Monday, 16 November 2009

पुस्‍तक के दूसरे खंड में मुसलमान खत्रियों की महान विभूतियों ,महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों के साथ ही साथ कल्‍याणकारी संस्‍थाओं का विवरण है !!

कल के आलेख में कुछ समय पूर्व यानि 1975-1976 में हाजी यूसुफ आला राख्‍या पटेल करांची नाम के एक मुसलमान खत्री ने इन खत्रियों पर किया गया अध्‍ययन के गुजराती भाषा में दो खंडों मे प्रकाशित किए जाने की चर्चा हुई थी , जिसमें वर्तमान पाकिस्‍तान के ही नहीं , भारत और पाकिस्‍तान के बाहर रहनेवाले मुसलमान खत्रियों का भी विस्‍तृत विवरण दिया गया था। पहले खंड के बारे में आपको संक्षेप में जानकारी दे ही दी गयी थी , इस पुस्‍तक के दूसरे खंड में मुसलमान खत्रियों की महान विभूतियों ,महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों , संस्‍थाओं के साथ ही साथ कल्‍याणकारी संस्‍थाओं का भी विवरण दिया गया है।

इस खंड की मुख्‍य रोचक बात इसकी प्रस्‍तावना है , जिसमें मुसलमान खत्रियों द्वारा अपने मूल वंश में जन्‍म पर गर्व प्रकट किया गया है और अपनी व्‍यक्तिगत पहचान बनाए रखने पर प्रसन्‍नता जाहिर की गयी है। इनके अनुसार धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन जाने से जाति का प्राचीन सांस्‍कृतिक गौरव नष्‍ट नहीं हो जाता है। सबसे बढकर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि पोशाक , धर्म और देश तक के भिन्‍न हो जाने से उनके मध्‍य जातिप्रेम की कमी नहीं अायी। इनके विवाह संबंध भी अपने ही मुसलमान तड या जाति में होते हैं। वे अभी भी अनेक मूल खत्री प्रथाओं तथा रिवाजों का पालन करते हैं। ऐसा भी ज्ञात हुआ था कि अनेक मुसलमान खत्री अपने लडके लडकियों की जन्‍म‍पत्रिका मिलाकर विवाह करने को उत्‍सुक रहे हैं।

सन् 1930 के आसपास फजले हसन नाम के एक मुसलमान खत्री वाइसराय की एक्‍जेक्‍यूटिव कौंसिल के मेंबर थे। वह सहगल खत्री थे और विवाह की साइत निकालने के लिए ब्राह्मण पुरोहित को बुलवाया करते थे। इसका उल्‍लेख दुर्गादास ने अपनी पुस्‍तक 'इंडिया फ्राम कर्जन टू नेहरू' में भी किया है। ऐसी ही प्रथा अभी तक लखनऊ में बसे कुछ मुसलमान गद्दी परिवारों में भी पायी जाती है। ऐसे कुछ परिवार गुजरात और पंजाब के बाहर भी जाकर बस गए थे , यद्यपि वे अपना मूल भूल गए हैं। पहले कुछ मुसलमान खत्री अपने मुसलमानी नाम के साथ अपनी खत्री अल्‍ल भी लगाया करते थे। पाकिस्‍तानी पंजाब में अब यह प्रथा काफी कम हो गयी है। यूसुफ पटेल का कहना है कि इन मुसलमान खत्रियों को अपने नाम के साथ खत्री लगाने में कोई दिक्‍कत नहीं थी , पर कुछ ने अपने प्रशासनिक पदवियों को अपने साथ लगा रखा था , जैसे युसुफ साहब के नाम के साथ खुद पटेल की पदवी लगी थी

( लेखक .. सीताराम टंडन जी)




6 comments:

Udan Tashtari said...

चलिए, जानकारी मिली!!

Udan Tashtari said...

आपके माध्यम से जानकारी हुई!!

Nirmla Kapila said...

अच्छी जानकारी है शुभकामनायें

Meenu Khare said...

अच्छी जानकारी .

बवाल said...

बहुत उम्दा जानकारी।
अगले लेख में कृपया हमारे जैसे मुसलमान पंडितों के बारे में भी बतलाइएगा। हा हा।

पी.सी.गोदियाल said...

संगीता जी आपको इस बात के लिए बधाई की आपका यह खत्री प्रकरण आज दैनिक हिन्दुस्तान में उल्लेखित हुआ है !

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