ऐसा कोई इरादा था , बल्कि वास्‍तविकता यह है कि कुछ परिवारों को ऊंचा और कुछ को नीचा समझने की यह भावना बहुत बाद में धीरे धीरे पैदा हुई , जिसका कोई ठोस आधार नहीं था। इसी से पुन: कालांतर में यह भावना समाप्‍त हो गयी , इसके अनेक कारण थे।

वास्‍तव में जिन लोगों को बादशाह अलाउद्दीन खिलजी के खत्री विधवाओं का पुनर्विवाह प्रचलित कराने के शाही फरमान की खबर देर से पहुंची और इसलिए वह घराने महज दूरी की वजह से देर से दिल्‍ली पहुंचे , उनके लिए बिरादरी द्वारा ऐसा फतवा लगाना कि वह औरों से नीचा समझा समझा जाए , जैसा कि बाद में व्‍यवहार में आया , तर्क संगत नहीं हो सकता। जो लोग दूर दराज के इलाकों से सफर करके दावे के वास्‍ते ढाई घरों की सहायता करने आए और उनकी ही मदद से ढाई घरों को अपनी तजवीज में कामयाबी मिली, उन जैसे अपने ही मददगारों को अपने से नीचे दर्जे का कोई ख्‍याल ही नहीं कर सकता। ऐसा भी नहीं था कि दिल्‍ली वाले ढाई घर खत्री बिरादरी में कोई महाराजाधिराज रहे हों और बाकी घरों के लोग उनके अधीन कार्य करनेवाले कोई छोटे छोटे रजवाडे थे , जो अपनी बिरादरी के राजा महाराजा का हुकुम पाकर फौरन अधीनस्‍थ राजाओं की  तरह उनकी मदद के लिए हाजिर हो गए , बल्कि वासतविक स्थिति इसके बिल्‍कुल विपरीत परिस्थिति प्रतीत होती है और ऐसा लगता है कि उस समय ढाई घर , चार घर और बारह घर के कुछ बुजुर्ग उस समय की खत्री पंचायत में अवश्‍य मौजूद थे, जिन्‍होने इस मामले में बडी कोशिश और मदद की हो । उन्‍हे उस वक्‍त की पंचायत में कुल बिरादरी की तरफ से सम्‍मान देने या खिताब देकर सम्‍मानित किया गया हो , लेकिन उन खिताबों को देने की उनकी मंशा हरगिज नहीं हो सकती कि खिताब पाने वाले लोग या उनकी संतान अपने को ऊंचा समझकर दूसरों के साथ नीचा वर्ण जैसे व्‍यवहार करें, जैसा कि बाद में हुआ।

इस समय के पूर्व भी सूर्यवंशी और चंद्रवंशी फिरके खत्री समाज में विद्यमान थे और उस समय दोनो वंशों में शादी विवाह का होना यह प्रमाणित करता है कि उस समय ऊंच नीच की कोई भावना समाज में नहीं थी। उस समय समाज के बुजुर्गो को देश सेवा या समाज सेवा के लिए किए गए सराहनीय कार्यो के लिए सम्‍मानित तथा निकृष्‍ट कार्य करने वालों के लिए दंड दिया जाता था, जिससे लोगों का अच्‍छे काम करने का उत्‍साह बनता था और समाज की बुराइयां समाप्‍त होती थी। यह व्‍यवस्‍था चरित्र बल को ऊंचा उठाने और सत्‍य धर्म का पालन कराने की भावना से प्ररित थी , अत: इससे किसी में ऊंच नीच की भावना नहीं व्‍यापती थी , बल्कि अधिक सम्‍मान पाने का अवसर सुद्ढ होता था। ढाई घर , चार घर आदि की मर्यादा बांधने का उद्देश्‍य खत्री समाज की प्रगति , एकता और नींव को सुदृढ करने का था , जिसका कालांतर में बुरा अर्थ हो गया। खत्री समाज के जिन लोगों को इन पदकों से सम्‍मानित किया गया , उनकी संताने इसे पैतृक अधिकार समझकर अपने को दूसरों से ऊंचा और दूसरों को अपने से निम्‍न कोटि का सिद्ध कर प्राचीन चातुर्वण्‍य व्‍यवस्‍था के बिगडे रूप के समान ही व्‍यवहार करने लगी, जो इस मर्यादा स्‍थापन के मूल उद्देश्‍य के बिल्‍कुल विपरीत था।

लेखक .. खत्री सीता राम टंडन जी



Monday, 18 January 2010

वास्‍तव में हमारी अमूल्‍य निधि क्‍या है ??

संसार में सबसे बडी निधि क्‍या है , इसपर अनेक विद्वानों ने मनन किया , विवेचना की वाद विवाद किया , पर वे अभी तक किसी निष्‍कर्ष पर नहीं पहुंच सकें। इसी बात की समझ के लिए मै सबसे पहले अपने मित्र मूल्‍यवान के पास पहुंचा, उसने बताया कि संसार में सबसे मूल्‍यवाण निधि मकान है , एक मकान बना लीजिए , दस किराएदार रख लीजिए , 'हर्रे लगे न फिटकिरी , रंग चोखा आए' आजीवन आपको किसी चीज की कमी नहीं होगी , बस गुलछर्रें उडाएं।


वहां से चलकर मैं अपने दूसरे मित्र मक्‍खन लाल के पास पहुंचा। मेरे प्रश्‍न को सुनकर वे हंसकर बोलं ..'सबसे बडी निधि चापलूसी है। जिसके पास ये हैं , वह बडे बडे मंत्रियों के साथ चलता है , उसकी सारी जरूरतें पूरी करता है , मुझे देखों , चार चार मकान , कितनी कारें और विलायती सामान , इसके अलावे जो चाहे ले लो .. पद्म भूषण , पद्म श्री' मेरी बोलती बंद थी , मैं उठा और चुपचाप चल दिया।


अब बारी थी मेरे मित्र गरीबदास की, सो वह भी पूरी की। मेरी समस्‍या सुनकर उसने कहा 'सबसे बडी निधि गरीबी है , लल्‍लू जब से मैं पैदा हुआ हूं , रोजाना गरीबी का ही गुणगाण सुन रहा हूं , 365 दिन गरीबों का ऊपर उठाने की केाशिश हो रही है , पर वह हनुमान जी से भी भारी है। सरकारे आती हैं , चली जाती हैं , पर गरीब पहलवान ताल ठोकर जहां का तहां खडा है , देखो एक एक की जुबान पर गरीबी ही गरीबी। निराश होकर मैं चल पडा। 


अब केवल गांव के बडे बाबा भक्तिदेव ही बचे थे। मैं उनके पास पहुंचा औ उनके पैर छूकर बैठ गया। मैने बाबा को को अपनी समस्‍या बता दी। वे मुस्‍कराए और बोले 'बचुआ , हम तो ठहरे पुरनिया और तुम नए जमाने की नई फसल । तो अब हमार तुम्‍हार कैसे बात मी। मैं बोला 'बाबा हमहूं कुछ कुछ पुरनिया है,आप बोली तो। वे प्रसन्‍नचित्‍त बोले 'देखो बचुआ, हम तो अब भए 90 साल के , हमारे पास दुनिया की सबसे बडी और अमूल्‍य निधि है। इसे हम बडे सहेज के रखे हैं। इससे हमारे सारे कष्‍ट दूर हो जाते हैं।हम सदा प्रसन्‍न रहते हैं।इससे हमें बल , बुद्धि , धैर्य और संतोष्‍ज्ञ मिलता है।


बचुआ यह है मेरे माता पिता का आशीर्वाद , जिसकी गठरी आपके पास है। जब मैं कष्‍ट में होता है तो थोडा सा इसमें से निकाल लेता हूं और तभी मेरे सारे कष्‍ट आनन फानन में दूर हो जाते हैं। मैं संतुष्‍ट हो गया , सच है , माता पिता के आशीर्वाद कह अमूल्‍य निधि जिसके पास है , वह सदा सुखी है।

खत्री .. कैलाश नाथ जलोटा










Saturday, 16 January 2010

इतिहास की पुस्‍तकों में 'खत्रियों' के बारे में चर्चा

इतिहास की पुस्‍तकों में यत्र तत्र खत्रियों के बारे में जो चर्चा की गयी है .. उसका संग्रह यहां है ...

1 . फ्रांसिस ग्‍लैडविन द्वारा किए गए 'आइने अकबरी' के अनुवाद ( सन् 1800 के संस्‍करण के खण्‍ड 2 , पृष्‍ठ 198) में लेखक ने कहा है ' किन्‍तु आजकल विशुद्ध क्षत्रियों का पाया जाना उस थोडे से अपवादों को छोडकर , जो शस्‍त्र विद्या के व्‍यवसाय कापालन नहीं करते , बहुत कठिन है।

2 . फरिश्‍ता ने अपनी पुस्‍तक में द्वापर युग के उत्‍तरार्द्ध में भारत के हस्तिनापुर नगर में राज्‍य करनेवाले एक खत्री राजा का उल्‍लेख किया है , जो न्‍याय पीठ पर बैठकर अपनी प्रजा का पालन करता था। ( देखिए नवंबर 1884 में नवल किशोर प्रेस, लखनऊ में मुद्रित 'फरिश्‍ता' के फारसी संस्‍करण का पृष्‍ठ 6)

3 . इसी पुस्‍तक के नए पृष्‍ठ पर फरिश्‍ता ने विक्रमाजीत खत्री अथवा विक्रमादित्‍य का उल्‍लेख किया है। संबद्ध अनुच्‍छेद का इस प्रकार अनुवाद किया जा सकता है ' राजा विक्रमाजीत खत्री , जो इस पुस्‍तक की रचना के 1600 वर्ष से कुछ अधिक पूर्व राज्‍य करता था , की मृत्‍यु के पश्‍चात् उन्‍होने ( राजपूतों ने ) शासन सूत्र अपने हाथ में ले लिया।

4 . सर डब्‍लू डब्‍लू हंटर ने अपने 'स्‍टेटिस्टिकल अकाउंट ऑफ बंगाल' के खंड 4 , पृष्‍ठ 17 में खत्री जाति के विषय में निम्‍नलिखित तथ्‍य प्रस्‍तुत किए हैं ...
वतैमान काल के खत्री अपनी वंश परंपरा के प्रमाणस्‍वरूप कहते हैं कि उनके पूर्वजों ने परशुराम के सामने आत्‍म समर्पण कर दिया था और वे उनके द्वारा छोड दिए गए थे '

5 . 'ग्‍लासरी ऑफ जुडिसियल एंड रेवेन्‍यू टर्मस ऑफ द डिफरेंट लैग्‍वुएज ऑफ इंडिया' नामक पुस्‍तक में , जिसका संपादन और प्रकाशन ईस्‍ट इंडिया कंपनी के निर्देशकों की कोर्ट के अधिकार के अंतर्गत हुआ , में प्रो एच एल विल्‍सन ने पृष्‍ठ 284 पर कहा है कि ' खत्री , जिसका बिगडा हुआ रूप खत्रिय या खतरी है , हिन्‍दी का शब्‍द है , जिसका अर्थहै दूसरी विशुद्ध जाति का व्‍यक्ति या सैनिक राजकुल जाति का।

6 . 'हिन्‍दी एंड इंगलिश डिक्‍शनरी' नामक अपनी पुस्‍तक में श्री जे टी थामसन ने कहा है कि ' खत्री का अर्थ हिन्‍दुओं की चार जातियों में से एक है , इसका अर्थ है वह व्‍यक्ति , जो योद्धा जाति का है।

7 . श्री जॉन डी प्‍लॉट्स ने अपने शब्‍द कोष में कहा है कि ' खत्री हिन्‍दुओं की दूसरी अर्थात् योद्धा या राजसी जाति का व्‍यक्ति है।

8 . खत्रियों के इस दावे के संबंध में कि वे पुराने क्षत्रियों के वंशज हैं , सर जार्ज कैम्‍पवेल ने इस प्रकार अपना मत प्रकट किया ' मुझे ऐसा सोंचने के लिए विवश होना पडता है कि वे वास्‍तव में उस सम्‍मान के प्रबल दावेदार हैं।

9 . श्री रैवरेण्‍ड शेरिंग ने भी अपनी पुस्‍तक 'हिन्‍दू ट्राइब्‍स एंड कास्‍ट्स' के पृष्‍ठ 278 पर लिखते हैं कि 'खत्री मूलत: पंजाब से आए , जहां खत्रिय और क्षत्रिय दोनो नाम के उच्‍चारण में कोई अंतर प्रतीत नहीं होता।

10 . श्री जे टाल ब्‍वायज ह्वीलर ने अपनी पुस्‍तक हिस्‍ट्री ऑफ इंडिया के पृष्‍ठ 173 पर टिप्‍पणी की है कि ' भारत की प्राकृत और देशज भाषाओं में क्षत्रियों को खत्री कहा जाता था।

11 . अपनी पुस्‍तक ' कास्‍ट सिस्‍टम आॅफ इंडिया' में खत्रियों की चर्चा करते हुए श्री जे सी नेस्‍फील्‍ड ने पृष्‍ठ 37 की पंक्ति 88 में कहा है कि 'भारत में व्‍यापार करनेवाली जातियों में सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण और सर्वोच्‍च खत्री जाति है। इस जाति के प्रादुर्भाव में जाति विश्‍लेषण संबंधी कोई समस्‍या नहीं होनी चाहिए ।

12 . श्री मैक्रंडल ने अपनी पुस्‍तक 'इंडियन एंटीक्‍वायरी' सन् 1884 के खण्‍ड 13 पृष्‍ठ 364 पर लिखा है .. 'यूनानी लेखकों के अनुसार वे लोग , जो रावी और व्‍यास के बीच के क्षेत्र में राज्‍य करते थे , खत्रीयाओं थे , इसकी राजधानी संगल थी।'

लेखक .. खत्री सीता राम टंडन जी





Friday, 15 January 2010

हिंद देश की हिंदी भाषा , जय हिंद ही नहीं, जय हिंदी भी

युग बीता अंग्रेज गए , क्‍यूं अंग्रेजी अब भी रानी।
दासी बनकर हिन्‍दी बोलो , भरेगी कब तक उसका पानी ?
गैरों के न हम कपडे पहनें, न औरों का भोजन खाते।
क्‍यूं चोट ना लगे स्‍वाभिमान को , गैरों की भाषा अपनाते।।

नाम लंच है खाते मगर , हिंदुस्‍तानी खाना यारों।
'हाय हलो' उनका आना , 'सी यू' है जाना यारों।
मातृभूमि की मिट्टी की अब , सोंधी महक तुम पहचानों।
'रश्मि रथी' पर बैठ जरा , 'भारत भारती' को जानों।।

'कामायनी' से 'उर्वर्शी' तक , काब्‍य रस का पीले प्‍याला।
जो हो तेरा 'आकुल अंतर' , 'मधुशाला' में 'मधुबाला' ।।
रहीम , मीरा , कबीर , जायसी, सूर , केशव , तुलसीदास।
है 'सतसैया' के दोहे , पढो जितनी बढेगी प्‍यास।।

देश अपनी भाषा अपनी , स्‍वतंत्र जल थल अपने।
याद करो बापू की हसरत , आज के भारत के सब सपने ।।
हां , बुरा नहीं है कोई ज्ञान , इंगलिश जानों , अरबी जानों।
पर अपनी मिट्टी अपनी होती है, हिंदी को ही अपना मानों।।

बंगला समझो , मराठी समझो , और मद्रासी , सिंधी भी।
हिंद देश की हिंदी भाषा , 'जय हिंद' ही नहीं, 'जय हिंदी' भी ।।

रचयिता ... योगेन्‍द्र सिंह जी

Thursday, 14 January 2010

खत्रियों में महथा अल्‍ल की उत्‍पत्ति का आधार

भारतवर्ष के मध्‍यकाल के इतिहास को देखने से पता चलता है कि मुगल काल में ही नहीं , बल्कि हर्षवर्द्धन के समय में भी राज्‍य शासन में लगे हुए अधिकारियों को कोई नकद वेतन नहीं मिलता था। उन्‍हे राज्‍य की ओर से भरण पोषण के लिए भूमि मिली हुई थी , जिसकी समस्‍त आय उनकी होती थी। राज्‍य की संपूर्ण आय का चौथाई भाग इस प्रकार के राज्‍य के अधिकारी सेवकों के लिए निश्चित था। राज्‍य प्रांतों में बंटा था , जिसके प्रांतपति 'राजस्‍थानीय' नाम से जाने जाते थे। प्रांतों में कई खंड थे , जिन्‍हें भुक्ति कहते थे और उसका अधिकारी 'ओगिक ' कहलाता था। इन भुक्तियों में जिले के समान अनेक विषय होते थे , जिनके अधिकारी विषयपति कहलाते थे, जो प्राय: प्रांतपति द्वारा नियुक्‍त किए जाते थे। कभी कभी सीधे सम्राट द्वारा भी इनकी नियुक्ति होती थी। प्रत्‍येक विषय में तहसीलों के समान कई प्रथल होते थे।


प्रशासन की सबसे छोटी और महत्‍वपूर्ण इकाई गांव थी। गांव को मुखिया और तमाम शासन का प्रधान महत्‍तर कहलाता था। कहीं कहीं इसे चौधरी भी कहते थे। इसके प्रमुख कार्य गांव में शांति बनाए रखना , राजस्‍व की वसूली करना और अन्‍य स्‍थानीय आवश्‍यकताओं की पूर्ति करना था। ग्राम की भूमि तथा अन्‍य संपत्तियो से संबंधित कागजात भली प्रकार रखने के लिए 'ग्रामाक्ष पटलिक' नामक एक दूसरा अधिकारी हुआ करता था , जो कदाचित् उसका सहयोगी रहा होगा और बाद में वो पटेल कहलाया। 


इसी बात को देखते हुए कि खत्रियों की बहुत सी अल्‍लें स्‍पष्‍ट रूप से कार्य या कर्मप्रधान भी हैं, यह संभावना प्रतीत होती है कि जो खत्री ग्राम शासन के प्रधान थे और जिनका पद कहीं महत्‍तर या कहीं चौधरी था , वे बाद में अपने नामों के आगे महत्‍तर या चौधरी लगाने लगे होंगे। कालांतर में यही महत्‍तर बिगडकर महथा या मेहता बनकर अल्‍ल रूप में रह गया। यह अनुमान केवल ध्‍वनि साम्‍यता पर ही आधारित है और इसका कोई पुष्‍ट प्रमाण नहीं है , पर यदि महथा या मेहता अल्‍ल के खत्रियों का पूर्व इतिहास ढूंढा जाए तो इस बात के प्रमाण अवश्‍य मिल सकते हैं कि उनके पूर्वजों में से कोई पूर्वकाल के ग्राम शासन के प्रधान 'महत्‍तर' जैसे पद पर आसीन रहा होगा। इसी प्रकार की स्थिति खत्रियों की अन्‍य कर्मवाचक अल्‍लों की हो सकती है , किंतु उससे भी पूर्व में जाने पर उनका संबंध सूर्य , चंद्र या अग्नि वंश से जुडना आवश्‍यक है !!


लेखक .. खत्री सीता राम टंडन

Tuesday, 12 January 2010

अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्ष कर रहा है 'कडा' शहर

हिन्‍दी के विख्‍यात कवि संत मलूकदास की जन्‍मस्‍थली धार्मिक सद्भाव का प्रतीक तथा असंख्‍य ऐतिहासिक घटनाओ का गवाह रहा कडा शहर आज अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्ष कर रहा है। प्रयाग से करीब 65 कि मी पश्चिमोत्‍तर में गंगातट पर बसा 'कडा' शहर को मुगलों के शासनकाल तक सूबे का दर्जा प्राप्‍त था। इस शहर का धार्मिक महत्‍व इतना है कि प्रतिवर्ष सावन में 18 लाख श्रद्धालु आया करते हें। यहां की दरगाहों पर देश विदेश से असंख्‍य मुसलमान मन्‍नते मांगने आया करते हें। कडा की 4 कि मी की परिधि में ऐतिहासिक महत्‍व के अवशेष बिखरे पडे हैं। ऊंचे ऊंचे टीलों में कब्रगाह , मकबरे , मंदिर और पुरानी इमारतें गौरवशाली इतिहास के गवाह बने हुए हैं।

प्राचीन काल से ही कडा हिन्‍दुओं की पुण्‍यभूमि रहा है। कहते हैं त्रेता युग में सती का हाथ जिस स्‍थान पर गिरा , वहां पर शीतला देवी की प्रतिमा स्‍थापित की गयी है। बाद में पांडव पुत्र युधिष्ठिर ने मां शीतला देवी के स्‍थान पर मंदिर का निर्माण कराया। सिद्धि पीठ के नाम से विख्‍यात गंगा के तट पर बसा कडाधाम की मां शीतला के दर्शनार्थ देश के कोने कोने से श्रद्धालु आते हैं। नवरात्र में भी यहां भक्‍तों की भारी भीड जमा होती है। आषाढ महीने के कृष्‍णपक्ष की प्रतिपदा से लेकर अष्‍टमी तक लाखों भक्‍त मां के दर्शन करते हैं। इसके बावजूद प्रशासन की ओर से यहां यात्रियों के लिए कोई विशेष सुविधा नहीं है। यहां 15 अति प्राचीन मंदिर और 28 धर्मशालाएं हैं , जहां यात्री ठहरते हैं।

कडा मुनियों की तपस्‍थली रहा है। कहा जाता है कि जाह्नवी ऋषि यहीं तपस्‍या करते थे। जब गंगा शिव की जटा से निकलकर धरती पर आयी तो कडा पहुंचने पर ऋषि का ध्‍यान भंग हो गया और गुस्‍से में आकर  उन्‍होने गंगा को पी लिया। भगीरथ ने जब फिर प्रार्थना की तो अपनी जांघ चीरकर गंगा को बाहर निकाला। आज यही स्‍थान जाह्न्‍वी कुंड के नाम से प्रसिद्ध है। इस भूमि के आध्‍यात्मिक महत्‍व को सूफी संतो और फकीरों ने भी समझा और कडा को अपनी साधना स्‍थली बनाया। यहां के धार्मिक ऐतिहासिक महत्‍व के केन्‍द्रों में मां शीतला देवी , संत मलूकदास आश्रम , ख्‍वाजा कडक शाह की दरगाह , नागा बाबा की कुटी , दण्‍डी स्‍वामी ब्रह्मचारी की कुटिया , जान्‍हवी कुंड , जयचंद का किला , अनेक सिद्ध फकीरों की मजारें तथा गंगा के अनेक घाट उल्‍लेखनीय हैं !!
लेखक .. सतीश चंद्र सेठ जी



Monday, 11 January 2010

हमें समाज में पलती हिंसक अराजकता और उच्‍छृंखलता को समाप्‍त करने की आवश्‍यकता है !!

आज महानगर का लंबा राजपथ हो या गावं देहात की पतली पगडंडियां , सभी अपने अपने विकास के लिए व्‍याकुल एक दूसरे को धकियाते लोग आगे बढे जा रहे हैं । एक प्रश्‍न बार बार मन को कुरेदता है , कितनी जद्दोजहद के बाद मिली देश की स्‍वतंत्रता के कितने साल व्‍यतीत हो गए। हम भले ही 'दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल' अलापते रहें , मगर आजादी की बलीवेदी पर शहीद हुए , प्राणो की आहुति देनेवाले भगतसिंह , आजाद , बिस्मिल , अशफाक , सुभाषचंद्र बोस और सैकडों अनाम , अज्ञातों को क्‍या भुलाया जा सकता है ?

देश आजादी के साथ टुकडो में बंट गया, क्‍या हुआ ऐसा कि आजादी मिले दो दशक भी नहीं हुए कि हम देश , समाज , स्‍वाधीनता .. सभी को भूल अपनी स्‍वार्थ पूर्ति में लग गए। स्‍वास्‍थ्‍य विभाग , रक्षा विभाग , शिक्षा विभाग .. सब के सब से एक विचित्र धुंआ गहराने लगा। धुंआ कहां से और क्‍यूं उठ रहा है , इसपर ध्‍यान न देते हुए आंखे मलते हम एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहे, देशभक्ति का विचार भी कपोलकल्पित लगने लगा और धीरे धीरे स्‍वतंत्रता स्‍वच्‍छदता में बदल गयी। स्‍वतंत्रता में मर्यादा होती है , एक सीमा भी , इसका मतलब रूढियां नहीं हैं , रूढियां तो समयानुसार टूटती है , इससे विकास का मार्ग प्रशस्‍त होता है।

दूरदर्शन के कारण भी हम सब विक्षिप्‍त होते जा रहे हैं, अवैध संबंधों पर आधारित अनेक सीरियल की नग्‍नता के आगे शालीनता ने घुटने टेक दिए हैं। विश्‍वसुंदरी का खिताब देकर हमारे देश की सुंदरता को किस गर्त में ढकेला जा रहा है ? हमारे देश में सौंदर्य की उपासना तो प्राचीनकाल से होती रही है। सौंदर्य चाहे प्रकृति का हो या स्‍त्री पुरूष का उसका बाजार भाव लगाना क्‍या उचित है ? इसी उच्‍छृंखलता ने भी अराजकता से गठबंधन कर लिया है। बडी आयु के लोग भी इसमें सम्मिलित हो चुके है और नैतिक धरातल शून्‍य हो गया है।सादगी औ सज्‍जनता तो गंवारों की रेणी में आ गयी है। प्रांतवाद , भाषावाद के नाम पर अखाडे तैयार हैं। सम्मिलित परिवारों की टूटन, बडों की लापरवाही, विदेश का सम्‍मोहन और भोगवाद की ललक .. यह कहां जाकर रूकेगी ? क्‍यूकि स्‍वच्‍छंदता और उच्‍छृंखलता की कोई सीमा नहीं।

अपने घर आंगन के प्रति हमें जागरूक होना होगा। चाहे भोजन हो या फिर मनोरंजन .. अगली पीढी को दिशा देने के लिए बडों को संयमित होना होगा।  पहले अति निर्धन या अति संपन्‍न लोगों में खाने पीने की अराजकता रहती थी , मध्‍यम वर्ग संतुलित और संसकारित रहता था। यह वर्ग समाज के ढांचे में मेरूदंड की तरह काम करता था। , अब बेमेल संस्‍कृति ने इसमें भी लचीलापन ला दिया है। बनावटी रंग ढंग और ग्‍लैमर ने सबकी आंखे चुंधिया दी है। इस आपाधापी में उच्‍छृंखलता और स्‍वच्‍छंदता का सागर इतना गहराया है कि भौतिक सुख सुविधाएं तो ऊपर उतराने लगी है , मगर नैतिकता , शालीनता , यहां तक कि स्‍वाभिमान की भावना भी उसमें डूब गयी है।हमें जागयकता लाने की आवश्‍यकता है , ताकि समाज में पलती यह हिंसक अराजकता और उच्‍छृंखलता समाप्‍त हो !!

(लेखिका ... श्रीमती माधवी कपूर)

Wednesday, 6 January 2010

लखनऊ के खत्रियों द्वारा स्‍थापित श्री रामसेवामंडल का प्रयास सराहनीय है !!

भारतीय समाज में सेवा की परंपरा अत्‍यंत प्राचीन है, बढती आधुनिकता और व्‍यक्तिवादिता में जब कुछ पवित्र उद्देश्‍योंवाले व्‍यक्ति समाज सेवा के लिए एकजुट होते हैं , तो श्री राम सेवामंडल जैसी संस्‍थाओं की स्‍थापना होती है। लखनऊ में चुपचाप सेवा कार्यों में लगी इस संस्‍था से दूसरे शहरों के खत्री भाइयों बहनों को भी प्रेरणा मिलनी चाहिए।

इस स्‍वयंसेवी संस्‍था की स्‍थापना श्री रामनवमी के पावन पर्व पर 24 मार्च 1991 को स्‍वामी दिव्‍यानंद सरस्‍वती जी महाराज के आशीर्वाद तथा खत्री पुरूषोत्‍तम दास जी मेहरोत्रा जी , खत्री अमरनाथ खन्‍ना जी, सुश्री सरोज खन्‍ना जी , खत्री कैलाश नाथ मेहरोत्रा जी, श्रीमती राज रानी मेहरोत्रा जी एवं खत्री धर्मनारायण कपूर के सहयोग और प्रेरणा से की गयी थी। इसके विकास में प्रत्‍येक वर्ग के प्रतिष्ठित और जागरूक पर सेवारत भाई बहनों का अविरल सहयोग मिलता रहा है।

प्रत्‍येक माह लखनऊ के आठ चुने हुए अनाथालयों से , जैसे आदर्श कुष्‍ठ आश्रम , मदर टेरेसा का प्रेम निवास , लखनऊ चिल्‍ड्रेन होम , लीलावती मुंशी बालगृह , मलिन बस्‍ती में झोपडपट्टी आदि के कुल मिलाकर 1000 व्‍यक्तियों के लिए एक दिन की नारायण सेवा की जाती है । ज्‍येष्‍ठ माह में प्रत्‍येक मंगलवार को श्री संकटमोचन हनुमान सेतु पर शीतल पेय और खाद्य पदार्थ से जनसाधारण की सेवा हो जाती है। संस्‍था के दैनन्दिन प्रबंध का उत्‍तरदायित्‍व प्रबंध समिति के सदस्‍यों का है , उनकी स्‍वप्ररित सेवा भावना , उत्‍साह और लगन के बल पर संस्‍था के उद्देश्‍य पूरे हो रहे हैं।

निर्धन और मेधावी विद्यार्थियों को 50 रूपए प्रतिमास छात्रवृत्ति दी जाती है , चयनित छात्र छात्राओं को कॉपियां और रजिस्‍टर भी प्रसाद रूप में दिया जाता है। इसके अतिरिक्‍त उन्‍हें बालोपयोगी साहित्‍य भी प्रदान किए जाते हैं। छात्रवृत्ति की संख्‍या स्‍थायी दान दाताओं की संख्‍या के अनुसार होती है। यह चयन विभिन्‍न विद्यालयों द्वारा प्रधानाचार्यों की संस्‍तुति पर संस्‍था की चरित्र निर्माण उप समिति के द्वारा किया जाता है।

निर्धन परिवारों की कन्‍याओं का विवाह में सहयोग देने के लिए विवाह में काम आनेवाली वस्‍तु के अतिरिक्‍त साडी , ब्‍लाउज पीस , पेटीकोट , पैंट और शर्ट का कपडा , स्‍टील के पांच बरतन और चांदी की जंजीर लॉकेट दी जाती है। एक भगवत् भक्‍त समाजसेवी प्रत्‍येक कन्‍या को श्रृंगार सामग्री भी भेंट करता है। शिक्षित कन्‍यओं को श्री रामचरित मानस, हनुमान चालिसा और दूसरे सत् साहित्‍य भी पढने को दिए जाते हैं।

लेखक .. खत्री सतीश चंद्र सेठ जी





Monday, 4 January 2010

गांधीवाद का दीपक सत्‍य का , तेल तप का , बाती करूणा तथा दया की और लौ क्षमा की है !!

गांधीवाद ऐसा रक्षा कवच है , जो हमें कलुषमुक्‍त रख सकता है। गांधीवाद वह संविधान है , जो हमारे विचार और व्‍यवहार को नियंत्रित करते हुए हमें सत्‍पथा में प्रवृत्‍त कराता है। राष्‍ट्रीय एकता ईंट , पत्‍थर और सिमेंट से जोडकर नहीं तैयार की जा सकती है। यह तो इंसान के दिल और दिमाग मे खामोशी से जन्‍म लेकर पल्‍लवित और पुष्पित करायी जा सकती है। यह वह प्रक्रिया है , जो धीमी , किन्‍तु स्‍थायी और दृढ होती है। इसी एकता को बनाने के लिए राष्‍ट्रपिता आदर्श हैं , जो सबकुछ त्‍यागकर उपेक्षित भारतवासियों में आत्‍म विश्‍वास , आत्‍म गरिमा एवं गतिशीलता का उन्‍मेष कर उन्‍हें राष्‍ट्र के सबल और सक्रिय स्‍वतंत्राता संग्राम के सेनानी के रूप में खडा कर दिया। यह उनका सपना , समता , ममता , स्‍वधर्म के अनुशासन व अनुशासन के परिणाम स्‍वरूप राष्‍ट्र अक्षय वैभव प्राप्‍त करेगा। आपसी विग्रह प्रतिरोध से नहीं , उदारता से समाप्‍त होंगे , ऐसा मानना था बापू का। पर आज के राजनायकों ने क्‍या खिल्‍ली उडायी है उनके आदर्शों ?

मनुष्‍यता की पहचान है बापू , मानवता के प्राणवान प्रतीक हैं बापू , पुरूषों में संत और संतों में सर्वश्रेष्‍ठ भक्‍त हैं बापू , पर बापू के रामराज्‍य का नारा आज प्रनचिन्‍ह बना है। मानस में अंकित ...
दैहिक दैविक भौतिक तापा , रामराज्‍य नहिं कहहि व्‍यापा ।

इसी काब्‍य के पठन और मनन के बाद ही बापू ने रामराज्‍य का नारा दिया होगा। बापू के व्‍यवहार में जादू था , तभी तो सभी उसपर प्राण न्‍यौच्‍छावर करने को तैयार रहते थे। उनके साथ जुडे लोगों को आज के राजनायकों की तरह धन , पद या पेट्रोल की पर्ची या अन्‍य प्रलोभन नहीं दिए जाते थे।

बापू प्रगतिशील , क्रांतिकारी , समाज सुधारक , युग सृष्‍टा , युगदृष्‍टा ने अनुभव के सागर में गोता लगाकर हमारे नवयुवकों को एक शब्‍द दिया 'स्‍वावलंबन' । स्‍वाधीनता का जो प्रकाशदीप दर्शाया , उसका दीपक सत्‍य का , तेल तप का , बाती करूणा तथा दया की और लौ क्षमा की है। क्षमता की लौ से निकला प्रकाश ही मानवता का प्रतीक है। संदेश है गमता और समता का। उनके द्वारा प्रतिष्‍ठापित प्रतिष्ठित जीवन मूल्‍यों को अपने जीवन में उतारने हेतु मानवीय मूल्‍यों व मर्यादा से इसी धर्ममय विवेकमय , शीलरूप ,निष्‍पक्ष , निरपेक्ष बनते हुए मानवता की मंगलमयी सुगंध को अपने जीवन में विकसित , पललवित , पोषित करते रहना हमारी सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी।

(लेखिका .. डॉ रजनी सरीन)




Sunday, 3 January 2010

सांप्रदायिक सौहार्द के अग्रदूत थे संत कवि बाबा मलूक दास !!

हिन्‍दी के संत कवियों की परंपरा में कदाचित् अंतिम थे बाबा मलूक दास , जिनका जन्‍म 1574 (वैशाख वदी 5 संवत 1631) कडा , इलाहाबाद , अब कौशाम्‍बी जनपद में कक्‍कड खत्री परिवार में हुआ था। मलूक दास गृहस्‍थ थे , फिर भी उन्‍होने उच्‍च संत जीवन व्‍यतीत किया। सांप्रदायिक सौहार्द के वे अग्रदूत थे। इसलिए हिन्‍दू और मुसलमान दोनो इनके शिष्‍य थे .. भारत से लेकर मकका तक। धार्मिक आडंबरों के आलोचक संत मलूकदास उद्दांत मानवीय गुणों के पोषक थे और इन्‍हीं गुणों को लौकिक और पारलौकिक जीवन की सफलता का आधार मानते थे। दया, धर्म , सेवा , परोपकार यही उनके जीवन के आदर्श थे। उनकी आत्‍मा परमात्‍मा में लीन रहती थी। राम और रहीम में उनकी निष्‍ठा इतनी प्रबल थी कि उन्‍होने यहां तक कह डाला ... 'मेरी चिंता हरि करे , मैं पायो विश्राम'

ऊंचा कौन है ? अहंकारी , अभिमानी या विनम्र ?
वे कहते हैं ....
'दया धर्म हिरदै बसै , बोलै अमृत बैन।
तेई ऊंचे जानिए , जिनके नीचे नैन।।'

मलूकदास के जीवन का ध्‍येय था ....
'जे दुखिया संसार में , खेवौ तिनका हुक्‍ख।
दलिद्दर सौंपि मलूक को, लोगन दीजै सुक्‍ख।।'

ऐसे महान विचारक संत पर हमें गर्व है। खत्री सभा , प्रयाग ने 'मलूक जयंति' मनाना आरंभ किया है। तमाम लोगों को उनके जीवनादर्शों से प्रेरणा लेनी चाहिए।

लेखक .. डॉ संत कुमार टंडन रसिक जी



Saturday, 2 January 2010

भारत में भारत की ही संस्‍कृति .. हो गयी है बेमानी

पहले पिताजी डैडी बन गए , फिर हो गए डैड,
जीते जी मृतक बनाकर , पुत्र हो रहा ग्‍लैड।
माताजी का हाल हुआ, और दो कदम आगे,
जीते जी ममी बन गयी, अब क्‍या होगा आगे।

कभी हाय करके चिल्‍लाता , पीडा से इंसान,
आज मिलने पे हाय करना सभ्‍यता का निशान।
हाथ जोडकर अभिवादन करना , पिछडेपन की निशानी,
भारत में भारत की ही संस्‍कृति , हो गयी है बेमानी।

हिन्‍दी भाषा फिल्‍मों से , जो जनता में शोहरत पाते,
साक्षात्‍कार के समय वो गिटपिट करते नहीं अघाते।
कहते हैं यू एन ओ मे , हिन्‍दी को दिलाएंगे सममान,
भले हिन्‍द में ही हिन्‍दी का होता रहा अपमान।

प्रतिवर्ष हिन्‍दी दिवस मनाकर ही संतुष्‍ट हो जाते,
क्‍यूं नहीं , अंग्रेजी का , बहिष्‍कार दिवस मनाते।
अंग्रेजी बहिष्‍कार दिवस , फिर सप्‍ताह मास मनाएं,
अंग्रेजी को बहू और हिन्‍दी को सास बनाएं।

कहे 'चिंतक' यह अभियान , जबतक नहीं चलेगा,
मातृभाषा को राजभाषा का दर्जा नहीं मिलेगा।।

(लेखक .. खत्री महेश नारायन टंडन 'चिंतक')



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